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बंदर को इंसानी दिमाग देने की नई कवायद प्रयोग सफल

  • खास जीन ने बंदर का दिमाग भी बढ़ाया

  • जेनेटिक वैज्ञानिकों ने किया अनूठा प्रयोग

  • खास किस्म के जीन का प्रभाव जांचा गया

  • जर्मनी और जापान के वैज्ञानिकों का प्रयोग

राष्ट्रीय खबर

रांचीः बंदर को इंसानी दिमाग देकर उसे ज्यादा बुद्धिमान बनाने का प्रयोग प्रारंभिक तौर

पर सफल रहा है। दरअसल इसके लिए जेनेटिक वैज्ञानिकों ने बंदर के अंदर इंसानी जीन

का इस्तेमाल कर उसके दिमाग को और बड़ा करने में सफलता पायी है। वैसे जिन बंदरों

पर यह प्रयोग हो रहा है, वे जेनेटिक तौर पर संशोधित बंदर ही हैं। जर्मनी के मैक्स प्लैंक

इंस्टिट्यूट ऑफ मॉलिक्यूलर सेल बॉयोलॉजी और जापान के सेंट्रल इंस्टिट्यूट फॉर

एक्सपेरिमेंटल एनिमल्स में ऐसा किया गया है। अपने अनुसंधान के दौरान वैज्ञानिकों ने

स्त्री बंदर के गर्भ में ही इंसानी जीन रख दिये थे। इससे जो बंदर गर्भ में पला और बढ़ा वह

इन इंसानी गुणों के साथ ही विकसित हुआ। लेकिन इस प्रयोग के तहत तैयार बंदर का

जन्म नहीं होने दिया गया था। वैज्ञानिकों ने गर्भ में यह जीन रखने के एक सौ दिन बाद

विकसित भ्रूण की जांच की और उसके दिमाग में यह विकसित हिस्सा देखा गया। इस

प्रयोग के लिए जिस इंसानी जीन का इस्तेमाल किया गया था उसे एआरएचजीएपी11बी

कहते हैं। मारोसेट प्रजाति के बंदरों में यह प्रयोग किया गया था। पैदा होने वाले बंदर के

दिमाग में इसका असर देखा गया है। उस बंदर का निओकोरटेक्स वाला हिस्सा दूसरे बंदरों

से बड़ा है। इस प्रयोग के बारे में शोध प्रबंध प्रकाशित की गयी है। यह भी जान लें कि इसका

75 प्रतिशत हिस्सा उसका बाहरी आवरण ही होता है और वह कई किस्म की विशेषताओं

की वजह से ही इंसान को अलग बनाता है। दिमाग के इस भाग की सक्रियता की वजह से

हम इंसान तुलनात्मक विश्लेषण, जटिल भाषा विज्ञान को समझ पाते हैं। हमारे पूर्वजों के

पास यह गुण इतनी विकसित अवस्था में नहीं था।

दिमाग का विकास भी रातों रात तो नहीं हुआ था

वैसे दिमाग का यह विकास भी कोई रातों रात नहीं हुआ था और वैज्ञानिकों का अनुमान है

कि इसके क्रमिक विकास में करीब तीस लाख वर्ष लगे हैं। इंसानी दिमाग के अंदर जो

नियो कॉरटेक्स का हिस्सा है, वह अपने पूर्वजों से भिन्न है। इसी वजह से इंसान अपने

पूर्वजों मसलन बंदर और चिंपाजी के मुकाबले अधिक समझदार बन गया है। पूर्व में हुए

शोध और प्राचीन अवशेषों के अध्ययन से यह भी पता चला है कि हमारी इंसानी पूर्वज

यानी नियनडरथॉल्स और डेनिसोवांस में भी यह गुण विकसित होने लगे थे। लेकिन बाद

में वे भी इस दुनिया से विलुप्त हो गये।

इससे पहले भी इस एआरएचजीएपी11बी जीन का प्रयोग चूहों पर किया गया था। उनमें

भी दिमाग के इस हिस्से को विकसित और बड़ा होते देखा गया था। लेकिन यह पहला

अवसर था जब किसी ऐसे जीव पर इसका प्रयोग किया गया था, जो जेनेटिक तौर पर

इंसानों के ज्यादा करीब समझा जाता है। इस शोध के बाद वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि

शायद इसी जीन की वजह से इंसानी विकास की गाड़ी आगे बढ़ पायी है। हमारे पूर्वजों में

यह जीन करीब पचास लाख वर्ष पूर्व विकसित हुआ होगा। इस शोध प्रबंध के मुख्य लेखक

मिशेल हेइडे कहते हैं कि बाद में शायद यह इंसानों की सभी प्रजातियों के आपसी मिलन

की वजह से इंसानी दिमाग का एक सामान्य और प्राकृतिक हिस्सा बन गया। इसी वजह

से इंसानी दिमाग के अंदर जो कॉर्टिकल प्लेट है वह सामान्य से अधिक मोटा है। इस एक

जीन की वजह से दिमाग के अंदर न्यूरॉनों की सक्रियता बहुत अधिक बढ़ जाती है। शायद

इसी वजह से इंसानी दिमाग अपने पूर्वजों के मुकाबले ज्यादा बेहतर विश्लेषण और

समझदारी दिखा पाता है।

बंदर को यह जीन देकर गर्भ में ही जांच की गयी

यह सारा कुछ दिमाग के अंदर तरंगों के आदान प्रदान की वजह से होता है। जो बंदरों में

विद्यमान नहीं होता। वैसे इस प्रयोग की काफी आलोचना भी हुई है और कई स्तरों पर इस

किस्म के जेनेटिक प्रयोग को इंसानों के लिए खतरनाक भी बताया गया है। इससे नाराज

लोग मान रहे हैं कि प्रकृति से छेड़छाड़ के खतरनाक नतीजे भी हो सकते हैं। आलोचना

होने के बाद शोध दल ने साफ कर दिया है कि उनका लक्ष्य सिर्फ जेनेटिक विकास के

दिमाग पर असर को देखना था, जो दिमाग के अंदर पाने में सफल रहा है। इसलिए इस पर

आगे बहस की कोई आवश्यकता नहीं है।

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