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किसानों से ही आगे बढ़ेगा हमारा देश




किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना पूरे देश की

कृषि के लिए संजीवनी का काम कर सकती है। खासकर मॉनसून की

बारिश से पहले देश के किसानों के बैंक खातों में जाने वाला यह पैसा

उन्हें कृषि से जुड़े रहने की प्रेरणा देगा। आम तौर पर यह छह हजार रुपया

ही उन्हें नये सिरे से खेती के लिए खुद को आर्थिक तौर पर तैयार करने का

संबल प्रदान करेगा। इस सच को पूरा देश जितनी जल्दी समझ ले वह

पूरे देश के लिए फायदे की बात होगी कि देश की तरक्की की गाड़ी का

असली पहिला अब भी खेती ही है। बचपन में स्कूलों में यूं ही नहीं पढ़ाया गया था कि

भारत एक कृषि प्रधान देश है। जिस देश की आबादी 33 करोड़ से

अब 130 करोड़ तक पहुंच रही है। वहां अनाज पैदा करना और हरेक के लिए

दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना कोई आसान काम नहीं था।

किसानों ने यह काम तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच कर दिखाया है।

अब भी देश में कृषि के लिए खास तौर पर सिंचाई के लिए

पर्याप्त संसाधनों का घोर अभाव है।

जब कभी मौसम साथ नही देता है तो किसानों को यह घाटा उठाना पड़ता है।

यह क्रम ज्यादा लंबा खींच गया तो किसान कर्ज के दलदल में कुछ ऐसा फंस जाता है कि

उसके लिए उससे बाहर निकलना असंभव सा प्रतीत होने लगता है।

ऐसी ही स्थिति में हर तरफ से निराश हो चुका किसान अंततः आत्महत्या करने पर

मजबूर होता है। खेती से तुलनात्मक तौर पर अधिक फायदा नहीं होने की

वजह से अनेक लोग खेती छोड़ चुके हैं। झारखंड की बात करें तो अनेक इलाकों में

लोगों ने बेहतर रोजगार की तलाश में अपनी खेती छोड़कर अन्यत्र काम करना

स्वीकार कर लिया है। इससे खेतों पर पूरे देश का पेट भरने का बोझ भी बढ़ता जा रहा है।

इस कठिन चुनौती को भी अगर कोई स्वीकार रहा है तो वह देश का किसान ही है।

इसलिए अगर उन्हें सम्मान के नाम पर सही तरीके से खेती करने में केंद्र और

राज्य सरकार मदद पहुंचा रही है तो यह एक बड़ी बात है।

इससे प्रारंभिक चरण की खेती की जरूरतों को पूरा करने में किसानों को मदद मिलेगी।

कई अवसरों पर खेती के लिए किये जाने वाले उपायों में लोगों को

नाक भौं सिकोड़ते भी देखा गया है। इस किस्म के फैसलों की

आलोचना करने वालों को सरकार द्वारा बड़े औद्योगिक घरानों को

आगे बढ़ने के लिए जो लाखों करोड़ के औद्योगिक राहत पैकेज दिये जाते हैं,

उस पर किसी को कोई परेशानी नहीं होती। यही विचार का असली मुद्दा है।

देश के औद्योगिक उत्पादन के बहाने भले ही रोजगार के नये अवसर

सृजित होते हों लेकिन देश का असली रोजगार तो कृषि से ही पैदा होता है।

देश में असली रोजगार कृषि क्षेत्र में ही पैदा होता है

इतना ही नहीं किसी कल कारखाना में हम लाखों टन लोहा या सीमेंट

अथवा सोना ही क्यों न तैयार कर लें, उससे किसी भूखे पेट को दो

वक्त की रोटी तो नहीं मिल सकती। इसलिए देश और देश की जनता की

वास्तविक जरूरतों को भी समझना होगा। सरकार का यह फैसला

शायद देश को कोई त्वरित लाभ नहीं दिला पाये लेकिन इसके

दीर्घकालीन लाभ से कोई इंकार नही कर सकता।

अपने घरों में आराम से बैठे लोगों को भी यह समझना होगा कि

किसान दिन भर खेत में पसीना बहाता है तब उनके घरों तक

अनाज पहुंच पाता है। अगर यही खेती बंद हो जाए तो अन्य कृषि प्रधान देश

भारत को अनाज उपलब्ध कराने का बड़ा कारोबार रातों रात

चालू कर देंगे।

अमेरिकी गेंहू के साथ आये गाजर घास को याद रखिये

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि साठ के दशक में

राहत के तौर पर अमेरिका द्वारा भेजे गये गेहूं का असर हम आज भी

गाजर घास के तौर पर देख रहे हैं। यह गाजर घास हमारी पारंपरिक

घासों को मार रहा है और इस गाजर घास के चमड़ा के जो रोग सामने

आ रहे हैं, उस खतरे को भी बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है।

यह अच्छी बात है कि भारत ने अनाज के मामले में दूसरे देशों पर निर्भरता

को पूरी तरह समाप्त कर लिया है।  यह उपलब्ध किसी कल कारखाने की

नहीं देश के किसान के परिश्रम की देन है। जिससे देश की मिट्टी से इतना

अनाज उग पाया है कि भारत को अब अपनी भूख मिटान के लिए दूसरों के

आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता। अतः किसानों के लिए जो कुछ किया गया है

वह निश्चित तौर पर सराहनीय है। लेकिन यह प्रयास आगे भी जारी रहना चाहिए

ताकि जो लोग मजबूरी में खेती छोड़कर अन्य रोजगार में जुटे हैं, वे भी

आगे फिर से खेती की तरफ लौट सकें और नई पीढ़ी को भी

खेती में नये रोजगार के अवसर दिखाई दे।



Rashtriya Khabar


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