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ग्रीनलैंड के ग्लेशियर अब फिर वापस नहीं लौट पायेंगे

  • तेजी से पिघलते बर्फखंडों का विकल्प नहीं है दुनिया में

  • पृथ्वी के पर्यावरण के लिए यह एक बहुत बड़ा खतरा है

  • समुद्री जलस्तर बढ़ा तो डूब जाएंगे अनेक महानगर भी

  • दुनिया की भौगोलिक संरचना बदलेगी छह मीटर पानी से

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः ग्रीनलैंड के ग्लेशियर जो पिघल चुके हैं, अब शायद कभी वापस नहीं बन

पायेंगे। यह वैज्ञानिकों का आकलन है। उनके मुताबिक अब तापमान में बढ़ोत्तरी और

कम बर्फ पड़ने की वजह से भी यहां बर्फ की कमी साफ नजर आने लगी है। लेकिन खतरा

इस बात का भी है कि जब यह सारा बर्फ गलने के बाद समुद्र में चला जाएगा तो दुनिया के

कई महानगर समुद्र के अंदर समा जाएंगे। हाल के दिनों में इस ग्लेशियरों के पिघलने की

गति दिनोंदिन तेज होती जा रही है। पिछले 34 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पाया

गया है कि 234 विशाल ग्लेशियरों में से सभी के बर्फ इतने कम हो चुके हैं कि उनकी हर

साल भरपाई नहीं हो पा रही है। यानी हर साल इसमें कुछ न कुछ कमी आ रही है और एक

खास समय में यह सारे क्रमवार तरीके से समुद्र में चले जाएंगे।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि ग्लेशियरों का इतनी तेजी से पिघलना पृथ्वी की

पारिस्थितिकी के लिए खतरा है जबकि इन पिघले हुए बर्फ का समुद्र में जाना भौगोलिक

संरचना के बदल जाने का आपात संकेत है। पर्यावरण के नुकसान को कम करने के लिए

ही दुनिया भर के कार्बन उत्सर्जन को कम करने का एक अभियान चल रहा है। इसमें

कोशिश जारी है पर अब तक उल्लेखऩीय सफलता नहीं मिल पायी है। याद रहे कि दुनिया

में अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में भारतवर्ष भी है।

ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों का आकार पर लगातार निगरानी

ग्रीनलैंड की स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया है कि वर्ष 2018

के बाद से अब वहां मौजूद बर्फ की मात्रा तेजी से कम होती जा रही है। यानी जितना बर्फ

पिघल रहा है, उसके मुकाबले बहुत कम बर्फ बन रहा है। अभी इन बर्फखंडों के पिघलने की

वजह से समुद्र का जलस्तर एक मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रहा है। यह गति

समुद्र के लिहाज से काफी कम होने की वजह से लोगों को अपनी तरफ आते इस खतरे का

पता नहीं चल पा रहा है। लेकिन जैसे जैसे बर्फ गलकर समुद्र में जाने की गति तेज होती,

वैसे वैसे समुद्र के किनारे बसे इलाके समुद्र के अंदर चले जाएंगे। इस स्थिति को किसी

दूसरे तरीके से रोक पाना भी संभव नहीं होगा।

यह वैज्ञानिक आकलन पहले से ही कर दिया गया है कि पृथ्वी का उत्तरी ध्रुब भी अब

खिसकता हुआ रुस के साइबेरिया की तरफ चला जा रहा है। ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों के

पिघल जाने की स्थिति में सारी दुनिया में समुद्र का जलस्तर करीब छह मीटर ऊंचा उठ

जाएगा। इस छह मीटर ऊंचे समुद्री जल स्तर का सीधा अर्थ होगा पृथ्वी के अनेक भूभाग

का समुद्र के अंदर समा जाना ही होगा। भारतीय परिपेक्ष्य में बात करें तो देश के तीनों

महानगर यानी कोलकाता, मुंबई और चेन्नई का भविष्य़ इस लिहाज से अंधकारमय है।

भारत के तीन महानगरों का डूब जाना भी तय मानिए

मुंबई में बार बार होने वाली भीषण बारिश के बाद जो स्थिति बनती है, उसे देखखर भी

समझा जा सकता है कि जब समुद्र का जल स्तर छह मीटर अधिक होगा तो कितने इलाके

स्थायी तौर पर डूब चुके होंगे।

इस शोध से जुड़े ओहियो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक यह मानते हैं कि हो सकता है कि

यह खतरा आने में दशक लगे लेकिन एक बार जब इसकी गति तेज होगी तो यह अचानक

ही बहुत कुछ उथल पुथल कर देगी। उस समय लोगों को समुद्र के कहर से बचने का शायद

मौका भी नहीं मिल पायेगा।

इस शोध से जुड़े ओहियो विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिक मिशाला किंग ने कहा कि हर

साल जितना बर्फ एकत्रित हो रहा है उससे बहुत अधिक समाप्त हो रहा है। इसलिए यह

तय है कि किसी एक मौके पर आने के बाद साल में जमने वाले बर्फ की तुलना में गलने

वाले बर्फ का मासिक आंकड़ा ही अधिक हो जाए। ऐसी स्थिति में बिना किसी पूर्व चेतावनी

के ही समुद्री जल स्तर अनेक इलाकों तक तेजी से फैलता चला जाएगा। उनके मुताबिक

सभी सरकारों को अपने समुद्री इलाके के किनारे बसने वाली आबादी को सुरक्षित हटाने के

लिए पहले से ही इंतजाम कर लेना चाहिए क्योंकि यह खतरा बिना किसी पूर्व चेतावनी के

कभी भी आ सकता है। करीब दो लाख वर्गकिलोमीटर के इस ग्रीनलैंड के क्षेत्र से पिघले

बर्फ के कुल आयतन का आकलन करने के बाद ही समुद्र का जल स्तर छह मीटर ऊंचा उठ

जाने की आशंका व्यक्त की गयी है।

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