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मछलियों के पास जमीन पर रहने के जेनेटिक गुण हैं

  • सामने की बांह के लायक बनावट है उनकी

  • कई प्रजातियों में जमीन पर रहने का गुण

  • क्रमिक विकास का दौर आगे भी चलता रहेगा

  • तीन अलग अलग अनुसंधानों से नतीजा निकाला है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मछलियों के पास जमीन पर रहने के भी गुण मौजूद हैं। दरअसल तीन अलग अलग

जेनेटिक अनुसंधानों का यह निष्कर्ष पाया गया है। लेकिन वैज्ञानिक इस बात को जान

लेने के बाद यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह गुण होने के बाद भी मछलियां पानी

में क्यों हैं। दूसरी सोच यह भी विकसित हो रही है कि क्या यह भी क्रमिक विकास का एक

हिस्सा है, जिसमें कई लाख वर्षों में होने वाले बदलाव के बाद अंततः मछलियां भी जमीन

की प्राणी में तब्दील हो जाएंगे। वैसे भी कुछ मछलियों में जमीन तो क्या पेड़ों पर भी टिके

रहने का गुण तो अब भी मौजूद है। स्पेन के बर्सिलोना स्थित पॉम्पेऊ फेब्रा विश्व

विद्यालय में इस पर शोध हुआ है। वहां के वैज्ञानिक बोरजा एस्टिवा एलटावा कहते हैं कि

टेट्रापोड अब भी इसी गुण का विकास कर पानी से जमीन पर चले आते हैं। मेंढक के बच्चों

के इस गुण को भी जेनेटिक विशेषता का जीता जागना नमूना समझा जा सकता है। इससे

समझा जा सकता है कि पानी में रहने वाली मछलियों में यह जेनेटिक गुण पहले से ही

विद्यमान है। अब यह क्रमिक विकास का नया दौर है अथवा नहीं, इसका उत्तर तो

भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है। एलटावा के मुताबिक जमीन पर रहने के लिए जो

जेनेटिक गुण चाहिए, वह इन मछलियों में मौजूद हैं। शायद इसी बदलाव के तहत कभी

जमीन पर रहने वाले ह्वेल भी अंततः समुद्र के अंदर चले गये हैं। मगरमच्छ जैसे कई

प्राणी पानी और जमीन पर रहने के समान गुण के साथ विकसित हो चुके हैं। जिस तरीके

से जमीन पर रहने वाले मेढक पानी के अंदर अंडा देते हैं, उसके ठीक विपरीत पानी में रहने

वाले मगरमच्छ जमीन पर आकर अंडा देते हैं। यह ऐसा बदलाव है, जिसका उत्तर भविष्य

के गर्भ में है।

मछलियों के पास यह गुण शायद प्राचीन काल में भी था

इस संबंध में पहले पायी गयी कई फॉसिल्स में भी यह पाया गया है कि मछलियों के फिन

यानी पंखे एक हड्डी से बने होते थे। ऐसी मछलियां इस पृथ्वी पर करीब 375 मिलियन वर्ष

पहले मौजूद हुआ करती थी। इनमें से कुछ तो इसकी मदद से जमीन पर भी रेंग लेते थे।

आज भी भारत तथा अन्य देशों में पायी जाने वाली कई प्रजातियों के पास यह गुण है।

जबकि कोई जैसी कुछ मछलियां तो खजूर जैसे पेड़ों पर भी चढ़ जाती हैं। लेकिन

वैज्ञानिकों के सामने बड़ा सवाल यह है कि यह गुण होने के बाद भी मछलियां पानी में ही

क्यों हैं। मोनास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक पीटर कूरी मानते हैं कि यह भी शायद

क्रमिक विकास का दौर है। या फिर जमीन पर होने के बाद यह मछलियां पानी में चली

गयी है, जिसकी वजह से उनकी जेनेटिक संरचना में यह गुण अब भी मौजूद हैं। कुल

मिलाकर वैज्ञानिक मानते हैं कि मछलियों की जेनेटिक संरचना में जमीन पर रहने के गुण

मौजूद हैं। इस विषय पर जारी शोध के बीच करीब सात सौ वर्ष पूर्व की एक पेंटिंग की भी

काफी चर्चा हो रही है।

यह है वह तस्वीर जिसे सात सौ वर्ष पूर्व बनाया गया था

सात सौ वर्ष पूर्व डच कवि द्वारा तैयार वह चित्र जिसमें मछली के हाथ दिख रहे हैं

डच कवि जैकब वैन मायलांट ने एक ऐसी तस्वीर बनायी थी, जिसमें एक मछली को हाथों

के सहारे दिखाया गया था। अब उस पेटिंग की सच्चाई वैज्ञानिक अनुसंधान में सामने आ

रही है। सात सौ वर्ष पूर्व की इस तस्वीर के साथ साथ अब का विज्ञान यह बताता है कि उन

मछलियों के जिन में हाथ बनाने, हवा में सांस लेने और दिमाग में जमीन पर रहने वाले

बदलाव करने के सारे गुण मौजूद हैं। हावर्ड विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता एम ब्रेंट

हॉकिंस ने एक जेब्रा फिश का अध्ययन करते हुए यह पाया कि उनके सामने दो ऐसी हड्डी

है जो बांह के लायक हैं।

अनेक विश्वविद्यालयों ने जेनेटिक संरचना पर शोध किये हैं

ओटावा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मारी एंड्रे आकिमेनको ने कहा कि शरीर में सामने के

हाथ, उसके लिए आवश्यक मांसपेशियां, हड्डी के जोड़ और खून की कोशिकाएं सभी कुछ

मौजूद हैं। दूसरी तरफ पुर्तगाल की पोर्टो विश्वविद्यालय की जीव विज्ञानी रेनेटा फ्रेइटास

कहती हैं कि शायद यह क्रमिक बदलाव का ही एक दौर है। जिसके परिणाम भविष्य में

देखने को मिल सकते हैं क्योंकि अभी उनमें बदलाव की प्रक्रिया जारी है। प्राचीन काल की

मछलियों की प्रजातियों मे से दो समूह अब भी बदले हुए स्वरुप में मौजूद हैं। इसलिए

करोड़ों वर्ष के बदलाव के दौर में क्या बदला है और क्या आगे बदलने वाला है, यह जांचना

भी विज्ञान के लिए एक क्रमिक चुनौती जैसी है। मछलियों की इसी जेनेटिक संरचना पर

यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगेन और चीन के नार्थवेस्टर्न पॉलिटेक्निकल विश्वविद्यालय में

भी शोध हुआ है।

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