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एक नये आंदोलन की नींव इस कोरोना संकट के दौरान रख रही है सरकार

एक नये आंदोलन की नींव इस कोरोना संकट के दौरान रखी जा रही है। देश भर की सड़कों

पर पैदल अपने घर की तरफ चलते मजदूर अपने मन में क्या कुछ सोच रहे हैं, इसे

समझना जरूरी है। यह कोरोना संकट के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों की बेरुखी से

उपज रहा आक्रोश है। जो अगर संगठित हुआ तो देश की राजनीति में भूचाल ला देगा। वैसे

भी यह कोरोना संकट यह दर्शा रहा है कि दरअसल सरकारी व्यवस्था की प्राथमिकताएं

क्या होती हैं। आम तौर पर सरकार के इस गुप्त सोच का पता नहीं चल पाता। कोरोना जैसे

लंबे समय तक चलने वाले आपात संकट ने इसे समझने का स्पष्ट अवसर प्रदान किया है।

एक नये आंदोलन की नींव इसलिए भी रखी जा रही है क्योंकि आर्थिक पैकज में मजदूरों

और किसानों का उल्लेख किये जाने के बाद भी साधनहीन पैदल यात्री मजदूरों के लिए

कोई त्वरित फैसला नहीं लिया जा सका है। प्रधानमंत्री मोदी अथवा उनके सहयोगी अगर

चाहते तो त्वरित व्यवस्था के तौर पर सड़कों पर पैदल चलते लाखों मजदूरों के लिए भी

कोई आपात इंतजाम की घोषणा कर सकते थे। जिस तरीके से जनधन खाते में लोगों को

पैसे दिये गये हैं, ऐसे पैदल चलते मजदूरों के लिए भी कमसे कम सम्मानजनक तरीके से

विश्राम करने और दो वक्त के भोजन का निर्देश जारी करना कोई कठिन काम नहीं था।

निश्चित तौर पर यह अस्थायी व्यवस्था होती तो सड़कों पर से गांव लौटने वालों का क्रम

समाप्त होते ही खुद ही समाप्त हो जाती। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है।

एक नये आंदोलन की नींव इसलिए क्योंकि वे नाराज हैं

इसी वजह से एक नये आंदोलन की नींव रखी जा रही है, यह तय हो रहा है। झारखंड की

बात करें तो प्रवासी मजदूरों की वापसी से गांव में अच्छा माहौल भी है लेकिन साथ ही

कोरोना संक्रमण का खतरा भी बढ़ा है। दरअसल सकुशल घर लौट आने की खुशी में ऐसे

प्रवासी मजदूर खुद को क्वारेंटीन में नहीं रख रहे हैं। इस अभ्यास को सख्ती से साथ रोके

जाने की जरूरत है। इनकी संख्या पंचायत और गांव के स्तर पर देखें तो इतनी अधिक

नहीं है कि उन्हें रोका न जा सके। सिर्फ संबंधित गांव के लोगों को इसके खतरों के बारे में

फिर से बताने और सावधान करने की जरूरत है। अकेले झारखंड में 6.85 लाख लोगों को

लौटना है। इनमें से करीब 80 हजार लौट भी चुके हैं। राज्य के विभिन्न इलाकों स्टेशनों पर

श्रमिक स्पेशल ट्रेनें पहुंच रही हैं। लेकिन जो मजदूर पैदल चल रहे हैं अथवा पैदल चलते

चलते थककर रेलवे पटरी पर बैठकर सो जाने वाले मृत मजदूरों के परिचितों के मन में इस

व्यवस्था के प्रति कोई आक्रोश पैदा नहीं हुआ होगा, यह सोचना ही मुर्खता है। बिहार के

भागलपुर में भी एक ऐसे ही मजदूर ने अपनी राज्य सरकार के उदासीन रवैये के प्रति खुली

नाराजगी जतायी है। इधर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने फिर दोहराया है कि अन्य

राज्यों में फंसे हर झारखंडी को सकुशल घर वापस लाने के लिए राज्य सरकार गंभीर है।

ट्रेनों के पहुंचने के बाद मजदूरों के स्वागत के बाद विधिवत उनकी जांच तथा स्टेशन के

बाहर ही उनके गंतव्य तक जाने के लिए बस की व्यवस्था एक बेहतर पहल है।

अन्य राज्यों के मुकाबले झारखंड की व्यवस्था बेहतर है

यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य राज्यों के मुकाबले झारखंड ने इसमें बाजी मारी है। लेकिन

झारखंड के प्रवासी मजदूरों की संख्या भी कोई कम नहीं है। एक नये आंदोलन की नींव इन

मजदूरों के लौटने से ग्रामीण इलाकों में भी प्रारंभ होगी। महानगरों और अन्य विकसित

इलाकों से खाली हाथ लौटे इन मजदूरों को भी रोजगार का साधन चाहिए। इनमें से

अधिकांश मन में यह ठानकर ही लौटे हैं कि बहुत मजबूरी नहीं हो तो वे अब गांव छोड़कर

नहीं जाएंगे। ऐसे में स्थानीय स्तर पर मनरेगा के तहत रोजगार के साधन सृजित करने के

क्रम में यह समझा जाना चाहिए कि प्रवासी मजदूरों को स्थानीय लोगों के मुकाबले श्रम

कानून और भुगतान संबंधी प्रक्रियाओं की बेहतर जानकारी है। इसलिए मनरेगा अथवा

ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओँ में फर्जी मस्टररोल के नाम पर जो कुछ होता रहा है,

वह शायद अब करने में एक नये आंदोलन की नींव नजर आने लगेगी। दूसरी तरफ जिन

इलाकों स ऐसे प्रवासी मजदूर लौट आये हैं, वहां के उद्योगों को संचालित करने के लिए भी

अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता तो निश्चित तौर पर है। इस मानव संसाधन के

बिना उद्योगों का सही तरीके से संचालन भी नहीं हो सकता है। लिहाजा वहां इस बारे

बुलाये गये मजदूर भी कोरोना संकट के अनुभव का फायदा उठाकर अपनी शर्तों को पहले

से तय करेंगे। इस वजह से कोरोना काल के दौरान श्रम कानूनों में उलटफेर का जो

गोरखधंधा चला है, उसके साथ भी टकराव तय है जो एक नये आंदोलन की नींव रख देगी।


 

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