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झारखंड के लिए खाद्य प्रसंस्करण में बहुत बेहतर अवसर हैं

  • जमीन खोदने से बेहतर है ऊपर सोना उगानाः सुबोध कांत
  • किसान केंद्रित योजनाओं से राज्य को फायदा होगा
  • अपने मंत्रित्व काल में कई योजनाएं चालू की थी
  • रघुवर दास की सरकार हाथी उड़ाने में व्यस्त रही

शिव कुमार अग्रवाल

रांचीः झारखंड के लिए खाद्य प्रसंस्करण से विकास के बेहतर विकल्प हैं। इससे नये सिरे

से कृषि आधारित उद्योगों के लिए पर्याप्त अवसर हैं। दरअसल जापान की तमाम

कंपनियों के चीन से कारोबार समेटने की स्थिति का भी यह राज्य बेहतर फायदा उठा

सकता है। इसके लिए किसान केंद्रित विशेष नीति बनाने की जरूरत है। यह बात पूर्व

केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत ने मोबाइल पर दिये गये साक्षातकार में कही। उन्होंने वर्तमान

परिस्थिति में मौके का फायदा उठाने के लिए अलग से नीति बनाने की वकालत की और

कहा कि सिर्फ औद्योगिक नीति से झारखंड को इसका फायदा होने में अनेक अड़चनें हैं।

इसलिए अलग से नीति और योजना बनाने की जरूरत है, जिसके केंद्र में झारखंड के

किसान रहें।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि बार बार सिर्फ रत्नगर्भा

झारखंड की धरती को खोदकर उद्योग आधारित विकास की सोच पनपती रही है। जमीन

के ऊपर से भी सोना उगाया जा सकता है, इस पर किसी को सोच नहीं जाती। उन्होंने कहा

कि केंद्र में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री रहते हुए उन्होंने इस दिशा में काफी काम किया था।

बाद में पूर्व की रघुवर दास की सरकार हाथी उड़ाने में कुछ ऐसी उलझी कि सारी योजनाएं

धरातल पर उतरने के पहले ही समाप्त हो गयी।

उन्होंने कहा कि इस बात को सारे नीति निर्धारकों को समझ लेना चाहिए कि दरअसल

झारखंड एक हार्टिकल्चल राज्य है। यहां किसानों को केंद्र में रखकर नीति और योजना

नहीं बनाने की वजह से झारखंड का किसान सिर्फ अपनी लागत निकालने के संघर्ष से

जूझता रहता है। इस आर्थिक तंगी की वजह से वह नये प्रयोग अथवा नया कुछ सीखने के

अलावा उन्नत किस्म के बीजों के लिए भी धन नहीं लगा पाता। इस स्थिति को बदलने की

जरूरत है।

झारखंड के लिए योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी

योजनाओं के लाभ के बारे में उन्होंने कहा कि वर्तमान में सिर्फ खनिज दोहन के उद्योगों

का नुकसान भी समझ लेना होगा। लोगों की जमीन जाती है, विस्थापन होता है, लोगों की

सांस्कतिक विरासत पर चोट पहुंचने की वजह से अन्य किस्म की समस्याएं खड़ी होती है।

इसके ठीक विपरीत अगर कृषि पर ध्यान होगा तो इन समस्याओं का कोई नया बखेड़ा

खड़ा नहीं होगी।

फसल अथवा सब्जी के मौसम में किसानों को दाम नहीं मिलने की वजह से वे खेत और

सड़कों पर अपनी फसल छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं क्योंकि बाजार तक ढोने के बाद भी

उन्हें लागत का दाम नहीं मिलता है। इसलिए किसान को केंद्र में रखकर जब योजनाएं

बनेंगी तो किसान को आर्थिक लाभ होगा और वह कृषि के प्रति उत्साहित होगा।

श्री सहाय ने इस संबंध में पूरी योजना की विस्तार से व्याख्या भी की। उन्होंने कहा कि जब

किसान को उसके खेत पर उपज का सही दाम मिलेगा तो निश्चित तौर पर उसकी आर्थिक

स्थिति बेहतर होगी। इसके लिए कॉंटेक्स फॉर्मिंग को सरकारी मान्यता के साथ आगे

बढ़ाने की जरूरत है। कई राज्यों में किसान बड़ी कंपनियों के लिए खेती कर रहे हैं। उनकी

खेतों पर फसल उगाने के लिए कंपनियां ही तकनीक और उन्नत बीज देने के अलावा

फसल की देखभाल भी करती है। ऐसे में खेतों में उगली वाली फसल की बेहतर देखभाल

होती है। ग्राम आधारित कुटीर उद्योग से खाद्य प्रोसेसिंग के बाद उन्हें बड़ी इकाइयों तक

पहुंचाने के लिए भी एक संतुलित परिवहन व्यवस्था बनाने की जरूरत है।

 

फूलों की खेती के लिए अलग इंतजाम जरूरी हैं

इसी तरह अगर हम फूलों की खेती करेंगे तो उसके लिए भी परिवहन संपर्क बनाना पड़ेगा

क्योंकि फूलों की खेती को कोल्ड स्टोरेज में नहीं रखा जा सकता। श्री सहाय ने कहा कि

अमेरिका में इस किस्म की परिवहन व्यवस्था से जुड़ी ट्रेनों को मिलियन डॉलर ट्रेन कहा

जाता है क्योंकि उसमें जल्द नष्ट होने वाली चीजें होती हैं। यह एक स्थान से खुलने के बाद

बिना रूके अपने गंतव्य तक इसलिए पहुंचती है ताकि ट्रेन के रेफ्रिजरेटेड डब्बों में रखा

सामान तुरंत बाजार तक पहुंच सके। अगर झारखंड को ऐसा करना है तो यह व्यवस्था

बनानी पड़ेगी।

बड़ी कंपनियां जब झारखंड में आयेंगी तो उनकी खपत चंद किसानों के खेतों के अनाज

अथवा अन्य उत्पादन से पूरे नहीं हो सकते। इसलिए खेती के दायरे के बढ़ाने के लिए

सरकार की तरफ से किसानों को प्रोत्साहन और आर्थिक मदद देने के लिए अलग से नीति

बनाने की जरूरत है। खेत पर से फसल एकत्रित करने की योजना चालू होन के बाद सारी

तस्वीर अपने आप ही बदल जाएगी और इस राज्य में रोजगार के जो नये अवसर सृजित

होंगे, उससे भी राज्य का भला होगा।

जापान सरकार के फैसले का लाभ उठाना चाहिए झारखंड को

यह संयोग है कि जापान की कंपनियों को चीन से कारोबार समेटने के निर्देश मिले हैं।

लिहाजा झारखंड भी इस मौके का लाभ उठा सकता है। श्री सहाय ने स्पष्ट किया कि बार

बार खनिज दोहन पर ध्यान केंद्रित करने से बेहतर है कि जमीन के ऊपर उगने वाली

फसल पर फोकस किया जाए। इससे विस्थापन और अन्य समस्याएं नहीं होंगी और जिस

काम को यहां के लोग पहले से जानते हैं, उसके माध्यम से रोजगार मिलने से वे और

बेहतर तरीके से अपना काम कर सकेंगे। यह खेती और खाद्य प्रसंस्करण आधारित

उद्योग विकसित करने की उनकी योजना के तहत ही फूड पार्क भी बनाये गये थे। रघुवर

दास की सरकार ने इस दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया। दूसरी तरफ उसी समय हरिद्वार

में बाबा रामदेव ने भी यही काम प्रारंभ किया था। आज बाबा रामदेव की खेती की स्थिति

क्या है, पूरी दुनिया देख रही है। इसे देखकर भी झारखंड में अपनी कृषि आधारित उद्योग

संबंधी नीतियों को नये सिरे से बनाने की सख्त आवश्यकता है। इससे झारखंड संकट के

दौरान उत्पन्न अवसरों का भी दीर्घकालीन लाभ उठा सकता है।


 

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