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मेंढक के चमड़े के सेल भी खुद को जीवित रखते हैं

  • प्राकृतिक तौर पर तैयार जीवित मशीनों को देख वैज्ञानिक हैरान

  • मूल संरचना से अलग होने के बाद अजीब आचरण किया

  • आपस में मिलकर एक गेंद की शक्ल में बनते चले गये

  • अपना घाव भी खुद ही ठीक कर सकते हैं यह जेनोबॉट

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मेंढक के चमड़े के सेलों को वैज्ञानिकों ने अलग कर उसे किसी दूसरे मकसद से

जांचना चाहा था। लेकिन मेढ़क के अंडों के चारों तरफ चिपके यह सेल अलग होने के बाद

खुद के बल पर जीवित रहे, इसकी जानकारी वैज्ञानिकों को हैरान कर गयी है। सबसे

महत्वपूर्ण बात यह रही कि मूल संरचना से अलग होने के बाद इन सेलों ने खुद को एक

दूसरे के साथ जोड़ा और किसी जीवित रोबोट की तरह आचरण करते हुए पाये गये। यह

सेल इतने सुक्ष्म है कि उन्हें खुली आंखों से देख पाना संभव नहीं था। अणुवीक्षण यंत्र से

जब उनकी गतिविधियों की जांच की गयी तो अंदर का हाल देखकर शोध करने वाले हैरान

रह गये। यह सुक्ष्म सेल तैरते हुए एक दूसरे से तालमेल बैठाते हुए कई काम कर लेते हैं।

सबसे बड़ी बात यह नजर आयी कि वे अपने घाव की मरम्मत भी खुद कर लेने में सक्षम

है। कुल मिलाकर मेंढक के चमड़े के यह सेल किसी जीवित रोबोट के जैसा आचरण करने

में कामयाब रहे हैं। इस प्रयोग के बारे में जो जानकारी दी गयी है, उसके मुताबिक

वैज्ञानिकों ने मेढ़क के भ्रूण के बाहर के इन सेलों को मूल ढांचे से अलग कर दिया था।

अलग किये जाने के बाद यह सारे सेल एक दूसरे से तालमेल बैठकार एक गेंद की शक्ल में

आ गये और आकार बढ़ाते चले गये। तीन दिन के बाद यह जीवित रोबोट तैरने भी लगे थे।

ऐसा क्यों हुआ, इसका उत्तर अभी नहीं तलाशा जा सका है लेकिन शोधकर्ताओं को उम्मीद

है कि अन्य आंकड़ों के विश्लेषण से इसका कोई विज्ञान सम्मत साक्ष्य पेश किया जा

सकेगा।

मेंढक के चमड़े का यह सेल जीवित रोबोट की तरह काम कर रहे है

वैसे इन जीवित रोबोटों के आचरण को देखकर वैज्ञानिक मानते हैं कि उनका दूसरे कार्यों

में भी अब इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि सभी सुक्ष्म सेल एक दूसरे से बेहतर

तालमेल बैठाकर काम करते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि इन सुक्ष्म सेलों के अंदर भी

दिमाग का एक हिस्सा मौजूद है जो उन्हें काम के लिए निर्देशित करता है। आम तौर पर

मेढ़क के भ्रूण के बाहर बाल के बराबर पतला एक सिलिया होता है। यह आम तौर पर

किसी भी पैथोजेन के पास आने से रोकता है और चारों तरफ म्युकस फैलाता रहता है।

लेकिन जब इस सेलों को अलग कर दिया गया तो इसी सिलिया ने सभी सेलों को एक दूसरे

से जुड़ने का अवसर प्रदान किया। इसकी बदौलत सारे सेल मिलकर एक गेंद की शक्ल

लेने के बाद तैरते हुए नजर आये हैं। मेडफोर्ड के टूफ्ट्स विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी

माइकल लेविन ने कहा कि इसे हम जीवन के अतिरिक्त इस्तेमाल का एक जीता जागता

उदाहरण मान सकते हैं। यह भी जीवन के क्रमिक विकास का वह हिस्सा है जो हमें अपनी

आंखों के सामने तीन दिनों के भीतर दिख जाता है। वरना आम तौर पर क्रमिक विकास का

नियम है कि यह बदलाव बहुत धीरे धीरे और हजारों वर्षों में होता है। इसके जीवित होने के

अलावा खास गुणों की जब जांच की गयी तो भी वैज्ञानिक हैरान रह गये। मात्र आधा

मिलिमीटर चौड़े इन जेनोबॉट्स में न तो नर्व सेल हैं और न ही ब्रेन है। इसके बाद भी वे

किसी खास इलाके में एक साथ मिलकर सही तरीके से तैर सकते हैं।

ऐसे जिंदा रोबोट कई काम खुद ब खुद करने लगते हैं

परीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने उन्हें एक ऐसे इलाके में डाला, जिसमें पहले से ही ऑयरन

ऑक्साइड के छोटे छोटे कण थे। देखा गया कि जेनोबॉट्स सभी ऐसे टुकड़ों को एक जगह

एकत्रित कर उनकी ढेर लगा था। प्रयोग के लिए इन जीवित रोबोटों को काटा भी गया था।

काटे जाने के बाद भी वे अपने घाव को दबाते हुए अपने गेंद जैसी शक्ल में लौट गये। इसके

वजह से उन्हें जो घाव लगे थे, वे भी अपने आप ही भर गये। इतना कुछ पता चलने के बाद

अब वैज्ञानिक इसके आगे के शोध पर काम कर रहे हैं। प्रारंभिक अवस्था में पाया गया है

कि वे बिना किसी भोजन के दस दिनों तक जीवित रह सकते हैं। उसके बाद अगर उन्हें

सुगर उपलब्ध कराया गया तो वे अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। लेकिन एक खास

आकार को प्राप्त करने के बाद उनका आकार और नहीं बढ़ता है। इस अनुसंधान से जुड़े डो

ब्लैकिस्टन कहते हैं कि प्रयोगशाला में इन्हें चार महीने से अधिक समय तक जीवित रखा

जा सका है। जब आप उनका आकार बढ़ाने की कवायद करते हैं तो वह आकार में बैलून के

जैसा बढ़ते चले जाते हैं। वैसे इस शोध के और आगे बढ़ाने के प्रति शोध दल भी बहुत

सतर्क है। उनका मानना है कि वे जीवन के ऐसे पहलु को लेकर परीक्षण कर रहे हैं, जो पूरी

तरह अनजान है। ऐसे में अधिक तेज गति से आगे बढ़ने के खतरनाक परिणाम भी हो

सकते हैं क्योंकि आगे चलकर यह जीवन कैसा आचरण करेगा, यह अभी स्पष्ट बिल्कुल

भी नहीं है। प्राकृतिक तौर पर जीवन के क्रमिक विकास के साक्ष्य मौजूद हैं लेकिन यह

प्रयोगशाला में रचित नये किस्म का जीवन है। इसलिए इसके मामले में हर कदम फूंक

कर रखना ही समझदारी होगी।

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