बाजार में बिक रही नकली एंटी बायोटिक

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  • कुल बिक्री का 0.1 से 0.3 प्रतिशत नकली
  • चार से पांच प्रतिशत दवाएं मानकों पर खरी नहीं
  • स्वयं सेवी संस्था की मदद से हुआ सर्वेक्षण
  • 47 हजार एकत्र नमूने की करायी गई जांच
  • मोटा मुनाफा कमाने के लिए सबसे जयादा बेची जाती है एंटी बायोटिक

नयी दिल्ली : देश में बिकने वाली दवाओं में 0.1 प्रतिशत से 0.3 प्रतिशत नकली हैं, जबकि चार से पांच प्रतिशत दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। नकली दवाओं में बाजार में सबसे ज्यादा एंटी बायोटिक बेची जा रही है क्योंकि इन पर मोटा मुनाफा मिलता है। सरकार के एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में ये बातें सामने आयी हैं जिसके आंकड़े जल्द ही सार्वजनिक किये जायेंगे।



राष्ट्रीय राजधानी में आज से शुरू हुये इंटरनेशनल आॅथेंटिकेशन कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के उपनिदेशक रंगा चंद्रशेखर ने बताया कि नकली दवाओं के विश्वसनीय आंकड़ों के लिए अब तक कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ था। सरकार ने देश भर के शहरी और ग्रामीण इलाकों में दवा दुकानों से 47 हजार नमूने एकत्र किये जिनकी जांच में पाया गया है कि दवा बाजार में 0.1 से 0.3 प्रतिशत नकली हैं। इस सर्वेक्षण में एक स्वयं सेवी संस्था की भी मदद ली गयी है।

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि नकली दवाओं में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक बिकती हैं जबकि उसके बाद एंटी बैक्टीरियल दवाओं का स्थान है। देश के कुल दवा बाजार का आकार तकरीबन एक लाख 10 हजार करोड़ रुपये का है। उन्होंने कहा कि अधिकतर नकल उन दवाओं को बनायी जाती है जिनमें मुनाफा काफी ज्यादा होता है, यानी जिनके उत्पादन और विक्रय मूल्य का अंतर ज्यादा होता है। श्री चंद्रशेखर ने कहा कि इसके अलावा चार से पांच प्रतिशत दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतर पायीं। ये दवाएं वास्तविक विनिर्माताओं द्वारा बनायी गयी थीं।

हालांकि, इनके मानक से कमतर होने के कई कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण उनके भंडारण में कमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि देश में मौसमी विविधता के कारण आपूर्ति श्रंखला में दवाओं को नमी आदि से बचा पाना मुश्किल होता है जिससे उनकी रासायनिक संरचना प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि निर्यात से पहले सभी दवाओं के नमूनों की जांच की जाती है और उनके मानकों से कमतर पाये जाने की स्थिति में निर्यात की जाने वाली पूरी खेप को वापस भेजने का प्रावधान है। निर्यात की जाने वाली दवाओं के लिए ड्रग आॅथेंटिकेशन एंड वेरिफिकेशन एप्लिकेशन (दवा ऐप) भी बनाया गया है जिससे किसी भी चरण में दवा की प्रामाणिकता की जांच की जा सकती है।

सरकार घरेलू बाजार के लिए भी दवा ऐप लागू करने पर विचार कर रही है, लेकिन इसके लिए उत्पादन संयंत्रों में जरूरी बदलाव काफी महंगे होने के कारण कंपनियाँ अभी इसके लिए तैयार नही हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन ने किया। वक्ताओं में उपभोक्ता मामले विभाग के संयुक्त सचिव पीवी रामा शास्त्री भी मौजूद थे।

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