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लचीले रबर जैसे ब्रेन इंप्लांट से बदलगी चिकित्सा पद्धति

  • एमआइटी के वैज्ञानिकों ने थ्री डी तकनीक से बनाया

  • दिमाग के ईलाज की तकनीक ही बदल जाएगी

  • यह हाइड्रोजल टूथ पेस्ट जैसा लचीला पदार्थ

  • इसके विद्युतीय क्षमताएं भी इंसानी ब्रेन जैसी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः लचीले रबर जैसे वस्तु से तैयार ब्रेन इंप्लांट अब मरीजों के ईलाज में बहुत

कारगर साबित होंगे। इन्हें थ्री डी तकनीक के सहारे तैयार किया गया है। एमआइटी में

शोधकर्ताओं के एक दल ने इसे तैयार करने में सफलता पायी है। इस शोध दल में अनुभवी

वैज्ञानिकों के साथ साथ कॉलेज के छात्र भी शामिल थे। इसके बन जाने के बाद ब्रेन के

अंदर की गड़बड़ियों को ठीक करने का पारंपरिक तरीका भी बदल जाएगा। यह कुछ ऐसी

तकनीक की तरफ ब्रेन के ईलाज को ले जा रहा है, जहां ब्रेन की जांच के बाद गड़बड़ी का

पता चलने के आधे घंटे के भीतर उस हिस्से का नया इंप्लांट इसी थ्री डी तकनीक से तैयार

किया जा सकेगा। यह लचीला होने की वजह से उसे ब्रेन के अंदर रखने में कोई दिक्कत

नहीं होगी। साथ ही इसकी संरचना और वनावट की वजह से यह मरीज को भी परेशान

नहीं करेगा। इसके पहले इस किस्म की गड़बड़ियों को सुधारने के लिए दिमाग के अंदर

स्टील के तार से बने इलेक्ट्रॉड डाले जाते थे। इससे भी मरीज खुद को असहज महसूस

करता था। अब उनके बदले लचीले जेल का इस्तेमाल होगा जो दरअसल स्टील के तार

अथवा दिमाग के ईलाज में इस्तेमाल होने वाले सूइयों का स्थान लेंगे।

लचीले रबर जैसा बनाने में नैनो तकनीक का प्रयोग

इसे तैयार करने के लिए शोध दल ने नैनो तकनीक का इस्तेमाल किया है। इससे तैयार

होने वाली कोई भी वस्तु लचीली लेकिन बहुत मजबूत तैयार होती है। दरअसल इसे कुछ

इस तरीके से बनाया गया है कि यह हमारे इस्तेमाल के टूथपेस्ट के जैसा है, जिसे मनचाहा

आकार दिया जा सकता है। लेकिन यह अंदर से काफी मजबूत होता है। थ्री डी प्रिंटिंग

तकनीक की वजह से इसमें इलेक्ट्रिक सर्किट के सारे गुण होते हैं, जो ब्रेन के अंदर काम

करने की अहम जरूरत भी होती है। शोध प्रारंभ करने के बाद दिमाग के अंदर की संरचना

का अध्ययन कर एक एक उसके सारे अंगों को इसी तकनीक से तैयार करने की कवायद

चल रही है। यह लचीला नैनो मैटेरियल आतंरिक संरचना के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

प्रारंभिक परीक्षण में यह काम सफल रहा है। इसी वजह से ऐसा समझा गया है कि इंसान

के दिमाग के किसी हिस्से में कोई खराबी आने की स्थिति में उस खराब वाले हिस्से के

स्थान पर इस पदार्थ से बने इंप्लांट को लगाया जा सकेगा। प्रयोग के पहले चरण में इसे

कंप्यूटर के माउस पर आजमाया गया है। इसमें काम सफल होने के बाद एक एक कर

अन्य कार्यों को आगे बढ़ाया गया।

सबसे पहले कंप्यूटर माउस बनाकर किया प्रयोग

इसे तैयार करने के बारे में शोध दल द्वारा प्रकाशित शोध प्रबंधों के अलावा नैने फाइबर

की मदद से सबसे पहले हाइड्रोजेल तैयार किये गये थे। यह सामान्य किस्म के टूथ पेस्ट

जैसे ही थे लेकिन उनमें विद्युतीय तंरग पास करने की पूरी क्षमता थी। थ्री डी प्रिंटर से

उन्हें आवश्यकता के मुताबिक प्रिंट किया गया ताकि सही आकार और आयाम हासिल हो

सके। प्रारंभिक अवस्था में यह हाइड्रोजेन साबुन के पानी जैसा नजर आता है। इसमें जैसे

जैसे नैनो फाइबर घने होते हैं वे तरल से आधा तरल अवस्था में चले जाते हैं। इस हल्के

लचीले पदार्थ से कोई भी थ्री डी प्रिंटिंग हो सकती है। अच्छी बात यह है कि अपनी

रासायनिक संरचना की वजह से थी डी प्रिंटिंग के बाद भी इसका लचीलापन बना ही रहता

है। परीक्षण में यह पाया गया है कि ब्रेन के अंदर होने वाली ऊर्जा संबंधित गतिविधियों को

भी यह बखूबी अंजाम दे सकता है। इसलिए दिमाग के काम करने के लिए जरूरी न्यूरॉन

भी इसमें सही तरीके से काम कर पाते हैं। ब्रेन के बिजली सर्किटों के विकल्प के तौर पर

इसके अंदर भी अत्यंत छोटे आकार के सर्किट भी प्रिंट किये गये हैं। ब्रेन के अंदर इसे

स्थापित करने की दिशा में लचीलेपन की वजह से कोई दिक्कत नहीं जाती।

इससे दिमाग के अंदर की खराबी दूर हो सकेगी

इस विधि के सफल होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि दिमाग के किसी हिस्से में कोई

खराबी होने की स्थिति में उस हिस्से की खराबी को यह इंप्लांट दूर कर लेगा। अगले चरण

में ब्रेन के अलग अलग हिस्सों को भी इसी विधि से तैयार करने की तैयारी चल रही है।

मनुष्य के अंदर उसका दिमाग ही सबसे जटिल अंग होता है। उसके मुख्य नियंत्रण का

हिस्सा भी काफी नर्म होता है। उसे ध्यान में रखते हुए ही हाइड्रोजेल के ऐसे इंप्लांट तैयार

किये जा रहे हैं, जो उन हिस्सों का विकल्प बन सकें।


 

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