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जेनेटिक्स की मदद से कोविड उपचार का मार्ग तलाश रहे वैज्ञानिक

  • पहले से मान्यता प्राप्त दवाओं की संरचना में बदलाव की सोच

  • इससे अस्पतालों पर पड़ रहा अतिरिक्त बोझ कम होने लगेगा

  • मरीजों की हालत गंभीर होने के पहले ही रोग की रोकथाम

  • दो प्रोटिनों पर नजरदारी से संक्रमण को रोका जाएगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जेनेटिक्स की मदद से वैज्ञानिक वैसी दवा तलाश रहे हैं तो कोरोना संक्रमण को

प्रारंभ में ही रोक दे। दरअसल इसके लिए शोधकर्ताओं ने उन दोनों प्रोटिनों पर अपना

ध्यान केंद्रित किया है, जिनकी मदद से कोरोना का वायरस इंसान की शरीर में प्रवेश करने

के बाद अपनी वंश वृद्धि करता है। इस पद्धति के ईलाज को कारगर घोषित करने के लिए

उनके क्लीनिकल ट्रायल को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की वकालत भी की गयी

है। जेनेटिक्स में सिर्फ अभी आईएफएनएआर 2 और एसीई 2 पर वैज्ञानिकों का ध्यान है।

शरीर में वायरस के सक्रिय होने के पीछे इन्हीं दो प्रोटिनों की भूमिका होती है। वैज्ञानिक

मानते हैं कि अगर जेनेटिक्स की बदौलत इन दो प्रोटिनों को कोरोना प्रतिरोधक के तौर पर

बना दिया गया तो यह विश्वव्यापी कोरोना महामारी की समस्या जड़ से ही समाप्त की जा

सकती है। शोधकर्ताओं ने बताया है कि अब भी दुनिया में कई ऐसी दवाएं हैं, जो अन्य

कारणों से मान्यता प्राप्त हैं। लेकिन उन्हें कोरोना के ईलाज के तौर पर मान्यता देने से

पहले उनका क्लीनिकल ट्रायल तो किया जाना चाहिए। इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा

कि अभी कोरोना की वजह से दुनिया भर के अस्पतालों पर जो कोरोना संक्रमण का दबाव

पड़ा हुआ है वह तुरंत ही समाप्त हो जाएगा। सभी ऐसे रोगी अपने अपने घरों में रहकर ही

अपना ईलाज खुद कर पायेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि यह शोध दल, जिसमें कई प्रमुख

संस्थानों के लोग एक साथ काम कर रहे हैं, किसी नई दवा के आविष्कार की सलाह नहीं

देता। इस शोध दल का नेतृत्व करने वाले बोस्टन वेटेरंस अस्पताल के डाक्टर जुआन पी

कैसास कहते हैं कि कई दवाएं मौजूद हैं लेकिन उन्हें दूसरे किस्म के ईलाज के लिए

मान्यता दी गयी है।

जेनेटिक्स की मदद से पहले से प्रचलित दवाओँ पर ही ध्यान

लिहाजा कोरोना मरीजों के उपचार के लिए इन दवाओं के प्रयोग से पहले उनका

क्लीनिकल ट्रायल होना जरूरी है। डॉ. कैसास के साथ इस शोध में यूनिवर्सिटी ऑफ

कैम्ब्रिज, यूरोपियन बॉयोइंफार्मेटिक्स इंस्टिट्यूट (इंग्लैड) और इटली के इंस्टिट्यूटो

इटालियानों टेक्नोलॉजिया के वैज्ञानिक जुड़े हुए हैं। जिन दवाओँ पर कोरोना के ईलाज के

लिए ट्रायल करने की बात कही गयी है, उनमें से एक तो गंभीर किस्म के सोलाइरोसिस के

ईलाज के लिए मान्यता प्राप्त है। सेंट्रल नर्वस सिस्टम के उलट पुलट होने की स्थिति में

इस दवा का प्रयोग होता है। इसके अलावा कोरोना महामारी के फैलने के पहले ही तैयार की

गयी एक और दवा भी एसीई 2 की थैरापी में काम आ सकती है जो सांस लेने की तकलीफों

में कारगर है।

इस शोध के बार में डॉ कैसास ने कहा कि जब पिछली गर्मी में यह शोध प्रारंभ किया गया

था तो हमारे लिए कोरोना वायरस बिल्कुल नया था। सारे कोविड दवाओं के ट्रायल सिर्फ

अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर हो रहे थे। धीरे धीरे इसके पीड़ितों की संख्या बढ़ती चली

गयी तो इसके और विवरण भी सामने आते चले गये। इसी वजह से सिर्फ गंभीर किस्म के

मरीजों को ही अस्पताल ले जाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस विधि को और

आगे बढ़ाने पर काम हुआ है। इसके जरिए किसी भी मरीज को प्रारंभिक अवस्था में ही दवा

के जरिए कोरोना संक्रमण से मुक्त करने की सोच पर काम चलता आया है। ताकि

अस्पतालों पर जो रोगियों का बोझ पड़ा हुआ है, उसे कम किया जा सके।

दूसरी बीमारी के लिए मान्यता प्राप्त कई दवा उपलब्ध है

इस काम को पूरा करने के लिए शोधकर्ताओं ने जेनेटिक्स की मदद ली है। ताकि जो दवा

पहले से ही क्लीनिकल ट्रायल के बाद किसी दूसरी बीमारी के लिए मान्यता प्राप्त है, उसे

कोरोना के ईलाज में भी इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन इसके लिए भी आधिकारिक तौर

पर उन दवाओं का प्राथमिकता के आधार पर क्लीनिकल ट्रायल होना जरूरी है। सैद्धांतिक

तौर पर सब कुछ सही होने के बाद दवा की असली परख तो क्लीनिकल ट्रायल में ही होती

है। जेनेटिक्स की मदद से अधिकांश दवाएं किसी खास इंसानी प्रोटिन पर असर करने

वाली ही होती हैं। इन्हीं दवाओँ में जेनेटिक्स की मदद से बदलाव कर उन्हें सिर्फ कोरोना

वायरस को रोकने के लिए भी तैयार किया जा सकता है। जेनेटिक्स की मदद से ऐसे ईलाज

के लिए उन्होंने एक प्रोटिन का उल्लेख भी किया है. पीसीएसके 9 नाम का यह प्रोटिन दिल

की बीमारी में काम करता है और कोलोस्ट्रोरल को कम करता है। इस सोच के आगे जांच

को आगे बढ़ाते हुए वैज्ञानिकों ने साढ़े सात हजार से अधिक अस्पताल के कोरोना मरीजों

का आंकड़ा एकत्रित किया है। इस शोध से जुड़े भारतवंशी वैज्ञानिक डॉ सुमित्रा मुरलीधर

कहते हैं कि इन्हीं आंकड़ों के आधार पर हम कोरोना मरीजों को अस्पताल तक जाने की

स्थिति में पहुंचने से रोकना चाहते हैं। इसके लिए जेनेटिक्स की मदद से एक दवा एपीएन

01 की खोज हुई है। यह दरअसल बिल्कुल एसीई 2 प्रोटिन के जैसा ही है। जब इसे शरीर में

दिया जाता है तो कोरोना वायरस उसे ही एसीई 2 प्रोटिन समझकर उससे चिपक जाता है।

इस वजह से शरीर के अंदर कोरोना वायरस अपनी वंशवृद्धि नहीं कर पाता है।

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