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मेघा रे मेघा रे की आस लगाये बैठे हैं किसान

मेघा के आने की सूचना हो गयी है। यानी ठेठ हिंदी में मॉनसून आने के लिए बढ़ चला है।

केरल के तट तक पहुंचते मॉनसून के बादलों के बीच देश के कृषि आधारित अर्थव्यवस्था

में असली सैनिक यानी किसान इसकी तैयारियों मे जुटा है। बीच में यह गाड़ी मेन लाइन

छोड़कर लूप लाइन में उतरती हुई नजर आयी थी। लेकिन पाकिस्तान से आये टिड्डी दल

हवा के रुख की वजह से आगे नहीं बढ़ पाया है। वैसे यह खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।

जो छोटे मोटे टिड्डी दल भारत के जंगलों में बच जाएंगे, वे भी अगले छह महीने के भीतर

अपनी आबादी को बीस गुणा बढ़ा लेंगे। इसलिए मेघा की इंतजार के साथ साथ हमें बाकी

सब परेशानियों पर ध्यान देना चाहिए।

मेघा के इंतजार के साथ साथ हमें कोरोना का भी ख्याल रखना है। देश भर के विभिन्न

हिस्सों से विभिन्न हिस्सों तक मजदूर पहुंच रहे हैं और उनके साथ साथ कोरोना संक्रमण

भी नये नये इलाकों तक फैल रहा है। खेती की तैयारियों के बीच दूर दराज के गांवों तक इस

चुनौती पर भी ध्यान रखना होगा। वैसे यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार, चाहे वह केंद्र की

हो अथवा राज्यों की, उनके लिए मजदूरों की अहमियत संकट की घड़ी में भी कुछ नहीं रही

है। यह तो नेताओं को एहसास हुआ कि वोट का तेजी से नुकसान हो रहा है तो सभी आनन

फानन में मजदूरों के हित चिंतक के तौर पर मैदान में उतर आये।

इसी बात पर पुरानी फिल्म का गीत फिर से याद आयी

फिल्म प्यासा सावन का यह गीत है। इस गीत को लिखा था संतोष आनंद ने और संगीत

में ढाला था इस गीत को स्वर दिया था लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर ने। गीत के शब्दों

के साथ साथ श्रीदेवी के नृत्य ने इस फिल्मी सीन में चार चांद लगा दिये थे। क्लासिकल

धून पर और बारिश के बीच समूह नृत्य का यह दृश्य अद्भुत है। गीत के बोल कुछ इस तरह

हैं।

मेघा रे मेघा रे
मत परदेस जा रे
आज तू प्रेम का संदेस बरसा रे

कहां से तू आया कहां जायेगा तू
के दिल की अगन से पिघल जायेगा तू
धुआँ बन गयी है ख़यालों कि महफ़िल
मेरे प्यार कि जाने कहां होगी मंज़िल

हो मेघा रे, मेघा रे मेघा रे मेघा रे
मेरे ग़म की तू दवा रे, दवा रे
आज तू प्रेम …

बरसने लगी हैं बूँदें तरसने लगा है मन
हो, ज़रा कोई बिजली चमकी लरज़ने लगा है मन
और न डरा तू मुझको ओ काले काले घन
मेरे तन को छू रही है प्रीत की पहली पवन

हो, मेघा रे मेघा रे
मेरी सुन ले तू सदा रे
आज तू प्रेम का संदेस बरसा रे
हो मेघा रे मेघा रे …

मन का मयूरा आज मगन हो रहा है
मुझे आज ये क्या सजन हो रहा है
उमंगों का सागर उमड़ने लगा है
बाबुल का आँगन बिखरने लगा है

न जाने कहां से हवा आ रही है
उड़ाके ये हमको लिये जा रही है
ये रुत भीगी-भीगी भिगोने लगी है
के मीठे से नश्तर चुभोने लगी है

चलो और दुनिया बसाएँगे हम तुम
ये जन्मों का नाता निभायेंगे हम तुम
हो मेघा रे मेघा रे, मेघा रे मेघा रे
दे तू हमको दुआ रे

आज तु प्रेम का संदेस बरसा रे
हो मेघा रे मेघा रे …

मेघा रे झारखंड के लिए भी वरदान लाये इसकी उम्मीद है

मेघा झारखंड के लिए भी वरदान लाये, इसकी उम्मीद की जा सकती है। साथ में राज्य में

विधानसभा चुनाव भी आ रहे हैं। जाहिर है कि मॉनसून के साथ साथ इस मुद्दे पर भी

घमासान होने से कोई इंकार नहीं कर सकता है। कौन किसको किस दांव से पछाड़ना

चाहेगा, यह देखना रोचक होगा। लेकिन फिलहाल तो नकदी का संकट है तो चुनाव में भी

हर कोई अपना आर्थिक घाटा पूरा करने की भरसक कोशिश करेगा। यानी यह भी तय

मानिये कि उपचुनाव के आर्थिक बोझ भी पहले के मुकाबले बहुत अधिक होने जा रहे हैं।

इसलिए कोरोना से बच निकलने वाली पार्टियों को जनता को इस लॉक डाउन में हुए

नुकसान की भरपाई अपनी जेब या पार्टी फंड से करनी पड़ेगी।

अब मेघा पर ही यह निर्भर है कि वह मॉनसूनी बादल और चुनावी बादल को कैसे और कहां

बरसाने जा रही है। तब तक तो लॉक डाउन के अगल चरण की सावधानी बरतते हुए बादल

आने के पहले गर्मी के लू से बचने की तैयारियों में जुटे रहें। इस मेघा के दौर में कोरोना

काल मे जो कुछ बदल चुका है, उसका असर भी देखने को मिलेगा। बहुत कुछ बदला है

और इस बदलाव या यूं कहें कि नाराजगी का खुला प्रदर्शन स्थिति के सामान्य होने तक

देखने को मिलेगी। कोरोना संकट ने खास तौर पर महानगरों से मजबूरी में भागने वाले

लोगों के अंदर जो आग भर रखी है, उसका विस्फोट गांव से होगा तो सारे राजधानियों तक

इसका असर देखने को मिलेगा।


 

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