राफेल सौदे में भ्रष्टाचार निरोधक शर्त को सरकार ने हटाया

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एन राम

(द हिंदू से साभार)

राफेल डील पर नये सवाल खड़े करने के बाद प्रसिद्ध पत्रकार एन राम ने इसे छोड़ा नहीं हैं।

उन्होंने अपनी लेखनी जारी रखी है।

श्री राम ने अपनी प्रथम रिपोर्ट में एक पत्र का आधा हिस्सा छापने के बाद मचे बवाल के बीच

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को भी निशाने पर लिया है।

श्री राम ने सोशल मीडिया में तथा मीडिया से बात-चीत करते हुए साफ कहा है कि

उस महिला का इस डील से कोई लेना देना ही नहीं है।

इसलिए उसे चुपचाप बाहर रहना चाहिए।

वह ऐसे लोगों को बचाने की कोशिश कर रही हैं, जो अंततः बचने वाले नहीं हैं।

वैसे द हिंदू के एक एक कर इस मुद्दे पर रिपोर्ट सामने लाने से बोफोर्स तोप सौदे की याद आ रही है।

लिहाजा पुराने अनुभव से यह समझा जा सकता है कि द हिंदू और एन राम

अभी इस पूरी डील पर नये दस्तावेजों को भी सामने ला सकते हैं।

इस बार के लेख में एन राम ने अरबों रुपये की राफेल डील से भ्रष्टाचार विरोधी शर्त हटाने जाने का उल्लेख किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस बार एक नये पत्र को सामने लाते हुए बताया गया है कि

इस डील की जानकारी रखने वाले कई अन्य लोगों ने भी इसकी शर्तों की

गड़बड़ियों का उल्लेख करते हुए उसमें सुधार की मांग की थी।

वित्तीय सलाहकार सुधांशु मोहंति के लिखे नोट को इस बार प्रकाशित किया गया हैं,

जिसमें इस किस्म के समझौते में बरती जाने वाली सावधानियों को नजरअंदाज किये जाने का उल्लेख है।

रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर

ने आठ सुझावों को शामिल करने का फैसला लिया था।

राफेल डील पर कई अधिकारियों की नोटिंग भी अब सामने आयी

इस डील की कमेटी में शामिल वाइस एडमिरल अजीत कुमार ने इसमें एक नोट शामिल किया है,

जिसके मुताबिक इस पूरे सौदे में सामान्य गैरवाजिव प्रभाव अथवा एजेंसी कमिशन

और कंपनी के लेखा का विवरण उपलब्ध कराने की शर्त को हटाने की बात है।

आम तौर पर हर रक्षा सौदे में यह शर्त शामिल होता है लेकिन राफेल डील में इस शर्त को छोड़ दिया गया है।

और यह काम भारत सरकार की तरफ से ही किया गया है।

द हिंदू के पास उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह दावा किया गया है कि

भारतीय पक्ष में शामिल तीन लोगों एमपी सिंह, एआर सूले और राजीव वर्मा ने

इन गड़बड़ियों को सुधारने की टिप्पणी की थी।

भारतीय पक्ष की तरफ से भारत सरकार द्वारा खरीदे जा रहे विमान संबंधी लेनदेन

किसी देश की सरकार को नहीं करते हुए किसी निजी कंपनी को किये जाने पर भी आपत्ति जतायी गयी थी।

इन तमाम लोगों ने बार बार यह चेतावनी दी थी कि किसी निजी कंपनी के साथ

इस किस्म के लेनदेन में इस किस्म की शर्तों का होना जरूरी है।

वरना बाद में दिक्कतें आ सकती हैं।

सामान्य रक्षा समझौतों के लिए बने गाइड लाइनों को डीपीपी 2013 के नाम से जाना जाता है।

इसी के तहत राफेल विमान का भी सौदा हुआ है।

लेकिन दस्तावेजों के अध्ययन से अब इस बात का खुलासा हो रहा है कि

निजी कंपनी के साथ लेनदेन करते वक्त सरकार ने

दलाली और तकनीकी ट्रांसफर संबंधी आवश्यक शर्तों को हटा दिया है।

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