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फ्लोरिडा में मच्छरों की आबादी नियंत्रित करने का नया प्रयोग शुरु होगा

  • जेनेटिक तौर पर संशोधित मच्छर अमेरिका पहुंचे

  • विषाणु ढोने वाले मादा मच्छरों को मार डालते हैं

  • तीन इलाकों में किया गया प्रयोग सफल रहा है

  • स्थानीय स्तर पर इसका जबर्दस्त विरोध भी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः फ्लोरिडा में मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने का जेनेटिक प्रयोग अब प्रारंभ

होने जा रहा है। फ्लोरिडा के अनेक सामाजिक संगठन जेनेटिक तौर पर संशोधित मच्छरों

को इस तरह से छोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इसके घातक परिणाम

हो सकते हैं अथवा नहीं, उसके बारे में नागरिकों को पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। कहीं

ऐसा न हो कि एक समस्या से छुटकारा पाने के चक्कर में जनता किसी दूसरी मुसीबत में

पड़ जाए। वैसे अमेरिकी अधिकारी जिस प्रयोग को यहां आजमाने जा रहे हैं, वह एक दशक

के अनुसंधान का नतीजा है। उनका मानना है कि जेनेटिक तौर पर संशोधित यह मच्छर

असली मच्छरों की आबादी को कम करने में बेहतर भूमिका निभा सकते हैं। इस काम से

जुड़े वैज्ञानिकों ने इसकी हर पहलु की अच्छे से जांच कर लेने का भी दावा किया है। इलाके

में बार बार कीटनाशक छिड़क कर मच्छरों को मारने के दूसरे खतरनाक परिणामों से

वाकिफ होने के बाद इस विधि को आजमाया जा रहा है। इस परीक्षण के बारे में मिली

जानकारी के मुताबिक प्रारंभिक चरण में 12 हजार ऐसे जेनेटिक तौर पर संशोधित मच्छरों

के अंडों को फ्लोरिडा के कुछ खास इलाकों में छोड़ा जाएगा। इसके लिए छह इलाकों की

पहचान कर ली गयी है। वहां पानी के संपर्क में आने के बाद इन अंडों से मच्छर पैदा होंगे।

इसे अमेरिकी स्वामित्व वाली एक ब्रिटिश कंपनी ऑक्सीटेक ने बनाया है। अगले सप्ताह

तक यह मच्छर बड़े होने के बाद वातावरण में शामिल हो जाएंगे। उसके बाद इन जेनेटिक

तौर पर संशोधित मच्छरों का असली कमाल प्रारंभ होगा। जेनेटिक तौर पर संशोधित

मच्छरों से मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने के प्रस्ताव को अमेरिकी सरकार ने वर्ष

2020 के मई महीने में स्वीकृति दी थी। दो वर्षों में ऐसे 750 मिलियन मच्छर छोड़े जाने की

योजना है।

फ्लोरिडा में स्थानीय कई संगठन इसके विरोध में हैं

प्राकृतिक तौर पर पैदा होने वाले मच्छर अपने साथ येली फीवर, डेंगू और जिका वायरस

भी लेकर चलते हैं। दावा किया गया है कि जेनेटिक तौर पर संशोधित मच्छर इन सारी

परेशानियों को दूर कर पायेंगे। योजना के बारे में बताया गया है कि सबसे पहले 144000

पुरुष मच्छर छोड़े जाएंगे। इन्हें तीन महीने की अवधि के दौरान छोड़ा जाएगा। उन्हें छोड़ने

के बाद इस बात की जांच की जाएगी कि वे प्राकृतिक मादा मच्छरों से शारीरिक संपर्क बना

रहे हैं अथवा नहीं। संपर्क बनने की स्थिति में मादा मच्छर अंडे तो देगी लेगी उनमें से

मच्छर पैदा नहीं होंगे। पहला चरण अगर सफल रहा तो बीस मिलियन और पुरुष मच्छर

छोड़े जाएंगे। इस पूरे प्रयोग के निशाने पर प्राकृतिक तौर पर पैदा होने वाले मादा मच्छर

ही हैं जो लोगों में डंक लगाकर खून चूसते हैं। इसी दौरान उनमें मौजूद विषाणु लोगों के

शरीर में प्रवेश कर जाता है। एइडेस एजिप्टी श्रेणी के मादा मच्छर इंसानी आबादी के करीब

रहना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें नजदीक में इंसानी खून मिलता रहता है। ऑक्सीटेक

कंपनी ने दावा किया है कि जेनेटिक तौर पर संशोधित मच्छरों की यह नई प्रजाति अगली

पीढ़ी की आबादी को नष्ट करने की क्षमता रखती है। इसके अलावा इसमें ऐसे विषाणु भी

है, जो मादा मच्छरों को मार डालते हैं। इससे तेजी से मच्छरों की आबादी कम होने लगती

है। यह जानकारी कंपनी के सीईओ ग्रे फ्रैंडसन ने दी है। मच्छरों को प्रयोगशाला में पैदा

करने के लिए उन मादा मच्छरों की मदद ली गयी ह जो अपने शरीर में टेट्रोसाइक्लिन

एंटीबॉयोटिक्स लेकर पैदा हुए हैं। जिन बक्सों में इन अंडों को लाया गया है, उनमें सिर्फ

अंडों के लिए भोजन और पानी है।

विषाणु लेकर चलने वाले मादा मच्छर होंगे शिकार

वहां पैदा होने के बाद वे प्राकृतिक माहौल में घुल मिल जाएंगे। जिसके बाद विषाणु ढोने

वाले मादा मच्छरों के सफाया का काम प्रारंभ हो जाएगा। इस दौरान फ्लोरिडा में इस पूरे

घटनाक्रम पर नजर भी रखी जाएगी। कंपनी ने यह दावा किया है कि फ्लोरिडा  से पहले

इन मच्छरों की जांच केयमैन द्वीप, पनामा और ब्राजिल में कर ली गयी है। हर जगह यह

प्रयोग सफल रहा है। ब्राजिल के एक इलाके में इस विधि से मच्छरों की आबादी 95

प्रतिशत तक कम करने में सफलता मिली है। कुल मिलाकर स्थानीय स्तर पर सामाजिक

संगठनो के विरोध के बाद भी यह प्रयोग प्रारंभ होने जा रहा है। जिसके बारे मे कंपनी शत

प्रतिशत सफलता का दावा करती है जबकि विरोध करने वाले सामाजिक संगठनों के अपने

वैज्ञानिक तर्क है। अब इस प्रयोग के प्रारंभ होने के बाद ही इसकी असलियत सामने आ

पायेगी। अगर प्रयोग सफल रहा तो आने वाले दिनों में इसे अन्य स्थानों पर भी आजमाया

जाएगा। लेकिन जेनेटिक तौर पर सारे पहलुओं की जांच उससे भी अधिक जरूरी होगी।

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