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हाईबूसा 2 अपने साथ उल्कापिंड के नमूने लेकर लौट रहा है

  • ऑस्ट्रेलिया के पास समुद्र में गिरेगा कैप्सूल

  • इसी कैप्सूल में उल्कापिंड रिगुयू के नमूने हैं

  • अंतरिक्ष यान फिर से सफर पर चला जाएगा

  • जाक्सा के यान ने संग्रह किया है नमूना

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हाईबूसा 2 शीघ्र ही पृथ्वी पर दोबारा लौट आयेगा। वह अपने साथ उल्कापिंड रिगुयू

के नमूने लेकर आ रहा है। दिनोंदिन उसके करीब आने का क्रम तेज होता जा रहा है। उस

उल्कापिंड के नमूने के पृथ्वी पर पहुंचने के बाद उनके विश्लेषण से सौर विज्ञान में नई

रोशनी पड़ने जा रही है। जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा का यह यान इस उल्कापिंड की

करीब तीन सौ मिलियन किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद ऐसे नमूने के साथ लौटने

वाला पहला अंतरिक्ष यान होगा। उल्कापिंड से नमूना संग्रह करने के बाद वह करीब एक

वर्ष पूर्व वापस लौटने लगा था। इस पर नजर रखने वालों को उम्मीद है कि पृथ्वी के

वायुमंडल में प्रवेश करने के बाद एक कैप्सूल दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के पास समुद्र में गिरेगा।

अनुमान है कि उल्कापिंड के नमूनों से लदा यह कैप्सूल आगामी 6 दिसंबर को आ गिरेगा।

उस कैप्सूल में मौजूद उल्कापिंड के नमूनों के विश्लेषण का काम प्रारंभ किया जाएगा। इस

हाईबूसा 2 के प्रोजेक्ट मैनेजर माकाटो योशिकावा ने इसके बारे में बताया कि शोध से जुड़े

वैज्ञानिकों की खास रुचि उल्कापिंड की मिट्टी के नमूनो में आर्गेनिक पदार्थों की जांच का

है। उनके विश्लेषण से यह पता चलेगा कि अति प्राचीन काल से सौर मंडल की संरचना के

बाद से क्या कुछ बदलाव हुए हैं। इसके प्रमाण उल्कापिंड के नमूनों में मौजूद होगा।

ऑर्गेनिक पदार्थों के विश्लेषण से जीवन की उत्पत्ति के भी सुराग मिल सकते हैं। हो

सकता है कि यह सारा नमूना इस ओर भी रोशनी डाले कि आखिर पृथ्वी पर जीवन कैसे

आया था।

हाईबूसा 2 समुद्र में गिरेगा लेकिन निर्देशन महत्वपूर्ण

जिस स्थान पर उल्कापिंड के नमूनों वाला यह कैप्सूल गिरना तय है उसके आस पास भी

बहुत कम आबादी है। लेकिन पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने के बाद उसे सही स्थान पर

उतारने के लिए काफी कुशलता की आवश्यकता होगी क्योंकि वायुमंडल के घर्षण की वजह

से यह कैप्सूल काफी गर्म हो चुका होगा। कैप्सूल के बाहर लगे खास किस्म के पदार्थ से

बने आवरण उसे जलने से बचायेंगे। फिर भी यह तय है कि वह इतनी तेज गति से गिरेगा

कि वह नजदीक से एक आग का गोला जैसा नजर आयेगा। वर्तमान में यह यान पृथ्वी से

करीब दो लाख बीस हजार किलोमीटर की दूरी पर है। इस पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों

का अनुमान है कि पृथ्वी से करीब दो सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर ही तेज घर्षण की वजह

से यह आग का गोला जैसा बन जाएगा। उसके बाद उसमें लगा एक पैराशुट खुलेगा और

उसमें लगे एंटैना के जरिए, उसे कहां उतरना है, उसके संदेश भेजे जाएंगे।

जैक्सा के वैज्ञानिकों ने कई स्थानों पर खास किस्म के सैटेलाइट संपर्क स्थापित किये हैं।

इसके जरिए उतरने वाले कैप्सूल से मिलने वाले संदेशों को पकड़ने की व्यवस्था की गयी

है। एक बार संपर्क स्थापित होने के बाद उसे किस स्थान की तरफ बढ़ना है, उसके निर्देश

जारी किये जाते रहेंगे। साथ ही उसके उतरने के स्थान के आस पास मेरिन रडार, ड्रोन और

हेलीकॉप्टर भी पहले ही तैनात कर दिये गये हैं। इन सभी को मिलाकर संयुक्त अभियान

चलेगा और उतर जाने के बाद कैप्सूल के अंदर रखे उल्कापिंड के नमूनों को एकत्रित कर

सुरक्षित लाया जाएगा। वैज्ञानिकों ने बताया कि जो कैप्सूल उतरने जा रहा है वह करीब

चालीस सेंटीमेटर ब्यास का है। लिहाजा इसे सही स्थान पर उतारना कोई आसान काम

नहीं होगा।

आसमान में गिरते वक्त यह आग का गोला बनेगा

इस मिशन के प्रोजेक्ट मैनेजर माकाटो योशिकावा ने यह भी बताया कि वर्ष 2014 में

प्रारंभ किये गये हाईबूसा 2 अभियान का यह अंत नहीं होगा बल्कि कैप्सूल उतरने की

जिम्मेदारी पूरी करने के बाद यह यान अंतरिक्ष में वापस लौट जाएगा। अंतरिक्ष में रियुगू

के जैसे एक अन्य उल्कापिंड 1998केवाई26 पर भी उसे जाना है। उस उल्कापिंड तक

पहुंचने में उसे दस वर्ष लगेंगे। वहां से भी इसे नमूना ही एकत्रित करना है और चूंकि वह

दूसरी धुरी पर है इसलिए वहां से नमूनों से रियुगू के नमूनों का मिलान कर यह जांचा

जाएगा कि उल्कापिंडों की संरचना में कैसे कैसे बदलाव हुए हैं और सौर जगत की

गतिविधियों का उन पर अलग अलग प्रभाव भी पड़ता है अथवा नहीं।

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