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मधुमक्खियों को बचाने के लिए जेनेटिक सुधार की तकनीक

  • वायरस और रसायन से बचाव में मददगार बैक्टेरिया

  • दुनिया के लिए नये द्वार खोल सकता है यह प्रयोग

  • प्रयोगशाला के बाद अब खुले में चल रहे अनुसंधान

  • मधुमक्खियों पर इस दौर में ऐसा हमला बढ़ गया है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः मधुमक्खियों को बचाने के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग का

सहारा लिया गया है। वैज्ञानिकों का यह प्रयोग सफल रहा है। इसकी

मदद से मधुमक्खियों के अंदर ऐसे बैक्टेरिया का समावेश किया गया

है जो उनके बचाव में मददगार बनेंगे। प्रयोगशाला में इसे सफलता के

साथ आजमाने के बाद खुली हवा में इसकी जांच चल रही है।

हाल के दिनों में खोज बीन से यह बात निकलकर सामने आयी कि

मधुमक्खियों पर भी रासायनिक अधिकता का खतरा मंडरा रहा है।

इसी जहरीले पदार्थ की अधिकता की वजह से दुनिया में गिद्ध भी भारी

संख्या में मारे गये हैं। इस बात का पता चलने के बाद वैज्ञानिकों ने

मधुमक्खियों की आबादी कम होने तथा उनके मृत्युदर की अधिकता

की भी जांच की। पाया गया कि हाल के वर्षों में उनपर भी विषाणुओं

की हमला काफी बढ़ गया है। इसी वजह से वे अधिक दिनों तक जीवित

रहने के बजाए विषाणुओं की चपेट में आने से समय से पहले ही

मर जा रही है।

इन तथ्यों का खुलासा होने के बाद ही इनसे बचाव के रास्ते तलाशे

गये। काम प्रारंभ होने के दौरान जांच में पाया कि सुनसान इलाके

में अनेक ऐसे छत्ते भी मिले, जिनमें रानी मधुमक्खी और उनके चंद

सहयोगियों के अलावा पूरा छत्ता ही खाली हो गया था। यानी वहां

मौजूद सारे अन्य मधुमक्खी किन्हीं कारणों से गायब हो गये थे।

आस-पास के इलाकों में देखने पर मधुमक्खियों के शव भी पाये गये।

उनमें रसायनों की मौजूदगी का भी पता चल गया। तब जाकर यह

समझा गया कि अगर उसे नहीं रोका गया तो पूरी दुनिया से

मधुमक्खियों की पूरी प्रजाति ही गायब हो जाएगी।

मधुमक्खियों पर इस दौर में बढ़ गया है हमला

इस शोध का निष्कर्ष था कि अकेले अमेरिका में ही 40 प्रतिशत ऐसे

छत्ते पाये गये जिनमें ऐसा रासायनिक और विषाणु हमला हो चुका

था। दरअसल शहद के पहले अपने लिए भोजन की तलाश में यह सुक्ष्म

प्राणी अनेक किस्म के फलों और फूलों से होकर गुजरते हैं। उपज

बढ़ाने के लिए इनमें रसायनों का काफी अधिक प्रयोग किया जाता है।

इन रसायनों की चपेट में आने की वजह से मधुमक्खियों की पूरी

प्रजाति ही बीमार हो जाती है। समस्य़ा को अच्छी तरह समझ लेने के

बाद जेनेटिक वैज्ञानिकों ने इससे मधुमक्खियों के बचाव का नया

तरीका निकाला है। टेक्सास विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने नये

किस्म का बैक्टेरिया तैयार किया है। इसमें जेनेटिक संशोधन किये

गये हैं। सामान्य समझ के हिसाब से इस बैक्टेरिया का काम किसी

कारखाने के जैसा है तो मधुमक्खी के शरीर के अंदर मौजूद रहकर

घातक रसायनों से लड़ता है तथा उन्हें शरीर से बाहर निकाल देता है।

जिन बीमारियों से मधुमक्खियों को अधिक नुकसान होता है, उनमें

वारोया माइट्स और पंखों पर हमला करने वाले वायरस की अधिकता

है। यह बैक्टेरिया इन दोनों बीमारियों से लड़ सकता है। काम प्रारंभ

होने पर यह नतीजा भी सामने आया कि यह दोनों बीमारियां लगभग

एकसाथ ही किसी मधुमक्खी पर हमला करती हैं। माइट्स किसी भी

मधुमक्खी के शरीर के अंदर पहुंचकर उनके भोजन की पौष्टिकता

खाने लगती है। इससे प्राणी कमजोर होने लगता है। जब वह कमजोर

होता है तो उसपर अन्य बीमारियों का हमला भी बढ़ जाता है। साथ ही

फलों और फूलों पर मंडरान के दौरान वह निरंतर घातक रासायनों के

संपर्क में आते जाते हैं। जिससे उनके छोटे से शरीर पर घातक प्रभाव

होता है।

दोनों वायरस हमले अक्सर ही एकसाथ ही होते हैं

चूंकि समस्या दो किस्म की थी इसलिए जेनेटिक वैज्ञानिकों ने दोनों

के लिए अलग अलग बैक्टेरिया तैयार किये। इनमें से एक वायरस पर

हमला करता है तो दूसरे का काम बीमारी से लड़ना है । प्रयोगशाला में

जब उसका परीक्षण किया गया तो यह नतीजा सामने आया कि इस

जेनेटिक संशोधन वाले बैक्टेरिया की वजह से इनकी प्रतिरोधक

क्षमता बढ़ गयी है और दस दिन के बाद भी उनमें बीमारी से लड़ने की

ताकत में औसतन 36 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। खुले वातावरण

में इसके प्रभाव को जांचा जा रहा है। वैसे वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रयोग

के सफल होने की स्थिति में अनाज और उपज को भी भी इसी जेनेटिक

संशोधन वाले बैक्टेरिया की मदद से बीमारियों और कीटाणुओं से

बचाने का नया रास्ता भी खुलने जा रहा है। इससे फसल के अंदर

प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की स्थिति में खतरनाक रसायनों का

प्रयोग भी बंद किया जा सकेगा। इससे अकेले अमेरिका को हर साल

खरबों रुपये की बचत होगी, जो वर्तमान में खतरनाक और जानलेवा

रसायनो के छिड़काव पर खर्च करना पड़ रहा है। इनके प्रयोग से

पर्यावरण पर भी काफी कुप्रभाव पड़ने की पुष्टि तो पहले ही हो चुकी है

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