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मुफ्तखोरी का ऐसा घटिया आरोप चुनाव बाद किस काम का

मुफ्तखोरी की वजह से दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को पराजित

कर दिया। यह चर्चा सोशल मीडिया में चलायी जा रही है। दरअसल चर्चा एक होती है जो

स्वाभाविक तौर पर चलती है और दूसरी वह होती है जिसे चंद लोगों द्वारा चलाया जाता

है। तो मुफ्तखोरी की वजह से दिल्ली की जनता ने गलत फैसला किया, इस बात को चंद

लोग बार बार दोहरा रहे हैं। ऐसे लोगों का सोशल मीडिया में पूर्व इतिहास क्या है और एक

ही जैसी बातों का प्रसारण करने वाले पिछले कितने दिनों से एक जैसा ही प्रचार कर रहे हैं,

यह समझना आसान है। लेकिन मुफ्तखोरी का आरोप दिल्ली पर अभी मढ़ा क्यों जा रहा

है, इस बात को समझने की जरूरत है। आरोप भाजपा की तरफ से उनके परिचित और

अदृश्य साइबर सैनिक लगा रहे हैं। मजे की बात है कि अब सोशल मीडिया में अचानक ही

इनकी बातों को अब गंभीरता से नहीं लिया जाता है। लेकिन सवाल तो यह है कि दिल्ली के

लोकसभा की सभी सीटों पर भाजपा को विजय दिलाने वाली जानता आज अचानक क्यों

मुफ्तखोरी के आरोपों से घिरी है। दरअसल उम्मीद से अधिक आत्मविश्वास का ढोंग भी

कई बार ऐसे साइबर सैनिकों के भरोसे चुनावी मैदान में उतरे लोगों को धोबिया पछाड़ देता

है। दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। जिस धार्मिक अंधश्रद्धा के नाम पर भाजपा के

चुनावी रणनीतिकार चुनावी हवा को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे थे, वह प्रचार

बढ़ने के साथ साथ उल्टा परिणाम देने वाला साबित हुआ है। भले ही चुनावी मैदान में

पराजित हो चुके प्रत्याशी खुले तौर पर इस बात को स्वीकार नहीं करें लेकिन यह तय है कि

उन्हें इस हिंदू मुसलमान के झगड़े की चुनावी रणनीति से नफा कम और नुकसान ज्यादा

हुआ है।

मुफ्तखोरी की रट लगाने से भाजपा को हो रहा है घाटा

अब भाजपा के पास इस बात के लिए भी कोई ठोस दलील नहीं है कि उसके पास दिल्ली में

जितने अपने सदस्य थे, उतने वोट भी उसे आखिर क्यों नहीं मिले हैं। जाहिर है कि या तो

भाजपा के सदस्यों की सूची में घालमेल था और उसे बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया था या फिर

उनके अपने सदस्यों ने ही इस चुनाव में उनका साथ नहीं दिया। लेकिन यह तय है कि

भाजपा के पराजित सैनिक दिल्ली की मुफ्तखोरी पर चाहे जितना कुछ कह लें लेकिन

आने वाले दिनों के लिए मतदाताओं को काम का हिसाब मांगने की आदत दिल्ली के इस

चुनाव ने डाल दी है। अब दिल्ली से जो संकेत पूरे देश तक गया है, उससे भी भविष्य में कई

राज्यों में नई राजनीतिक हवा चलने की पूरी उम्मीद है। इस नई हवा से भय सबसे अधिक

तो सत्तारूढ़ दलों को ही होना चाहिए। लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार ने तो दिल्ली

में काम के आधार पर ही वोट मांगने की शुरुआत कर दी है। अब अन्य राज्यों में भी जनता

को सरकार से इसी मुद्दे पर सवाल करने का नया अवसर प्राप्त हो गया है। शायद भाजपा

के साइबर सैनिकों को यह बात समझ में नहीं आ रही होगी अथवा उनके सेनापति

जानबूझकर अपनी सेना को इस सोच के साथ आगे बढ़ने का मौका नहीं देना चाहते।

लेकिन इनके बलबूते पर चुनाव जीतना संभव नहीं है, यह तो स्पष्ट हो चुका है। ऐसा नहीं

है कि हिंदू मुसलमान के नारों का दिल्ली के विधानसभा चुनाव में असर नहीं पड़ा है।

लेकिन भाजपा की उम्मीद के विपरीत यहां की मुफ्तखोरी की आदत डाल चुकी जनता ने

आम आदमी पार्टी का समर्थन किया।

दूसरे राज्यों तक प्रसारित होगा इसका असर

अब दूसरे राज्यों में इसका क्या कुछ असर होगा, यह देखने लायक बात होगी। अगला

मुकाबला पश्चिम बंगाल में होना है और तय है कि यह लड़ाई दिल्ली के तर्ज पर तो नहीं

होगी। वहां भी भाजपा की सरकार नहीं है और वहां की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस दिल्ली की

तुलना में कठिन चुनौती है। अब मुफ्तखोरी के आरोप से खिझ निकाल रही भाजपा आने

वाले दिनों में अपनी चुनावी रणनीति में कोई तब्दीली करती है अथवा खुद अपने

रणनीतिकारों को ही बदलती है, यह देखना भी रोचक होगा। वैसे लोकसभा में जिन मुद्दों

पर भाजपा को व्यापक जनसमर्थन मिला है, उन मुद्दों का राज्यों के विधानसभा चुनाव में

असर नहीं होने से भाजपा निश्चित तौर पर उस चौराहे पर खड़ी नजर आ रही है, जहां से

उसे कुछ कठोर फैसला लेने हैं। दूसरी तरफ अन्य राष्ट्रवादी मुद्दों के मुकाबले देश की

जनता के लिए रोटी का सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है, इस बात को भी अच्छी

तरह समझा जा रहा है। लिहाजा मुफ्तखोरी की अब बात होगी तो केंद्र तथा भाजपा

शासित राज्यों में चलायी जा रही अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर भी सवाल खड़े हैं।

आखिर लोगों को लाभ दिलाना अगर मुफ्तखोरी है तो यह हर राज्य में हो रहा है। कौन

अपनी जेब से जनता को फायदा पहुंचा रहा है।

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