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दैत्याकार सारस भी उस दौर के किसी डायनासोर से कम नहीं था

  • करीब एक सौ मिलियन वर्ष पूर्व मौजूद था धरती पर

  • उत्तरी अमेरिका के इलाकों में रहा करता था यह जीव

  • लंबी पूंछ की मदद से पानी में सामान्य तैर सकता था

  • खोपड़ी और जबड़े की बनावट बताती है कि मांसाहारी था

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दैत्याकार था लेकिन था सारस ही। आज के दौर में भी हमलोग जिस तरीके से सारस

अथवा बगूले को पानी के किनारे शिकार करते हुए देखते हैं, ठीक उसी तरह यह प्राणी भी

प्राचीन जगत में शिकार किया करता था। उत्तरी अमेरिका के इलाके में हुए खनन के

दौरान जब इनके अवशेष मिले थे तो उनकी पहचान और शरीर के गठन पर लगातार काम

हो रहा था। इन फॉसिलों की जांच से यह पता चला कि यह अवशेष करीब एक सौ मिलियन

वर्ष पुराने हैं। उसके बाद शरीर के हिस्सों की संरचना को गढ़ने का काम किया गया। जब

यह काम पूरा हो गया तब जाकर यह पता चला कि यह दरअसल कैसे प्राणी होता था, जो

काफी पहले ही इस धरती से विलुप्त हो चुका है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह स्पिनोसॉरस

प्रजाति का जीव है। यह आकार में 50 फीट तक का होता था। इसलिए वह पानी के किनारे

रहकर छोटे शिकार को ठीक उसी तरीके से पकड़ता था, जिस तरीके से आज के दौर के

सारस अथवा बगूले शिकार किया करते हैं। उसके शरीर की संरचना भी काफी हद तक

सारस से मिलती है। वैसे यह विलुप्त जीव अपने जीवन काल में समुद्र के छोरों पर ही

निवास किया करता था। 


समुद्र विज्ञान की कुछ रोचक खबरों को यहां पढ़ें


अमेरिकी और ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने अगर यह सारस के जैसा

नहीं था तो यह बगूला की शारीरिक संरचना वाला प्राणी रहा होगा। लेकिन दैत्याकार होने

की वजह से उसके छोटे शिकार भी कितने बड़े होते होंगे, इसका सहज ही अनुमान लगाया

जा सकता है। फॉसिल से उसके शरीर का जो ढांचा तैयार किया गया है, उसके मुताबिक

अपनी लंबी पूंछ की मदद से वह पानी में काफी तेजी से तैर भी सकता था। लंदन के क्वीन

मेरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस बारे में अपनी राय सार्वजनिक की है। 

दैत्याकार जीव की मूल आकृति को बनाने में काफी समय लगा

शोध से जुड़े लोग मानते हैं कि यह सारस अथवा बगूला जैसा ही प्राणी था जो न तो पूरे

समय तक पानी में रहता है और न ही हमेशा जमीन पर मौजूद रहता है। यह दोनों

प्रजातियां पानी के आस पास मंडराते हुए अपना शिकार करती रहती है। यह स्पष्ट हो गया

है कि यह दरअसल एक मांसाहारी प्राणी ही था क्योंकि उसके जबड़े की बनावट कुछ ऐसी

ही है। इसके अवशेष पहली बार वर्ष 1915 में पाये गये थे। लेकिन उस दौरान यह कौन सा

प्राणी है, उसका पता नहीं चल पाया था। उस वक्त ऐसा माना गया था कि यह डायनासोर

प्रजाति का ही कोई जीवन रहा होगा। लगातार इस पर शोध जारी रहने के बाद अब जाकर

यह निष्कर्ष निकल पाया है। क्वीन मेरी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ डेविड

होन कहते हैं कि उनकी जांच पहले से जिन प्रजातियों की पुष्टि हो चुकी है, उनसे मिलान

पर आधारित थी। हर तरफ से जांच लेने के बाद ही वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह सारस

अथवा बगूला जैसा प्राणी था, जो वास्तव में दैत्याकार था। इस बारे में प्रकाशित शोध प्रबंध

के सह लेखक और मैरीलैंड विश्वविद्यालय के प्रमुख प्राध्यापक टॉम होल्ट्ज कहते हैं कि

यह दरअसल डायनासोर काल का लेकिन दूसरी प्रजाति का जीव है।

रिसर्च से पता चला कि यह भिन्न प्रजाति का प्राणी है

इस स्पिनोसॉरज प्रजाति की शारीरिक संरचना कुछ ऐसी थी कि वह वर्तमान काल में वैसे

भी जीवित नहीं रह पाता। एक एक कर जब उसकी बनावट को अंतिम रुप प्रदान किया

गया तब जाकर पूरा ढांचा तैयार हो पाया है। तैयार होने के बाद ही इस दैत्याकार प्राणी के

आचरण के बारे में भी वैज्ञानिक किसी निष्कर्ष पर पहुंच सके हैं। उसके पूंछ की बनावट

कुछ ऐसी है कि वह पानी में मगरमच्छ की तरह तेजी से तैर नहीं सकता था। लिहाजा उसे

अपना शिकार पानी के छोर पर ही पकड़ना पड़ता था। शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि

अभी इसके बाद भी इस प्रजाति के जीव पर बहुत अनुसंधान बाकी है। इन अनुसंधानों से

ही इसकी प्रजाति और डायनासोर से उनके रिश्तों के बारे में और बेहतर जानकारी आने

वाले समय में मिल पायेगी


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