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परिवार के विवाद में दो धड़ों में बंट गयी पार्टी, दूसरे लोग हैरान परेशान

लोजपा में फूट से निश्चित तौर पर नीतीश कुमार को फायदा

चिराग की बातों ने नीतीश को नाराज कर रखा था

जमीन खिसकने का अंदाजा नहीं लगा पाये चिराग

दूसरे नेताओं के साथ जदयू के अच्छे रिश्ते रहे

राष्ट्रीय खबर

पटनाः परिवार के विवाद में हालत कुछ ऐसी हो गयी है कि लोजपा के अन्य लोग यह तय

नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें किस तरफ जाना है। लोक जनशक्ति पार्टी साफ तौर पर दो

हिस्सों में बंट चुकी है। वैसे यह भी स्पष्ट हो गया है कि चिराग पासवान का विरोधी गुट

भाजपा के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, इसी वजह से आनन फानन में लोकसभा अध्यक्ष ने

उनकी दलील को स्वीकार कर लिया है। वैसे इसे प्रस्ताव को अदालत में चुनौती दी जाने

वाली है और यह स्थापित परंपरा से हटकर लिया गया फैसला है। लेकिन इसके बीच यह

संकेत साफ है कि भाजपा के खिलाफ जुबान नहीं खोलने के बाद भी चिराग पासवान की

भाजपा की नजरों में अब कोई अहमियत नहीं रह गयी है। चिराग पासवान के चाचा

पशुपति पारस ने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत बना ली। माना जा रहा है कि इस टूट का

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का समर्थन हासिल है। दरअसल एलजेपी के टूटने या कमजोर

होने से सबसे ज्यादा फायदा जेडीयू को ही होनेवाला है। बता दें कि वर्ष 2013 में जब से

नरेंद्र मोदी ने बीजेपी की बागडोर संभाली है, तब से नीतीश कुमार के साथ प्रेम-घृणा का

रिश्ता रहा है। मोदी की नेतृत्व वाली भाजपा के साथ संबंध बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश

कुमार का केवल राजनीतिक मजबूरियों की वजह से हैं। 2020 विधानसभा चुनाव रिजल्ट

के बाद से ही नीतीश कुमार अपनी पुरानी ताकत को हासिल करने की लगातार कोशिशें

कर रहे हैं। क्योंकि गठबंधन में संख्या के लिहाज से नीतीश कुमार बीजेपी के जूनियर बन

गए हैं। ऐसी खबरें आई कि लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) में तख्तापलट का नीतीश

कुमार और उनकी पार्टी का आशीर्वाद हासिल है।

परिवार के विवाद को कुछ लोगों ने हवा भी दी

इस क्रम में कुछ नेताओं का नाम भी सामने आया लेकिन भाजपा की चर्चा अब तक नहीं

हो पायी जबकि लोकसभा अध्यक्ष का फैसला भाजपा को फायदा देने वाला ही था। नीतीश

कुमार और लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान ने आपस में सियासी सम्मान का

रिश्ता रखा था। दोनों एक-दूसरे के जातिगत वोट आधार के महत्व को अच्छी तरह

समझते थे। रामविलास पासवान के बेटे चिराग ने 2020 के चुनावों में नीतीश कुमार की

खुले तौर पर आलोचना की थी और दोनों पार्टियां चुनाव में एक-दूसरे के आमने-सामने

थीं। जेडीयू नेताओं का कहना है कि चिराग पासवान की वजह से 2020 चुनावों में उनकी

पार्टी को 46 सीटों का नुकसान हुआ। पार्टी यह भी मानती है कि चिराग को भाजपा नेताओं

के एक खास वर्ग का समर्थन हासिल है। जिसकी वजह से जेडीयू 71 (साल 2015 ) खिसक

कर 43 (साल 2020) सीटों पर आ गई। वहीं बीजेपी 53 (साल 2015) सीटों से बढ़कर 74

(साल 2020) सीटों पर पहुंच गई। अब बिहार में 6 प्रतिशत पासवान (दुसाध) मतदाता हैं

और एलजेपी के गठन के वक्त से ही वे रामविलास के प्रति वफादार हैं। नीतीश कुमार ने

अप्रैल 2018 में रामविलास पासवान के कहने पर पासवान को भी महादलित का दर्जा दे

दिया।

राम विलास के वोट बैंक पर नजर है नीतीश कुमार की

अब रामविलास पासवान के निधन पर नीतीश कुमार पासवान मतदताओं को अपनी

तरफ करना चाहेंगे। लोजपा पर कब्जे की लड़ाई में फिलहाल आगे दिख रहे पशुपति पारस

का भी झुकाव नीतीश कुमार की ओर है। नीतीश कुमार की बनाई हुई गैर-यादव ओबीसी

और महादलित जेडीयू के वोट-बेस का बड़ा हिस्सा है। बीजेपी की नजर ओबीसी वोटों पर

भी है, ऐसे में दोनों सहयोगियों के बीच तनातनी तय है। चूंकि बिहार में केवल 16% उच्च

जाति के वोट हैं, इसलिए बीजेपी ने अपनी चुनावी संभावनाओं को मजबूत करने के लिए

ओबीसी (हिन्दुत्व के नाम पर यादव सहित) मतदाताओं की ओर रुख किया है।

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