असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्यर्मा मा अमृत गमय

असतो मा सद्गमय,

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्यर्मा मा अमृत गमय।



यानी (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥
यह एक ऐसा मंत्र है, जिसे हम अक्सर ही बचपन से सुनते आये हैं।

लिहाजा यह सवाल प्रासंगिक है कि इस मंत्र और उसके अर्थ को बार बार बतलाने का तात्पर्य क्या हो सकता है।

दरअसल अगर पर हिंदू मान्यताओं पर विश्वास करें तो दरअसल ईश्वर का स्वरुप ही परम प्रकाश है।

हम एक अंधकार के बीच से उसी प्रकाश की तलाश में अपनी यात्रा पर निकले हैं।

वर्तमान दौर में अगर इन्हीं वाक्यों (श्लोकों) पर ध्यान दें तो यह हमें बार बार अपने गंतव्य के बारे में याद दिलाता रहता है।

आज की पढ़ने लिखने वाली युवा पीढ़ि स्मार्ट मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल करती है।

कहीं भी जाने के लिए वे अक्सर गूगल मैप से पता जान लेते हैं।

जब यात्रा प्रारंभ होती है तो उनके मोबाइल का गूगल मैप उन्हें रास्ता दिखलाता जाता है।

किसी स्थान पर अगर उनकी गाड़ी गलत दिशा में चली गयी तो गूगल आगे से कैसे अपने रास्ते पर लौटना है, यह भी बताता रहता है।

दरअसल यह श्लोक भी जीवन यात्रा का वही संदेश है जो हमें बार बार यह बताता है कि

अंधकार से प्रकाश की तरफ जाना है। हम सारे के सारे एक अंधकार में बसे है।

जीवन दिख रहा है पर हक़ीक़त में यह जीवन किसी भी मूल्य का नहीं है जब तक हम यह ना जान ले की जीवन है क्या।

असतो मा सद्गमय याद दिलाता है कि क्या मिथ्या है और क्या सत्य है

जीवन वह यात्रा है जो अंधकार से प्रकाश की और ले जाती है।

हमे इसीलिए ही मानव जीवन मिला है कि हम उन रहस्यों को जाने पहचाने और अपना यह जीवन सफल बनाये।

पर हम लोग यह नहीं करते। बल्कि दूसरे विषयो में खो जाते है।

माया के इस संसार में हम माँ, बाप, भाई, बहन, बीवी, बच्चे, और अन्य किसी भी रिश्ते में खो जाते है और अपना समझने लगते है।

यह जीवन ही जब एक कल्पना से अधिक कुछ नहीं है तो वास्तविकता का तो सवाल ही नहीं उठता।

यह सब एक सपना है। जैसे रात को हम देखते है वैसे एक स्वप्ना है।

हमको यह असल लगता इसीलिए है कि हम खुद एक करैक्टर बनकर आये है।

सपने में सब असल ही लगता है जब रात को देखते है क्योंकि तब हम खुद उसमें होते है।

इसलिए व्यवहारिक शब्दों में हम यह भी समझ सकते हैं कि जीवित और जागे हुए अवस्था में हम जो कुछ देखते समझते हैं दरअसल वह भी एक बड़ी फिल्म का छोटा सा हिस्सा भर है।

फिल्म के इस छोटे से हिस्से में हम (मैं) खुद भी अभिनेता है।

लेकिन दरअसल में यह जीवन नहीं है।

यह जीवन में मिथ्या जगत की कुछ भ्रांतियां है, जो या तो हमलोगों ने खुद बनायी है

अथवा हमारे आस-पास के माहौल ने हमें ऐसा महसूस करने पर विवश कर दिया है।

मनुष्य का मस्तिष्क चिंतनशील होता है।

उसे केंद्रित कर हम अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ सकते हैं।

यह मंत्र हमें उसकी भी बार बार याद दिलाता रहता है।

जीवन एक खास लक्ष्य को प्राप्त करने की एक यात्रा भर है

याद दिलाने का असली मकसद हमें अपने रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है।

यह तो एक यात्रा है उसके सिवा कुछ नहीं है। अंधकार से तेजोमय की यात्रा।

अंधकार से प्रकाश की यात्रा। अंधकार से जीवन की यात्रा। और जीवन से ब्रह्म की यात्रा।

जीवन मिला है तो यात्रा का आरम्भ कीजिये। इसके लिए किसी विशेष ज्ञान अथवा विशेषज्ञता की भी जरूरत नहीं है।

हर इंसान अच्छा और बुरे की पहचान कर सकता है।

जो चोरी करता है, उसे अच्छी तरह पता होता है कि वह गलत कर रहा है।

इसलिए ईश्वर के पथ पर आगे बढ़ने के लिए किसी खास जाति अथवा सोच का होना भी जरूरी नहीं है।

आप सत्य की तरफ बढ़ना चाहते हैं, इसे बार बार दोहराते रहिये और अपने आप में अपेक्षित और प्रासंगिक सुधार के साथ जीवन पथ पर आगे बढ़ने में यह श्लोक हमें रास्ता बताता रहता है।

इस पथ पर आगे बढ़ने के दौरान इस जीवन के अन्य विषयों से आपका ध्यान विचलित तो होगा, क्योंकि यही स्वाभाविक है।

लेकिन इनके बीच से अपने गंतव्य को याद रखना ही दरअसल ईश्वर की असली आराधना है।

उसके लिए हमें किसी किस्म की अतिरिक्त ज्ञान की जरूरत भी नहीं है।

इस पथ पर आगे बढ़ने हुए जब हमें ईश्वर की अनुभूति हो तो आपका मन और दिमाग आपको खुद शेष का रास्ता बताता चला जाएगा।

यानी ईश्वर की अनुभूति होना ही ईश्वर के बिल्कुल करीब पहुंचने का संकेत है।

उसके बाद रास्ता भटकने की आशंका बहुत कम होती है,

वशर्ते आपने अपने इंद्रियों को नियंत्रित किया हो क्योंकि वे भी आदतन चंचल होती हैं।

 



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