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सामान्य तनाव आपके जीवन को लंबा बनाता है







  • दो वैज्ञानिक संस्थानों के अनुसंधान से अजीब निष्कर्ष

  • डीएनए की आंतरिक संरचना में होते हैं बदलाव

  • प्रोटिन की गतिविधियां कोषों को सक्रिय करती हैं

प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः सामान्य तनाव भी आम इंसान पसंद नहीं करता।

उसकी कोशिश होती है कि वह तनाव से मुक्त रहे।

लेकिन दो वैज्ञानिक संस्थानों ने मानव जीवन और उसके प्रभावों पर शोध किया है।

इस शोध का एक अजीब निष्कर्ष यह है कि सामान्य किस्म का तनाव आपके जीवन को

ज्यादा बेहतर बनाये रखने मे सहायक है।

इससे यह पता चला है कि अगर आपके जीवन में सामान्य किस्म का तनाव है

तो यह आपके जीवन को दीर्घायु बने रहने में मददगार साबित होता है।

सुनने में बड़ा अजीब लगने के बाद भी यह वाकई अच्छी स्थिति है।

बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसीन और ह्यूस्टन मेथोडिस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट ने यह शोध पूरा किया है।

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनके बारे में भी जानकारी दी गयी है।

इस शोध के बारे में एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका में जानकारी दी गयी है।

शोध में यह देखा गया है कि मामूली स्तर का क्रोमाटिन तनाव स्तर सिर्फ इंसान नहीं

बल्कि कई अन्य प्राणियों में भी एक जैसा असर डालता है।


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वैज्ञानिकों ने इसे मक्खी, चूहे और अन्य स्टेम सेलों तक पर आजमाया है।

इसी आधार पर यह माना गया है कि क्रोमाटिन का तनाव स्तर होने से इंसान को

एकाग्रचित्त होने में मदद मिलती है। इसी वजह से उसकी आयु और बेहतर होती है।

यही प्रभाव अन्य प्राणियों पर भी होता है कि जब वे किसी विषय पर एकाग्रचित्त होते हैं

तो उनकी उम्र बढ़ने में यह स्थिति सहायक सिद्ध होती है।

सामान्य तनाव के शोध को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित किया गया है




इस से जुड़े और प्रकाशित शोध प्रबंध के लेखक डॉ वेइवेइ डांग कहते हैं कि

दरअसल हर प्राणी के डीएनए में अनेक किस्म के सेल भरे पड़े होते हैं।

क्रोमाटिन का तनाव इनमें तरंग पैदा करता है। इससे सारे सेल नये सिरे से सक्रिय हो जाते हैं।

यही जीवन को लंबा रखने में मददगार होता है। डॉ डांग हफिंग्टन सेंटर के सहायक प्रोफेसर हैं।

उन्होंने कहा कि दरअसर क्रोमाटिन के प्रभाव को भी दर्ज किया गया है।

इससे कोशिकाओं में मौजूद हिस्टन प्रोटिन पर प्रभाव पड़ता है।

यह प्रोटिन ही अपने आस पास के सारे सेलों को सक्रिय बना देता है।

परीक्षण में यह देखा गया है कि डीएनए खुद को इसी हिस्टन प्रोटिन के चारों तरफ बांधे रखता है।

जब इस हिस्टन में कोई प्रतिक्रिया होती है तो उससे लिपटे सारे कोष अपने आप ही सक्रिय हो जाते हैं।

इसी वजह से उनमें नये सिरे से सजीवता पैदा होती है जो अंततः जीवन को लंबा रखने में मददगार सिद्ध होते हैं।

दरअसल इंसानी डीएनए एवं उसके प्रोटिनों की संरचना इतनी जटिल है कि

उनमें से किसी एक पर प्रतिक्रिया होते ही अन्य भी इसके प्रभाव में आ जाते हैं।

क्रोमाटिन का प्रभाव इन सभी को नये सिरे से सक्रिय बना देता है।

डॉ डांग और उनके सहयोगियों ने इस विषय पर लगातार काम करने के बाद

हिस्टन जीनों पर होने वाले प्रभावों को नोट किया था।

इसके लिए इनलोगों ने प्रयोगशाला में विकसित जीनों के अलावा खमीर से उत्पन्न जीनों की भी मदद ली थी।

इन सभी का इस्तेमाल यह जांचने के लिए किया गया था कि दरअसल तनाव की स्थिति में

शरीर के अंदर क्या क्या प्रतिक्रिया कैसे होती है।

तनाव और प्रोटिन की सक्रियता की परख की है वैज्ञानिकों ने




शोध से जुड़े एक अन्य प्रोफसर रुओफेन यू ने कहा कि प्रयोग में इन तमाम जीनों पर

यह पाया गया कि क्रोमाटिन का असर इनके जीवन को बढ़ा देता है।

इसके विपरीत क्रोमाटिन का प्रभाव कम करने से प्रतिकूल परिस्थितियों का भी अध्ययन किया गया है।

जिससे वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि इसी क्रोमाटिन का प्रभाव इंसानी सेलों को पुनर्जीवित करने में सहायक सिद्ध होता है।

इस परीक्षण से इंसानी जीवन को और दीर्घायु बनाने की एक नई संभावना विकसित हुई है।

उम्रदराज सेल जिस तरीके से टूट जाते हैं, उन्हें इस विधि से फिर से सक्रिय और ताजा बनाया जा सकता है।

इंसानी शरीर में आयु का असर इन्हीं कोषों के बनने की प्रक्रिया धीमी होने की वजह से होती है।

अगर शरीर में कोष बनने की प्रक्रिया को नये सिरे से पैदा किया जा सका तो निश्चित तौर पर इंसान उम्रजनित इस चुनौती का फिर से नये तरीके से मुकाबले करने के लिए सक्षम हो जाएगा।

शोध से जुड़े वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह प्रभाव सिर्फ इंसानों पर ही नहीं बल्कि अन्य प्राणियों पर भी पड़ता है।

इंसानों में यह प्रक्रिया जारी रहने का अर्थ सामान्य स्थिति का तनाव है।

यानी वैज्ञानिक मानते हैं कि सामान्य स्थिति के तनाव की वजह से शरीर के अंदर

प्रतिक्रियाएं होती हैं, उससे इंसान अधिक दिनों तक जिंदा और सक्रिय रह सकता है।

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