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प्रदूषण कम करने में कृत्रिम तौर पर तैयार पौधे भी असरदार साबित

  • इन पेड़ों को वैज्ञानिकों ने जेनेटिक तौर पर संशोधित किया

  • पॉपलर के पेड़ भारत में भी लोकप्रिय हो चुके हैं

  • अमेरिका में 36 हजार वर्गमील में है इसके जंगल

  • इसके गैस से पानी सूखता है और गर्मी बढ़ती है

प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः प्रदूषण कम करने की दिशा में जेनेटिक इंजीनियरिंग फिर से एक महत्वपूर्ण

कदम के तौर पर सामने आया है। इस बार जेनेटिक तौर पर संशोधित पेड़ों के जरिए

प्रदूषण कम करने के परीक्षण पूरी तरह सफल साबित हुआ है। दरअसल कुछ पेड़ों से

खतरनाक गैसों का उत्सर्जन होने की जानकारी मिलने के बाद उन्हीं पेड़ों पर यह जेनेटिक

सुधार का कार्यक्रम चलाया गया था। परीक्षण पूरा होने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर

पहुंचे हैं कि जिस मकसद से यह सारा काम किया गया था, वह पूरी तरह सफल रहा है।

अमेरिका के ओरेगन और एरिजोना में कुछ खास पेड़ हैं जो सामान्य गतिविधि के अलावा

भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले गैस भी छोड़ते हैं। इसी लिए इन्हीं प्रजाति के पेड़ों

पर जेनेटिक संशोधन का यह प्रयोग किया गया था। इनकी संरचना मे जब जेनेटिक

संशोधन किये गये तो यह पाया गया कि नुकसानदायक गैसों का उत्सर्जन कम हुआ है

जबकि पेड़ों बढ़ने अथवा अन्य गतिविधियों पर इस जेनेटिक सुधार का कोई भी

नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।

जेनेटिक सुधार से नुकसान दायक गैस रोकने में मदद मिली

परीक्षण के सफल होने के बाद उसकी उपलब्धियों के बारे में जानकारी दी गयी है। जिस

पेड़ से नुकसान दायक गैस के उत्सर्जन की जानकारी मिली थी, वह पॉपलर के पेड़ हैं। इस

प्रजाति के पेड़ वहां करीब 36 हजार 294 वर्ग मील में फैले हुए हैं। जाहिर है कि इस विशाल

जंगल से अगर कोई नुकसान दायक गैस निकल रहा है तो उसका असर भी व्यापक ही

होता होगा। दरअसल व्यापारिक कारणों से इस पेड़ की खेती हाल के वर्षों में बहुत अधिक

बढ़ गयी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पिछले पंद्रह वर्षों में यह पेड़ लगभग दोगुणा

इलाके में लगाये गये हैं। इनका इस्तेमाल कई किस्म के व्यापारिक उत्पादन बनाने में

किया जाता है।

भारत में भी इस पॉपलर पेड़ की खेती पंजाब, हरियाणा और आस पास के इलाकों में काफी

हो रही है। लेकिन अब तक इस पेड़ के प्रदूषण संबंधी खतरों के बारे में भारत में अधिक

जानकारी नहीं आयी है। इस पेड़ से बॉयो फ्यूएल बनाने के अलावा कागज, पैलेट, प्लाईवूड

और फर्नीचर के ढांचे बनाये जा रहे हैं। स्पष्ट है कि बहुआयामी इस्तेमाल की वजह से लोग

व्यापारिक फायदे के लिए अपनी जमीन पर यह पेड़ लगाते हैं। अमेरिका में इसी लाभ की

वजह से पंद्रह साल में उनका दायरा दोगुणा हो चुका है।

इस परीक्षण के प्रारंभ होन के बाद यह भी पता चला कि इसी किस्म के व्यापारिक

इस्तेमाल के लिए लगाये जाने वाले यूकेलिप्टस और पॉल्म के पेड़ों से भी ऐसे

नुकसानदायक गैसों का उत्सर्जन होता है। इन पेड़ों से आइसोप्रेन गैस निकलता है। इस

गैर की वजह से वहां के माहौल का तापमान बढ़ जाता है और इलाका सूख जाता है क्योंकि

वे पानी बहुत सोखते हैं। यह गैस उनके पत्तों से निकलता है जो माहौल को तेजी से

बदलता चला जाता है।

प्रदूषण कम करने का शोध असर को जानकर किया

शोध प्रारंभ हुआ तो इस आइसोप्रेन गैस के अन्य गैसों से प्रतिक्रिया को भी देखा गया था।

जिससे पता चला कि ओजोन की पर्त को नुकसान पहुंचान में इसकी भी भूमिका है। साथ

ही इस गैस की पर्त की वजह से सूर्य की किरणों भी सीधे धरती से आने से बाधित होती है।

इसी वजह से इलाके में तापमान भी बढ़ता चला जाता है। वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति के पेड़ों

पर जेनेटिक संशोधन का प्रयोग क्रमवार तरीके से किया। इस परीक्षण में एरिजोना

विश्वविद्यालय के अलावा हेल्महोल्ट्स रिसर्च सेंटर (म्युनिख) , पोर्टलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी

और ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी शामिल थे। इनलोगों ने बड़ी सावधानी से

सिर्फ पॉपलर के पेड़ों पर वह जेनेटिक संशोधन किये, जिससे वह आइसोप्रेन गैस का

उत्सर्जन नहीं करे। इस परीक्षण की जांच लगातार चार वर्षों तक की गयी। सारे आंकड़ों का

नियमित विश्लेषण के बाद अब यह नतीजा निकाला गया है कि परीक्षण सफल रहा है।

अब पॉपलर के पेड़ वह खतरनाक गैस नहीं छोड़ रहे हैं जबकि पेड़ पर इन जेनेटिक

संशोधनों का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। साथ ही इस बात की भी जांच कर ली गयी

कि जिन व्यापारिक उद्देश्यों के लिए यह पेड़ अधिक संख्या में लगाये गये हैं, उनमें भी कोई

गड़बड़ी नहीं आये। जांच में यह परीक्षण भी सफल रहा है यानी जिन व्यापारिक कारणों से

इन पेड़ों का उपयोग होता है, उनकी गुणवत्ता में भी कोई कमी नहीं आयी है।


 

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