आर्टिफिसियल इंटैलिजेंस इंसान के दिमाग की सोच को पढ़ लेगा

आर्टिफिसियल इंटैलिजेंस की दिशा में महत्वपूर्ण तरक्की
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  • अब दिमाग से सोचकर भी लिख सकेगा इंसान

  • मरीजों की मदद के लिए प्रारंभ हुआ था शोध

  • कई तरीकों का इस्तेमाल कर विधि को बेहतर बनाया

  • ईलाज के अलावा भी कई क्षेत्रों में काम आयेगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आर्टिफिसियल इंटैलिजेंस के मामले में एक रोचक तरक्की होने का दावा किया गया है।

इसके तहत न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक काफी पहले से काम कर रहे थे।

अब उनलोगों ने एक ऐसी पद्धति तैयार की है जो दिमागी सोच को भाषा में तब्दील कर सकती है।

इसकी मदद से अब दिमागी सोच के तहत बोलना भी संभव हो जाएगा

यानी दिमाग में उत्पन्न होने वाले विचारों को लिपिबद्ध करने में भी यह विधि काम आयेगी।

वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि को चिकित्सा शास्त्र के अलावा सूचना तकनीक और कई अन्य वैज्ञानिक आयामों के लिए बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।

वैज्ञानिकों ने दिमागी तरंगों को पकड़ते हुए उन्हें समझ में आने लायक आवाज में तब्दील करने में सफलता पायी है।

इसकी मदद से अब वे इन्हीं आवाजों को लिपि में भी बदल सकेंगे।

आवाज को लिपि तक में बदल देगी यह विधि

आम तौर पर स्मार्ट फोन में वॉयस टू टेक्स्ट की पद्धति पहले से ही प्रचलित है।

अब नई ईजाद के बाद दिमागी सोच की मदद से ही लिख पाना संभव होगा।

इससे निश्चित तौर पर काम की गति अत्यंत तेज हो जाएगी।

दरअसल वैज्ञानिकों ने अपने यहां विकसित आर्टिफिसियल इंटैलिजेंस को इसके लिए तैयार और प्रोग्राम किया है।

वैज्ञानिकों ने दरअसल यह काम उन रोगियों के लिए प्रारंभ किया था, जो किन्हीं कारणों से बोल नहीं पाते हैं।

इस विधि के प्रयोग से मरीज क्या बोलना चाह रहा है, उसे समझ पाना आसान होगा।

इसी पद्धति पर ईलाज से जुड़े डाक्टर भी मरीज के साथ सीधा संवाद स्थापित कर पायेंगे।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक डॉ नीमा मेसगारानी ने कहा कि अब सही तकनीक की मदद से लोगों की सोच को समझना और उन्हें सामान्य भाषा में दर्ज करना संभव हो गया है।

वैज्ञानिकों ने दिमागी सोच को सीधे समझने लायक भाषा में तब्दील करने की कोशिश की थी।

इस प्रयोग के असफल होने के बाद वैज्ञानिकों ने इस काम के लिए कंप्यूटर के एलॉगरिथम का इस्तेमाल किया।

आर्टिफिसियल इंटैलिजेंस की इस तकनीक का नाम बोकोडर है

धीरे धीरे इस वोकोडॉर का और विकास किया जा रहा है।

वैज्ञानिक मान रहे हैं कि जैसे जैसे इसके आंकड़ों का विकास होगा, वैसे वैसे इसकी पद्धति और बेहतर होती चली जाएगी।

डॉ मेसगारानी ने कहा कि एमेजन इको और एप्पल सिरी ने भी इस शोध में उनकी बहुत मदद की है।

इससे विधि को और परिष्कृत किया जा सका है।

इस शोध से जुड़े भारतवंशी वैज्ञानिक डॉ अशेष दिनेश मेहता ने वोकोडर को इंसानी सोच को समझने के लिए प्रशिक्षित किया है।

डॉ मेहता खुद लॉंग आइलैंड के नार्थवेल हेल्थ न्यूरोसाइंस इंस्टिट्यूट के न्यूरोसर्जन हैं।

इसे विकसित करने के लिए वैसे मिरगी के रोगियों की मदद ली गयी, जिनके दिमाग का ईलाज हुआ था।

इन रोगियों को अलग अलग लोगों की बात सुनने को कहा गया था।

इन मरीजों के दिमाग में होने वाली गतिविधियों के संकेतों को दर्ज कर इसकी मदद से इस विधि को विकसित किया जा सका है।

मरीजों की मदद से प्राथमिक तैयारी होने के बाद इसका दूसरा चरण प्रारंभ किया गया।

मरीजों को ध्यान से किसी व्यक्ति द्वारा पढ़े गये जीरो से नौ नंबर तक को सुनने को कहा गया था।

कई चरणों के प्रयोग से हुआ है विकास

इस आवाज से उत्पन्न होने वाले मस्तिष्क तरंगों की मदद से विधि को और बेहतर बनाया गया ताकि यह आर्टिफिसियल इंटैलिजेंस अंकों को भी पहचान सके।

वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि इस विधि के और विकसित होने पर यह एक क्रांतिकारी उपलब्ध साबित होगी।

किसी भी कारण से बोलने में अक्षम व्यक्ति क्या कहना चाहता है, इसे समझना संभव होगा।

साथ ही बेहोशी अथवा कोमा में चल रहे मरीज के दिमागी तरंगों को समझते हुए उसका बेहतर इलाज किया जा सकेगा।

वैसे इस विधि से  सामान्य लोगों के बीच भी सूचना का संप्रेषण अत्यंत तेज गति से होगा।

वर्तमान में सोच को लिखने में जो समय लगता है, वह कोई कम समय नहीं होगा।

अब दिमागी सोच से सीधे लिपि में दर्ज करने की स्थिति में यह काम भी तीब्र गति से किया जा सकेगा।

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