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देश में विकास मॉडलों की तुलना भी एक बेहतर स्थिति

देश में विकास मॉडलों की तुलना बड़ी तेजी से होने लगी है। आम तौर पर सभी सरकार

अपने माध्यम से विकास योजनाओं को लागू किया करती हैं। आम तौर पर इन योजनाओं

की बारिकी पर आम जनता का ध्यान कम ही जाता है। यह पहला अवसर है जबकि देश में

केंद्र की योजनाओं के साथ साथ दिल्ली सरकार की योजनाओं की तुलना होने लगी है।

झारखंड सहित कई राज्य दिल्ली की योजनाओं का भी नये सिरे से अध्ययन कर रहे हैं।

यह अच्छी बात है कि विकास के मॉडल के मुद्दे पर पहली बार इस किस्म की चर्चा हो रही

है। इससे कमसे कम जनता को विकास योजनाओं की बारिकी समझने और अपने स्तर

पर उनकी तुलना करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव के दौरान

ही पहली बार आम आदमी पार्टी ने अपने काम के बूते पर लोगों से वोट देने की अपील कर

भाजपा को सकते में डाल दिया था। भाजपा ने यद्यपि अपनी पुरानी रणनीति के बहाने

नैय्या पार लगाने की पूरी कोशिश की पर अंततः यहां भी यह तकनीक काम नहीं आयी।

चुनाव के दौरान ही कई मीडिया संवादों में भी दिल्ली के मुख्यमंत्री से खास तौर पर

आयुष्मान योजना नहीं लागू करने पर सवाल पूछे गये थे। इसके जवाब में श्री केजरीवाल

ने दिल्ली में अभी लागू उनकी योजना और केंद्र सरकार की आयुष्मान योजना के बारे में न

सिर्फ जानकारी दी थी बल्कि वहां मौजूद दिल्ली के लोगों से इस बारे में सार्वजनिक तौर

पर राय भी मांगी थी। इस बहस के बाद से पूरे देश में योजनाओं का तुलनात्मक अध्ययन

करने की नई आदत विकसित हो चली है।

देश में विकास मॉडलों की तुलना लोकतंत्र के लिए बेहतर

लेकिन इसमें असली बात को ध्यान में रखना होगा कि जनता को अपने पैसे के खर्च का

हिसाब समझने की अच्छी आदत हो चली है। राजनीतिक विवाद की वजह से भले ही

भाजपा ने केजरीवाल को नीचा दिखाने के लिए मुफ्त योजनाओं की काफी चर्चा की। यहां

तक कि चुनाव में पराजय के बाद भी भाजपा समर्थक मुफ्तखोरी की वजह से पराजय की

दलील देने से नहीं चूके। लेकिन अब इसी शिकायत से सवाल यह भी खड़ा हो चुका है कि

दरअसल योजनाओं के मद में कोई भी सरकार जो पैसा खर्च करती है, वह दरअसल जनता

का ही पैसा होता है। इस क्रम में यह भी याद रखना होगा कि बार बार केजरीवाल ने इस

बात का भी उल्लेख किया है कि सामान्य आधारभूत विकास योजनाओं की लागत कम

कर भी उनकी सरकार ने काफी पैसे बचाये हैं। इसलिए जब विकास योजनाओं की तुलना

होगी तो आने वाले दिनों में योजनाओं की लागत पर भी सवाल उठेंगे। देश में कौन सी

योजना पर कितना धन खर्च हो, यह तय करना सरकार का काम है। लेकिन चूंकि यह पैसा

जनता का है इसलिए जनता को इसका हिसाब मांगने का अधिकार पहली बार दिल्ली के

चुनाव में पता चला है। जाहिर है कि आने वाले दिनों में अन्य राज्यों में भी विकास

योजनाओं पर होने वाले खर्च और उनकी उपयोगिता पर वहां की जनता भी सवाल पूछना

प्रारंभ करेगी। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह भी एक शुभ संकेत ही है।

पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए यह एक कठिन चुनौती

दूसरी तरफ पारंपरिक राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए यह एक कठिन चुनौती बनने

जा रही है क्योंकि दिल्ली के विधानसभा चुनाव के पहले तक किसी भी राजनीतिक दल ने

सीना ठोंककर यह नहीं कहा था कि अगर उनका काम जनता को पसंद नहीं आया है तो

जनता उन्हें वोट नहीं दे। अब अन्य राज्यों में भले ही राजनीतिक दल इतना साहस नहीं

जुटा पायें लेकिन जनता को ऐसे सवालों के आधार पर भी राजनीतिक फैसले लेगी। खास

तौर पर देश में शिक्षा की स्थिति पर दिल्ली के सरकारी स्कूलों में गुणात्मक सुधार एक

मॉडल के तौर पर सामने आ चुका है। हम यह देख भी रहे हैं कि दिल्ली जैसे महंगे शहर में

निजी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई की मजबूरी सिर्फ एक राज्य सरकार की बेहतर पहल की

वजह से समाप्त हो चुकी है। जाहिर है कि अन्य राज्यों में भी निजी स्कूलों का आर्थिक

दबाव अभिभावकों के लिए आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। ऐसे में अगर अन्य राज्य भी

शिक्षा के इसी मॉडल पर काम प्रारंभ करें तो शिक्षा के नाम पर चल रही दुकानदारी को

समाप्त करने की दिशा में एक अच्छी बात होगी। वर्तमान में सरकारी स्कूलों में होने वाले

खर्च और वेतनादि के भुगतान के बाद भी अगर वे ठीक से पढ़ा नहीं पा रहे हैं तो इससे

अंततः राष्ट्रीय नुकसान तो हो रहा है। इस नुकसान को रोकने के उपाय से भी हम देश की

अर्थनीति को और मजबूत करने की दिशा में कुछ बेहतर कर पायेंगे।

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