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भूखे बेबसों की भी सुध ले सरकार वह खुद को कुछ समझते नहीं

संवाददाता

रांचीः भूखे बेबसों की सुध लेने वाला फिलहाल कोई नहीं है। कुछ सामाजिक संगठनों का

ध्यान इस तरफ गया है। लेकिन इस दिशा में सरकारी स्तर पर भी कुछ ठोस प्रबंध

किये जाने की जरूरत है। कल शाम तकरीबन 7:00 बजे एक मानसिक रूप से अस्वस्थ

व्यक्ति अपनी भूख मिटाने के लिए सड़े हुए संतरे से अपनी भूख मिटाने का प्रयास कर

रहा था। यह नजारा वहां का था, जिसके ठीक सामने एक किराना दुकान खुली हुई थी

और अपनी सामान महंगे दाम पर बेचते दुकानदार को इस बेबस पर जरा भी तरस नहीं

आयी। जब राष्ट्रीय खबर के पत्रकार ने यह दृश्य देखा तो उस लाचार के खाने के लिए

कुछ व्यवस्था की और एक पानी का बोतल दिया। लेकिन लॉकडाउन जैसी इस स्थिति

में किसी एक के लिए व्यवस्था कोई चुनौती नहीं है। रांची की सड़कों की बात करें तो

सैकड़ों ऐसे लोग सड़कों पर जीवन गुजारते हैं जिनके पास अपने स्तर से खाने का कोई

इंतजाम भी नहीं है। लॉकडाउन की वजह से ऐसे लोग भले ही मुख्य सड़कों पर से हट

गये हो लेकिन वे आस पास की गलियों में मौजूद हैं। इनके लिए कई संगठनों द्वारा

भोजन की व्यवस्था की गयी है जो पर्याप्त नहीं है। आम नागरिकों के लिए किये जाने

वाले तमाम प्रबंधों के बीच सरकारी स्तर पर ऐसे बेबस और लाचार लोगों के लिए भी

अलग से कोई इंतजाम किया जाना चाहिए।

भूखे बेबसों को तो पता भी नहीं कि क्या है

खास तौर पर जो मानसिक तौर पर कमजोर है, उनके लिए भोजन का प्रबंध इसलिए भी

जरूरी है क्योंकि उन्हें यह पता भी नहीं है कि आखिर यह स्थिति क्या है। सड़क से

गुजरते लोगों को तरस आने पर कुछ अवश्य ऐसे लोगों को मिल जाता है, लेकिन यह

भी किसी भी कीमत पर पर्याप्त तो नहीं है। सरकारी महकमे को इस तरफ भी ध्यान

देना चाहिए और जो इतनी समाज सेवक संस्थाएं हैं उन्हें भी ध्यान देना चाहिए कि एक

सुनिश्चित जगह पर ही नहीं बल्कि शहर में भ्रमण कर कर ऐसे लोगों को चिन्हित कर

उसे भोजन उपलब्ध करवाएं। अनेक संगठनों के द्वारा भूखे लोगों को मुफ्त में भोजन

का इंतजाम किया गया है। लेकिन इन भूखे बेबसों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए

क्योंकि यह खुद ही नहीं जानते कि क्या माजरा है और वह इस सन्नाटे में कहां जाएं।


 

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