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दो वैज्ञानिकों ने कहा कि साक्ष्य कोरोना वायरस बनाने के ही है

  • अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेश के बाद से फिर से संदेह

  • जिनोम में खास बदलाव मानव निर्मित ही है

  • ऐसा प्राकृतिक तौर पर तो नहीं हो सकता है

  • अब लीक हुआ कि किया गया, यहां पता नहीं

राष्ट्रीय

रांचीः  दो वैज्ञानिकों ने फिर से कोरोना वायरस के बार में यह संदेह किया है कि इसे शायद

प्रयोगशाला में जेनेटिक संशोधन कर तैयार किया गया है। इसके काम करने के तरीकों से

यह कोई प्राकृतिक वायरस प्रतीत नहीं होता है। यह बयान तब आया है जबकि अमेरिकी

राष्ट्रपति जो बिडेन ने इस संबंध में नये सिरे से सारे तथ्यों को जांचने के आदेश दिये हैं।

इसी क्रम में पहली बार यह भी पता चला है कि अमेरिकी सरकार की तरफ से भी वुहान की

इस प्रयोगशाला को काफी पैसे दिये गये थे। जिसकी जांच अब प्रारंभ हो चुकी है।

दो वैज्ञानिकों डॉ स्टीवन क्वैरी और रिचर्ड मूलर ने इस वायरस के मानव निर्मित होने के

बारे में पहली बार दो मुद्दों की तरफ सभी का ध्यान आकृष्ट किया है। दोनों का मानना है

कि कोविड 19 के वायरस का जो स्वरुप है, उसमें जेनेटिक बदलाव किये जाने के संकेत

मिलते हैं। साथ ही इसे जल्द से जल्द संक्रमण को फैलने के हथियार से सुसज्जित किया

गया है ताकि उसका पता चलने के पहले ही वह बहुत दूर तक फैल जाए। इन दो वैज्ञानिकों

के इस निष्कर्ष को दूसरे वैज्ञानिक तुरंत खारिज भी नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा है कि

वायरस को अधिक मारक बनाने और खुद को छिपाये रखने के लिए उसके जिनोम में

संशोध किये गये हैं। दोनों ने कहा है कि दरअसल किसी भी वायरस के दो जिनोम, जिनमें

आरजिनी एमिनो एसिड होता है, उसकी जोड़ी बनती है। ऐसी कुल 36 संभावित जोड़ियां

किसी भी वायरस में बनायी जा सकती है। एक खास किस्म की जोड़ी ही यह काम करती

है, जो प्राकृतिक नहीं होती। जिनोम की इन दो जोड़ियों के एक साथ होने पर यह मारक

क्षमता बढ़ जाती है।

दो वैज्ञानिकों ने जिनोम की संरचना की व्याख्या की है

चमगादड़ो में पाये जाने वाले वायरस में जिनोम की यह श्रृंखला नहीं है। इससे सवाल

उठना लाजिमी है कि फिर यह बदलाव किसने किया है। जेनेटिक वैज्ञानिकों की परिभाषा

में इस स्थिति को डबल सीजीजी कहा जाता है, जिसमें दो ऐसे जिनोम चालाकी से एक

दूसरे के बगल में रख दिये जाते हैं। अब चमगादड़ों अथवा दूसरे जानवरों से इंसानों तक

आने वाले वायरस का स्रोत क्या था, उसे भी समझने की जरूरत है। दो वैज्ञानिकों ने कहा

है कि यह ऐसा काम है, जिसे दूसरे जेनेटिक वैज्ञानिक इन जिनोम श्रृंखलाओँ का अध्ययन

कर समझ सकते हैं। बता दें कि क्वैरी एटोसा थेरापुटिक्स के संस्थापक हैं और मूलर

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में भौतिकी पढ़ाते हैं। वह पहले लॉरेंस बर्कले नेशनल लैब

से भी जुड़े रहे हैं। इस जिनोम श्रृंखला में बदलाव के आधार पर ही दोनों मानते हैं कि इसे

प्रयोगशाला में जिनोम संशोधन के साथ तैयार किया गया था। अब वह जानबूझकर बाहर

निकाला गया अथवा गलती से बाहर चला गया, यह जांच का विषय है। इस वायरस के बारे

में अमेरिकी वैज्ञानिक सलाहकार डॉ एंथोनी फॉसी ने पहले ही यह बयान दिया था कि यह

वायरस मानव निर्मित है लेकिन यह वुहान की लैब में ही हुआ है, इस बारे में वह यकीनी

तौर पर कुछ नहीं कर सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि वुहान शहर से ही इस वायरस के

हमले का पता चला है। अमेरिकी सीनेट अब उनसे इस चीनी प्रयोगशाला को अमेरिकी

एजेंसियों द्वारा दिये गये पैसे के बारे में भी जानकारी चाहती है। समझा जाता है कि यह

अमेरिकी अनुदान सिर्फ यह जांचने के लिए था कि क्या यह वायरस चमगादड़ों से इंसानों

तक पहुंच सकता है।

सार्स और मार्स वायरस बिल्कुल प्राकृतिक थे

इधर वायरस के मानव निर्मित होने के दावा करने वाले इन दो वैज्ञानिकों ने कहा है कि

सार्स और मार्स वायरस के बारे में यह स्पष्ट हो चुका है कि दोनों ही प्राकृतिक वायरस थे।

वे अपनी प्रकृति की वजह से इंसानों के संपर्क में आने के बाद तेजी से फैल गये थे। यह

दोनों वायरस फैलते जाने के क्रम में खुद में बदलाव भी करते चले गये। लेकिन कोविड 19

वायरस का मामला ही दूसरा है। वायरस के जिनोम श्रृंखला में डबल सीजीजी होना ही यह

दर्शाता है कि इसके जिनोम में छेड़छाड़ की गयी है। अब यह छेड़छाड़ किसी प्रयोगशाला में

ही की जा सकती है, इसे समझने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता भी नहीं है।

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