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तेजी से पिघलते ग्लेशियरों का सारा पानी समुद्र में जाने से मचेगी उथलपुथल




  • अब समुद्री तट के पास का इलाका खाली करना होगा

  • स्विटरलैंड के ग्लेशियर पर हुआ अध्ययन

  • दुनिया के सारे ग्लेशियरों का एक जैसा हाल

  • समुद्री तट पर भी जलस्तर का बढ़ना तय

राष्ट्रीय खबर

रांचीः तेजी से पिघलते ग्लेशियरों का सारा पानी किसी न किसी रास्ते से होता हुआ समुद्र में जा रहा है। इस अतिरिक्त जल के समुद्र में पहुंचने का सीधा परिणाम समुद्री जलस्तर का ऊंचा उठना है।




वीडियो में देखिये ग्लेशियरों का पिघलने का खतरा

इसलिए अब समुद्री तट के करीब बसी आबादी को किसी बड़े खतरे के पहले वहां से हटने का वक्त आ रहा है।

वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक पिछले पचास वर्षों में इस धरती पर मौजूद ग्लेशियरों में से 9 ट्रिलियन बर्फ गल चुका है।

दुनिया के जिन भागों में यह विशाल बर्फखंड होते हैं, वे सभी इस क्षरण से प्रभावित हैं। इनमें ध्रुवीय ग्लेशियरों के अलावा आल्प्स और हिमालय के ग्लेशियर भी शामिल हैं।

इसकी वजह से पहले भी बड़ी बड़ी प्राकृतिक आपदाएं आ चुकी हैं। लेकिन चूंकि यह बर्फ पिघलने के बाद पानी बनकर किसी न किसी जलस्रोत से समुद्र तक पहुंच रहा है।

उसी वजह से समुद्री जलस्तर का बढ़ना तय है। साथ ही मौसम के बदलाव की वजह से अब अधिक समुद्री तूफान उठने तथा बेमौसम की बारिश से आने वाली बाढ़ का खतरा भी नजर आने लगा है।

अभी हाल ही में ब्रिटेन के तीसरे सबसे ऊंचे पर्वत के पास का सारा बर्फ भी पिघलन की सूचना आयी है।

इस बारे में वैज्ञानिकों ने अब स्विटजरलैंड के गोरनर ग्लेशियर का भी अध्ययन किया है। आल्प्स पर्वत से जुड़े इस ग्लेशियर से भी इन खतरों के संकेत मिल रहे हैं।

वैज्ञानिक इस बात को लेकर अधिक चिंतित हैं कि जो स्थिति बन रही है, वह बाद में इंसानों के भरसक प्रयास से भी सुधरने वाली नहीं होगी।

इसी मौसम के बदलाव पर ग्लासगो में वैश्विक नेताओं की बैठक में भी इस पर चिंता जतायी गयी है।

अनेक प्रदूषण के कारणों से तापमान बढ़ रहा है

वैज्ञानिक पहले से ही यह बता चुके हैं कि विभिन्न प्रदूषणों की वजह से दुनिया का तापमान धीरे धीरे बढ़ रहा है।




इसी तापमान के बढ़ने की वजह से ही ग्लेशियर अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। दुनिया के हर ठंडे प्रदेश में इसके खतरे साफ साफ नजर आने लगे है।

खतरा इस बात का भी है कि जब सारे ग्लेशियर पूरी तरह पिघल जाएंगे तो ग्लेशियर पिघलने से बने जल पर आधारित इलाकों में बसी खरबों की आबादी को भी मजबूरी में हटना पड़ेगा क्योंकि बिना पानी के प्रवाह के वहां की सारी नदियां सूख जाएंगी।

इस बात को वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों के आधार पर समझा है जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर मौजूद अंतरिक्ष यात्री भी इसे वहां से साफ साफ देख पा रहे हैं और खतरे को बेहतर तरीके से समझ रहे हैं।

स्विटजरलैं के जेरमैट के करीब ग्लेशियरों की स्थिति पर वहां मौजूद दल के अलावा सैटेलाइट और आइएसएस पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों ने एक साथ नजर रखी हुई है।

यह गोरनर ग्लेशियर आल्पस पर्वत माला का सबसे बड़ा ग्लेशियर का इलाका है। यहां के बारे में पाया गया है कि यहां के बर्फ का भंडार भी तेजी से खत्म हो रहा है।

इसकी वजह से स्थिति तेजी से बिगड़ती जा रही है। दुनिया में इससे पहले गिने गये दो लाख पंद्रह हजार ग्लेशियरों पर नियमित नजर रखी जाती है।

इसमें से कुछ तो अब ठंड समाप्त होते ही खत्म हो जाते हैं जबकि फिर से जाड़ा लौटने पर वहां थोड़ी बहुत बर्फ एकत्रित हो जाती है। लेकिन बर्फ गलने की तुलना में पिघलने की मात्रा बहुत अधिक हो चुकी है।

तेजी से पिघलते ग्लेशियरों का पानी ही तबाही लायेगा

ग्लेशियरों के पिघलने की गति के बारे में बताया गया है कि पिछले दो हजार वर्षों में सिर्फ गत पचास वर्ष में ही सबसे अधिक ग्लेशियर पिघले हैं, जिनकी पूरी तरह भरपाई नहीं हो पायी है।

अब इतना अतरिक्त पानी जब समुद्र में पहुंच रहा है तो मौसम के चक्र की वजह से बादल अधिक बनते हैं। लेकिन अब मौसम के बदलाव का प्रभाव नजर आने के बाद वैज्ञानिक इस मौसम के चक्र के पूरी तरह बिगड़ जाने की चेतावनी दे चुके हैं।

दुनिया के अनेक हिस्सों में बेमौसम और बहुत अधिक बारिश उसी का पहला कदम है। दूसरी तरफ कैलिफोर्निया जैसे इलाके में जबर्दस्त सूखा भी इसी मौसम के बदलाव का प्रभाव भर है।

शोधकर्ताओँ ने बताया है कि जब अतिरिक्त जल समुद्र तक पहुंचेगा तो किसी सामान्य बरतन की तरह ही उसके किनारे का जलस्तर भी ऊपर उठेगा।

तेजी से पिघलते के पानी से इस स्थिति का परिणाम क्या हो सकता है, यह समझना कठिन नहीं है। किसी अप्रत्याशित मौके पर अचानक ऐसा हो, उसके पहले ही समुद्री तट के करीब बसी खरबों की आबादी को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का समय करीब आ चुका है।



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