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जेनेटिक पद्धति के संशोधित न्यूरॉन भी वैकल्पिक अंग बनेंगे

  • इंसानों के आंतरिक अंगों को ठीक करने की नई पहल

  • इंसानी शरीर के गड़बड़ियों को सुधारने की नई कोशिश

  • आंतरिक अंग प्रत्यारोपण से भी मिल जाएगी मुक्ति

  • अब बाहर से नियंत्रित करने की विधि पर काम

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः जेनेटिक पद्धति से शरीर के भीतर बहुत कुछ किया जा सकता है। शोधकर्ता

दरअसल शरीर के अंदर की बीमारियों को ठीक करने की दिशा में इस जेनेटिक पद्धति

को ज्यादा से ज्यादा आजमाना चाहते हैं। अब यह देखा जा रहा है कि क्या जेनेटिक

पद्धति से संशोधित न्यूरॉन भी आंतरिक अंगों को ठीक करने अथवा उनका काम पूरा

करने की जिम्मेदारी उठा सकते हैं। इसके पहले भी इस दिशा में कई प्रयोग सफल और

उत्साहवर्धक साबित हुए है। शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि इन जेनेटिक पद्धति के

संशोधन के न्यूरॉन शरीर के अंदर पहुंचकर वह सारा काम कर सकते हैं, जो उन्हें

निर्देशित किया गया हो। इसी वजह से ईलाज की दुनिया में यह नये आयाम खोल

सकते हैं। जेनेटिक रोबोट की मदद से इंसानी शरीर के अंदर नियमित दवा पहुंचाने के

साथ साथ खराब हो चुके अंगों को सुधारने की दिशा में भी इस तकनीक को

सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है। अब इसी शोध के और परिष्कृत बनाने की दिशा

में वैज्ञानिक कदम बढ़ा चुके हैं।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में हुआ है शोध

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस दिशा में काम भी किया है। इनलोगों ने

जेनेटिक पद्धति से न्यूरॉनों को प्रोग्राम किया है। वे मानते हैं इन संशोधनों से इन

न्यूरॉनों में मौजूद वैद्युतिक आवेश की परिस्थितियां बदल जाती हैं। इससे खास तौर

पर पार्किसंन और मिरगी जैसी बीमारियों से पीड़ित रोगियों को ज्यादा फायदा हो

सकता है। साथ ही नसों के विद्युतीय तरंगों के अवरोध से होने वाली अन्य बीमारियों

को भी पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। जेनेटिक पद्धति के संशोधित न्यूरॉन अपने

तय लक्ष्य की तरफ अवरोध के बाद भी बढ़ जाते हैं। इससे जिस काम के लिए उसे भेजा

गया है, वह हर हाल में पूरा हो जाता है। शोध से जुड़े लोग मानते हैं कि इन संकेतों की

मदद से शरीर के अंदर खराब पड़ चुके अंगों को भी नये सिरे से बनाया जा सकता है।

ऐसे में फिर अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकताएं ही समाप्त हो जाएंगी और रोगी के

खराब अंग सिर्फ जेनेटिक संशोधन की विधि से नये सिरे से ठीक तरीके से काम करने

लगेंगे।

जेनेटिक पद्धति के विकास पर काफी समय से काम जारी

जेनेटिक इंजीनियरिंग की दुनिया में इस काम पर काफी लंबे समय से शोध चल रहा है।

खास किस्म की नसों को इसी संशोधन की वजह से पुनर्जीवित करने की दिशा में भी

उल्लेखनीय प्रगति हुई है। दरअसल इस विधि से हर उस हिस्से के विद्युतीय आवेश की

परिस्थितियों को सही तौर पर लाया जा सकता है, जो किन्हीं कारणों से खराब होने के

बाद काम करना बंद कर चुके हैं। इसी तरीके से हड्डी की खामियों को भी न सिर्फ दूर

किया जा सकता है बल्कि बाहर से मिले संदेशों के आधार पर ये न्यूरॉन ही नये सिरे से

उनकी रचना भी कर सकते हैं। ऐसे में मनुष्य के शरीर के हड्डियों के प्रत्यारोपण की

समस्या से भी स्थायी तौर पर निजात मिल सकती है। इस काम को करने के लिए

वैज्ञानिकों ने पॉलिमर आधारित एंजाइमों की मदद ली है। इस विधि से दिमाग के अंदर

मौजूद शक्ति को भी सही तरीके से काम में लगाया जा सकता है, ऐसा वैज्ञानिक मानते

हैं। ब्रेन के जीवित मेंब्रेन भी इनके जरिए संदेश हासिल कर नया काम भी कर सकते हैं।

ब्रेन के कई हिस्से जो उम्र अथवा अन्य कारणों से काम करना बंद कर चुके हैं, उन्हे भी

नये सिरे से सक्रिय किया जा सकता है। शोध से जुड़े लोगों के अनुसार यह सिर्फ शरीर के

विभिन्न हिस्सों में बिजली की ऊर्जा की बदौलत नये सिरे से ऊर्जा का संचार करना भर

है। इसी ऊर्जा के संचार से वे तमाम अंग सही तरीके से काम करने लगते हैं, जिनमें

किसी प्रकार की खामी है।

न्यूरॉन इंप्लांट से भी बीमारी ठीक करने की कवायद

जो प्रयोग चल रहा है उसमें न्यूरॉन इंप्लांट को ब्रेन में प्रवेश किया जाता है। यह ब्रेन के

उस हिस्से तक पहुंचता है जहां के कोष न्यूरॉन को सुरक्षित रखते हैं। इस स्थान पर

पहुंचने के बाद आपसी प्रतिक्रिया से जेनेटिक पद्धति के संशोधित न्यूरॉन अधिक ऊर्जा

के साथ काम कर पाते हैं क्योंकि ऐसा काम करने का निर्देश पहले से प्राप्त होता है। इस

विधि का परीक्षण सफल होने के बाद अब वैज्ञानिक उन्हें नियंत्रित करने की विधि

विकसित करना चाहते हैं। वर्तमान में उन्हें बाहर से नियंत्रित करने की कोई विधि तैयार

नहीं हो पायी है। इसलिए यह आशंका है कि किन्हीं कारणों से अगर ये सही तरीके से

काम नहीं करें तो उन्हे तत्काल काम करने से रोका नहीं गया तो गंभीर खतरा हो सकता

है। बाहर से इनके नियंत्रण की विधि सफल होने के बाद इनका इस्तेमाल और बेहतर

तरीके से किया जा सकेगा। इस विधि की खास विशेषता यह है कि इस एक विधि से

शरीर के किसी एक खास कोष तक को सुधारने का निर्देश देकर ही न्यूरॉन को भेजा जा

सकता है। जो अपने लक्ष्य तक पहुंचने के बाद आसानी से अपना काम पूरा कर सकता

है और सही काम करने का संकेत भी भेजता रहता है।


 

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