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चैन की सांस लीजिए कि उल्कापिंड के टक्कर से बाल बाल बची पृथ्वी

  • सिर्फ 2950 किलोमीटर की दूरी से आगे निकला

  • पृथ्वी के दबाव में अपने रास्ते से तिरछा हो गया

  • छोटा उल्कापिंड काफी करीब से चुपचाप गुजर गया

  • कोरोना के वैश्विक दुष्काल की वजह से घोषणा नहीं

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः चैन की सांस ले सकते हैं। यूं तो वैज्ञानिकों को इसकी जानकारी थी। वैज्ञानिक

आकलन भी था कि यह उल्कापिंड फिलहाल पृथ्वी से टकराने वाला नहीं है। इसके बाद भी

लगातार उसकी निगरानी की जा रही है। इस निरंतर निगरानी की खास वजह यह थी कि

कई बार पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर भी छोटे आकार के अंतरिक्ष पिंड अपना

रास्ता बदल लेते हैं। चूंकि इस उल्कापिंड का आकार छोटा था, इसलिए बड़े खतरे की बात

नहीं थी लेकिन पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में आने की स्थिति में यह कहां और किस अवस्था

में गिरेगा, यह तय नहीं हो सकता था। लेकिन अब यह पृथ्वी से दूर जा चुका है।

हाल के दिनों में पृथ्वी के सबसे करीब से यही उल्कापिंड गुजरा है। आकार में यह किसी

मध्यम साइज के कार जितना बड़ा था। इस आकार के किसी पत्थर के अत्यंत तेज गति से

पृथ्वी पर गिरने का असर आस पास तक होना तय होता है। लेकिन अब यह अपने रास्ते

पर आगे निकल चुका है। जिस उल्कापिंड के पृथ्वी के कान से सटकर निकल जाने की

चर्चा हो रही है, वह उल्कापिंड 2020क्यू जी के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी से यह मात्र

2950 किलोमीटर की दूरी से निकला है। अंतरिक्ष के लिहाज से यह बिल्कुल सटकर

निकलने जैसी स्थिति है।

चैन की सांस लेने की बात यह भी है कि हाल के दिनों उल्कापिंडों का पृथ्वी के करीब आने

का सिलसिला काफी तेज हो चुका है। इसके बाद भी अब तक कोई भी उल्कापिंड निकट

भविष्य में भी पृथ्वी की सीध में आने की कोई उम्मीद नहीं है। जो उल्कापिंड अभी अभी

गुजरा है, उसके चित्र लेने के लिए नासा ने खास प्रबंध किये थे।

चैन की सांस तो आम आदमी के लिए वैज्ञानिक तो सतर्क थे

चूंकि यह पृथ्वी के बिल्कुल करीब था इसलिए उसके खास चित्र भी लिये गये हैं। ताकि उन

चित्रों के आधार पर उल्कापिंड की बनावट और आंतरिक संरचना के बारे में और बेहतर

जानकारी मिल सके। इस आकार के हजारो उल्कापिंड अंतरिक्ष में मंडरा रहे हैं। पृथ्वी के

करीब आने की जिनकी आशंका होती है, उनपर नियर अर्थ एस्ट्रोयर्ड के खास अभियान के

तहत लगातार नजर रखी जाती है। इस आकार के उल्कापिंडों के साथ दूसरी परेशानी यह

भी है कि यह जब तक काफी करीब नहीं आ जाते, उनके बारे में ज्यादा कुछ पता भी नहीं

चल पाता। लेकिन एक बार पृथ्वी के करीब आने की आशंका होते ही उनपर नजर रखने का

काम प्रारंभ कर दिया जाता है। कोरोना के वैश्विक दुष्काल के दौरान लोगों को और परेशान

नहीं करने की सोच के तहत वैज्ञानिकों ने इसके बारे में दुनिया को आगाह नहीं किया था।

साथ ही वे मान रहे थे कि यह अपनी धुरी पर अगर सही ढंग से चलता रहा तो वह पृथ्वी के

ऊपर आकर नहीं टकरायेगा। इस बार भी वैज्ञानिकों का आकलन सही निकला और वह

बिल्कुल करीब से आगे की तरफ बढ़ चला है। वैसे इस उल्कापिंड के गुजर जाने के बाद

इसके बारे में जानकारी दी गयी है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के

प्रभाव में इसके रास्ते में थोड़ा बदलाव भी हुआ और वह अपने नियत रास्ते से काफी

तिरछी होकर आगे न कल गयी।

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से 45 डिग्री तिरछा हो गया उल्कापिंड

नियर अर्थ ऑब्जेक्ट स्टडिज के निदेशक पॉल चोडास ने इस बारे में कहा कि किसी

उल्कापिंड पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव कैसा होता है, यह पहली बार देखने को

मिला है। वह नासा के जैट प्रोपल्सन लैबोरोटरी से इसका निरीक्षण कर रहे थे। उनके

मुताबिक छोटे आकार का उल्कापिंड भी आगे बढ़ने के क्रम में अपने पथ से करीब 45 डिग्री

विचलित हो गया है। इस उल्कापिंड से पहले मई में एक और उल्कापिंड पृथ्वी से करीब

सात हजार किलोमीटर की दूरी से गुजरा था।


 

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