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पृथ्वी के बनने के प्राचीन आइसोटोप भी मिले हैं दक्षिणी इलाके की गहराई में

  • बर्फीले प्रदेश की गहराई से मिले हैं प्रमाण

  • प्रारंभिक पृथ्वी पूरी तरह खौलते लावा जैसी

  • यह ठंडा होता गया तो साक्ष्य मौजूद रह गये

  • भीषण ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बना है ग्रीन लैंड

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पृथ्वी के बनने के कारणों की खोज कर रहे वैज्ञानिकों को इस बार एक नई जानकारी

मिली है। इस जानकारी का निष्कर्ष है कि बर्फ के ढका रहने वाला ग्रीनलैंड का इलाका भी

कभी भीषण ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद बना है। इस इलाके के दक्षिणी छोर की

गहराई में वैसे ऑयरन आइसोटोप्स मिले हैं, जो प्राचीन पृथ्वी की संरचना की जानकारी

देते हैं। इनके आधार पर यह माना जा रहा है कि शायद प्रारंभिक चरण में यह पूरी पृथ्वी ही

लावा के जैसी थी।

वीडियो में जानिए ज्वालामुखी के ऊपर बना ग्रीन लैंड

हम जानते हैं कि जब किसी ज्वालामुखी का विस्फोट होता है तो उससे पृथ्वी के अंदर का

खौलता हुआ लावा बाहर निकलने लगता है। बड़े विस्फोट की स्थिति में यह लावा बहुत दूर

तक फैलता जाता है। इसका तापमान इतना अधिक होती है कि वह अपने दायरे में आने

वाले हर चीज को नष्ट कर जलाता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। कई बार हम ऊपर से

जिस लावा को जमा हुआ देखते हैं, उसके नीचे से भी तरल और खौलते हुए लावा का प्रवाह

बना रहता है। अब ग्रीन लैंड के इलाके में जो पदार्थ गहराई में मिले हैं, उससे इस बात की

पुष्टि हो जाती है कि वे भी दरअसल प्राचीन लावा के हिस्से हैं। इसका एक निष्कर्ष यह है

कि आज जो इलाका पूरी तरह बर्फ से ढका हुआ है, वह भूतकाल में कभी भीषण

ज्वालामुखी का हिस्सा हुआ करता थी। इसी वजह से उस इलाके के दक्षिणी छोर की

गहराई में लावा होने के निशान मिले हैं। लेकिन जलते हुए लावा के बाद यह इलाका कितने

दिनों में और कैसे ठंडा प्रदेश बनता चला गया, इसे समझने की कोशिश अभी जारी है। इस

खोज का दूसरा निष्कर्ष यह भी है कि प्रारंभिक अवस्था में पूरी पृथ्वी ही खौलते हुए लावा

के जैसी थी।

पृथ्वी के बनने की प्रारंभिक सोच सूर्य से टूटकर अलग होना है

वैसे भी यह वैज्ञानिक परिकल्पना है कि सूर्य से टूटकर अलग होने के बाद इतनी दूर आने

के बाद जब यह टुकड़ा सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाने लगा तब भी वह सूर्य के जैसा ही

खौलता हुआ आग का दरिया ही था। क्रमिक तरीके से उसके शीतल होने की वजह से उसके

बाहरी आवरण धीरे धीरे ऐसे होते चले गये। एक टुकड़ा टूटकर अलग हो गया और चांद

बनकर पृथ्वी का उपग्रह बन गया। वैज्ञानिक सोच है कि खौलते हुए लावा से बने भाप की

वजह से जब बादल बने तो कई हजार वर्षों तक यहां लगातार बारिश होती रही। इससे पूरा

इलाका न सिर्फ ठंडा हुआ बल्कि क्रमवार तरीक से पानी की शीतलता और अंदर की गरमी

की वजह से मिट्टी के हिस्से भी बने। गत शुक्रवार को प्रकाशित एक वैज्ञानिक प्रबंध में ग्रीन

लैंड पर हुए इस नये खोज की जानकारी दी गयी है। वैज्ञानिकों ने वहां के करोड़ों वर्ष पुराने

पत्थरों पर शोध किया है। जिसमें पाया गया है कि उनमें प्राचीन पृथ्वी के ही अंश है। साथ

ही वहां के पत्थरों में पिघलते लावा, जिसे मैग्मा कहा जाता है, उसके भी अंश मिले हैं।

अनुमान के मुताबिक जो बासाल्ट पत्थर वहां पाये गये हैं, वे करीब 3.7 बिलियन वर्ष पुराने

हैं। इस काल खंड का निर्णय वैज्ञानिकों ने आधुनिक यंत्रों की मदद से किया है। इन पत्थरों

की जांच करने वाले वैज्ञानिकों ने उनमें हाफनियम और नियोडामियून के आइसोटोप्स भी

पाये हैं। यहां तक कि वहां टंगस्टन के अंश भी विद्यमान हैं।

कुछ आइसोटोप्स ऐसे हैं, जो अप्रभावित ही रहते हैं

कार्लेटन विश्वविद्यालय के एसोसियेट प्रोफसर डॉ हानिका रिजो ने इस बारे में बताया कि

इनमें से कुछ के अति प्राचीन होने पर कोई संदेह इसलिए भी नहीं है क्योंकि वे बाहरी असर

से पूरी तरह अप्रभावित रहते हैं। खौलते लावा से बना मैग्मा जब पृथ्वी के ऊपरी सतह पर

जमना प्रारंभ हुआ था यह उस काल के हैं। वैसे भी आज पृथ्वी के सबसे अंदर खौलता हुआ

लावा ही है, जो ज्वालामुखी विस्फोट से यदा कदा बाहर आता रहता है। कई बार समुद्र की

गहराई में ऐसा विस्फोट होने पर हमें सिर्फ भूकंप का एहसास होता है जबकि यह लावा

समुद्र में ही धीरे धीरे ठंडा होकर जमता चला जाता है। समुद्र के अंदर ऐसे जीवंत

ज्वालामुखी के पास भी कई समुद्री जीवन पलते हैं, जिनके भोजन का आधार भी वहां

मिलने वाले खास किस्म के नमक ही हैं।

इस बारे में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जिओ केमिस्ट्री विभाग की प्रोफसर हेलेन

विलियम्स कहती हैं कि चार बिलियन वर्ष पूर्व की स्थिति को समझने में वक्त लगता है।

पृथ्वी के लगातार बदलते चले जाने की वजह से अनेक पुराने वैज्ञानिक साक्ष्य भी समाप्त

हो चुके हैं। लेकिन ज्वालामुखी की रासायनिक संरचना एक जैसी होने की वजह से ग्रीनलैंड

के बर्फीले प्रदेश के नीचे प्राचीन ज्वालामुखी के हिस्से हैं, इसमें अब कोई संदेह नहीं है।

चूंकि पृथ्वी की गहराई तक पहुंचना संभव नहीं हो पाया है, इसी वजह से वैज्ञानिक अपनी

पहुंच के दायरे में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इसे समझने की लगातार कोशिश कर रहे

हैं कि आखिर पृथ्वी के बनने की गाड़ी आखिर कैसे कैसे आगे बढ़ी होगी। 

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