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बिजली की बिलिंग और खरीद में क्या जनता ठगी जाती रही है


बिजली की बिलिंग का मामला सबसे पहले दिल्ली में उठाया गया था। उस पूरे मामले की

व्यापक जांच हो पाती, उसके पहले ही अदालत ने इसे बीच में ही रोक दिया। जिसका

नतीजा था कि निजी कंपनियों द्वारा अपने खाते में फर्जीवाड़ा कर घाटा दिखाने का

असली सच सामने नहीं आ पाया। आम आदमी पार्टी के उदय के प्रारंभिक अवस्था में

वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ही इस मामले को पहली बार उठाया था। दिल्ली

में इस बिल्कुल नई पार्टी को मिले व्यापक जनसमर्थन का एक प्रमुख आधार यह बिजली

का मुद्दा भी रहा। अब पहली बार असम के चुनाव प्रचार में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी

भी वहां के लोगों को दो सौ यूनिट तक बिजली मुफ्त देने की बात कह रही है। कांग्रेस के

चुनाव जीतने पर जिन पांच गारंटियों की चर्चा उन्होंने की है, उनमें यह बिजली का मुद्दा भी

है। इसलिए फिर से इस बात पर बहस की गुंजाइश बनी है कि क्या वाकई बिजली के

मामले में आम उपभोक्ता को लगातार ठगा जा रहा है। बिजली उत्पादन की लागत, उसके

वितरण और अन्य विवरणों का अब तक कभी सोशल ऑडिट हुआ भी नहीं है। हाल के

दिनों में जिस तरीके से निजी कंपनियां बिजली उत्पादन के क्षेत्र में आगे आयी हैं, उससे

संदेह का पुख्ता होना वाजिब है। एक तरफ सरकारी बिजली वितरण कंपनियां लगातार

घाटा होने का रोना रो रही हैं, दूसरी तरफ निजी कंपनियो की तरफ से इस औद्योगिक

संयंत्र की स्थापना में पूंजी निवेश हो रहा है।

बिजली के मामले में आम उपभोक्ता को लगातार ठगा जा रहा है

इन दोनों ही स्थितियों का सम्यक मूल्यांकन

किये जाने की जरूरत है। अगर सरकारी कंपनियों को वाकई उत्पादन में घाटा हो रहा होता

तो निजी कंपनियों घाटा उठाने के लिए तो इस कारोबार में नहीं आती। जाहिर सी बात है

कि बिजली उत्पादन और वितरण का कारोबार मुनाफे का कारोबार है, इसी वजह से उसमें

व्यापक स्तर पर पूंजी निवेश हो रहा है। इस मामले को दिल्ली से बाहर निकलकर अगर

झारखंड के परिदृश्य में देखें तो हम पायेंगे कि सरकार की एक प्रमुख इकाई पतरातू को भी

अंततः राज्य सरकार ने एनटीपीसी के हवाले कर अपना सरदर्द समाप्त किया। लेकिन

अब सवाल है कि क्या वाकई यह सरदर्द था अथवा सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार

की वजह से उत्पादन पर कम और बिजली की खरीद पर लोगों को अधिक ध्यान रहा।

राज्य गठन के दो दशक बीत जाने के बाद भी सरकार में कभी भी अपनी बिजली उत्पादक

इकाई स्थापित करने की दिशा में कोई पहल नहीं हुई।  दूसरी तरफ निजी कंपनियों को

बिजली उत्पादन के नाम पर जो कोयला के ब्लॉक मिले, उसका क्या कुछ हो रहा है, वह

जगजाहिर बात है। इसलिए सवाल वाजिब है कि बिजली की बिलिंग के सारे मामलों की

सरकारी नहीं सामाजिक जांच होनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि जो उत्पादन

लागत हमें बताया जा रहा है कहीं वास्तविक उत्पादन लागत उससे कम तो नहीं है। अगर

एचईसी की स्थिति बेहतर होती तो रोजगार के साथ साथ कई किस्म के अन्य अवसर भी

यहां पैदा हो सकते थे, इसे बताने की आवश्यकता नहीं है। टाटा में जिस तरीके से अनुषंगी

इकाइयों में भी रोजगार के अवसर खुले थे, एचईसी के लिए उससे कहीं अधिक यह

संभावना थी। अब हर चीज को निजी हाथों में सौंपकर सिर्फ पर्दे के पीछे की कमीशनखोरी

को बंद करने पर भी सोचने का अवसर आ चुका है।

सिर्फ सरकारी कंपनियों को घाटा क्यों होता है

बिजली का नुकसान क्यों होता है, इसे भी समझने की जरूरत है। अधिक तकनीकी चर्चा

नहीं भी करें तो सिर्फ सरकारी एजेंसियों को यह बताना चाहिए कि जब निजी क्षेत्र की

बिजली उत्पादन कंपनियां मुनाफा कमा सकती हैं तो सिर्फ सरकारी कंपनियों को घाटा

क्यों होता है। पतरातू में कार्यरत एक कुख्यात गिरोह ने वहां कोयला के बदले पत्थरों की

आपूर्ति कर अरबों कमा लिये। बाहर से बिजली की खरीद के नाम पर कई पूर्व अधिकारी

भी बेदाग नहीं रह पाये। ऐसे में अब सार्वजनिक हित की बात करने का मौका है। जब

दिल्ली में दो सौ यूनिट बिजली आम उपभोक्ताओं को मुफ्त में दी जा सकती है और वह

राज्य अपने बजट को भी बढ़ा सकता है तो दूसरे राज्यों के इसमें क्या परेशानी है। जाहिर

है कि जो बातें अरविंद केजरीवाल ने कही है, वह कहीं न कहीं सही है कि दरअसल बजट में

भ्रष्टाचार का बड़ा हिस्सा होता है। उसे रोककर भी बहुत लाभ कमाया जा सकता है, इसे

अब समझने और उस पर अमल करने का वक्त आ चुका है ।

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