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लचीला और मुड़ने वाला बर्फ भी तैयार हुआ, देखें वीडियो

लचीला और मुड़ने वाला बर्फ भी तैयार हुआ, देखें वीडियो

पानी जमने के बाद स्थिति को बदलने का नया प्रयोग सफल

चीन के झेजियांग विश्वविद्यालय में हुआ प्रयोग

बर्फ मुड़ने के बाद अपनी पूर्व स्थित में लौटा पाया

कई किस्म के नये कार्यों में इसका प्रयोग संभव

राष्ट्रीय खबर

रांचीः लचीला और मुड़ने वाला बर्फ भी अब बनकर तैयार है। आम तौर पर हम प्राकृतिक

तौर पर यही जानते हैं कि पानी तरल अवस्था में अत्यंत लचीला और किसी भी आकार में

ढाल जाने वाला होता है। लेकिन जब यह पानी जमकर बर्फ बनता है तो वह ठोस हो जाता

है और अपनी इस कठोर अवस्था की वजह से उसका लचीलापन समाप्त हो जाता है। अब

वैज्ञानिकों ने इस प्राकृतिक चुनौती के लेते हुए लचीला और मुड़ सकने वाला बर्फ बनाया

है। वैसे यह काम उतना आसान नहीं था क्योंकि यह बर्फ के प्राकृतिक गुण के खिलाफ था।

वीडियो में समझिये दोनों किस्म के बर्फ का अंतर

आम तौर पर अपनी कठोर अवस्था की वजह से ही बर्फ के बड़े बड़े ग्लेशियर टूटकर समुद्र

में आ जाते हैं। ऊंचों पर्वतों पर जमे बर्फ का अचानक टूटकर गिरना, जिसे एवालांच भी

कहा जाता है, कई विपदाएं लाता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने इस प्राकृतिक अवस्था में

तब्दीली कर लचीला बर्फ बनाया है। ऐसा काम करने के लिए दरअसल शोधकर्ताओं ने

पानी की आणविक संरचना में अति सुक्ष्म स्तर पर बदलाव किये थे। चीन के झेजियांग

विश्वविद्यालय में यह शोध किया गया है। इस काम को करने के लिए यानी बर्फ को

लचीला बनाने के लिए शोध दल ने एक अत्यंत ठंडे कमरे में यह प्रयोग किया है।

लचीला और मुड़ने वाला बर्फ प्रयोगशाला में तैयार हुआ

जिस कमरे में इसकी शुरुआत की गयी उसका तापमान शून्य से 50 डिग्री कम था। इस

कमरे में टंगस्टन की एक सूई रखी गयी थी। बाद में इस कमरे में पानी का भाप जब छोड़ा

गया और वहां विद्युतीय आवेश पैदा किया गया तो यह सारे पानी के कण उस टंगस्टन

की सूई के ईर्दगिर्द जमा हो गये। वहां जमते जाने के दौरान वे एक खास माइक्रोफाइबर का

आकार लेते चले गये, जिनकी चौड़ाई दस माइक्रोमीटर से भी कम थी। यानी वहां जो बर्फ

के छोटे टुकड़े बनाये गये वे आकार में इंसान के सर के बाल से भी पतले थे। इस बर्फ के

तैयार होन के बाद उस कमरे के तापमान को और घटाते हुए शून्य से 70 डिग्री से लेकर

माइनस 150 डिग्री तक कर दिया गया। इतने ठंडे तापमान में तैयार बर्फ को मोड़ने का यह

प्रयोग किया गया। इसी परीक्षण मंन देखा गया कि जो बर्फ कण 4.4 माइक्रोमीटर से कम

थे, वे गोलाई में मुड़ रहे थे। उन्हें मोड़कर बीस माइक्रोमीटर का एक गोला बनाकर

वैज्ञानिकों ने बर्फ के मुड़ने और उसमें लचीलापन लाने की यह स्थिति हासिल की।

परीक्षण में यह पाया गया कि इस विधि से तैयार बर्फ में 10.9 प्रतिशत तक लचीलापन आ

चुका है। अच्छी बात यह रही कि दबाव हटा लेने के बाद वहां का बर्फ अपनी पूर्व स्थिति में

वापस जाने में सफल रहा। इससे साबित हो गया कि लचीलापन सामयिक है और दबाव

नहीं होने पर वह अपने स्वाभाविक अवस्था तक लौट सकता है। इसके कई वैज्ञानिक और

चिकित्सीय फायदे होने की उम्मीद जतायी गयी है। इससे पहले का प्राकृतिक वैज्ञानिक

सिद्धांत यही था कि अत्यधिक दबाव पड़ने की स्थिति में बर्फ जल्द ही टूटने लगता है।

ग्लेशियर और बड़े बर्फखंडों के मुकाबले इसका आचरण भिन्न

इसी टूट की वजह से ग्लेशियरों के समुद्र में जाने अथवा ऊंचे पर्वतों पर बर्फ के पहाड़ के

खिसकने जैसी परिस्थितियां पैदा होती हैं। वैसे इस दौरान शोधकर्ताओं ने बर्फ की

आंतरिक संरचना पर भी गौर किया और यह पाया कि प्राकृतिक बर्फ से इसकी संरचना

भिन्न है। इसी वजह से उसमें यह लचीलापन पैदा हो सका है। बाद में इन बर्फ कणों से

विभिन्न तरंगों की रोशनी को भी गुजारकर उनमें आयी तब्दीली को देखा और नापा गया।

मुड़ने के बाद भी ऐसे बर्फ किसी ऐसे रोशनी के संकेत को अपने अंदर से आगे बढ़ाने में

कामयाब रहे। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि बर्फ पर आधारित अनेक कार्यों में

लचीला बर्फ नयी रोशनी डाल सकता है। खासकर दबाव में इसके नहीं टूटने की वजह से भी

इसका अब बहुआयामी इस्तेमाल किया जा सकता है, जो सामान्य विज्ञान के अलावा

चिकित्सा विज्ञान के लिए भी कई किस्म की संभावनाओं के द्वार खोलने वाला साबित

होगा।

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Rkhabar

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