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जिन्हें विलुप्त माना गया था वे समुद्री तल पर आराम से हैं

  • प्रशांत महासागर के समुद्री तल पर नजर आये हैं

  • पहले वैज्ञानिकों ने उन्हें विलुप्त प्रजाति माना था

  • दोनों ही एक दूसरे से जुड़कर विकसित होते हैं

  • प्राचीन काल से एक दूसरे के करीब रहते हैं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जिन्हें विलुप्त माना गया था, वे फिर से सकुशल पाये गये हैं। इस खोज से समुद्री

वैज्ञानिकों को भी काफी प्रसन्नता हुई है। पिछले 273 मिलियन वर्षों से समुद्र के यह दो

जीवन एक साथ रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इनके साथ रहने की वजह से यह भी कहा है कि

दरअसल इन दोनों की आपस में शादी हो चुकी है। इसी वजह से वे प्राचीन काल में भी एक

साथ ही रहा करते थे। काफी अरसा पहले जब इनके अवशेष खोजे गये थे तो वैज्ञानिक

परीक्षण के बाद यह मान लिया गया था कि दोनों अब इस धरती से विलुप्त हो चुके हैं।

लेकिन जिन्हें विलुप्त माना गया था, उन्हें एक शोध दल ने फिर से खोज निकाला है।

प्रशांत महासागर के तल पर जापान और पोलैंड के शोध दल ने उन्हें देखा है। होनसू और

शिकोकु के तट के करीब उनकी खोज हुई है। जिनकी खोज हुई है वे एक किस्म के कोरल

और सी लिलि प्रजाति से मिलता जुलता फूल जैसा प्राणी है। इन दोनों के अंदर हड्डियों का

कोई ढांचा नहीं होता है। वे अत्यंत प्राचीन काल से ही एक दूसरे के करीब रहते हैं, इसकी

पुष्टि तो पहले मिली फॉसिल से पहले ही हो चुकी है। लेकिन पहले का वैज्ञानिक आकलन

था कि यह दोनों ही प्रजातियां पृथ्वी से लाखों वर्ष पूर्व ही विलुप्त हो चुकी हैं। काफी समय

तक उनके बारे में कुछ पता भी नहीं चल पाया था। इस वजह से उन्हें विलुप्त की श्रेणी में

डाल दिया गया था। नॉन स्केलिटल कोरल और क्रिनोयड ही वह दो प्राणी हैं, जो एक दूसरे

के करीब रहते हैं। क्रिनोयड को समुद्री लिलि प्रजाति का करीबी माना जाता है। इन दोनों के

फिर से एक साथ देखकर वैज्ञानिक न सिर्फ प्रसन्न हुए हैं बल्कि बड़ी सावधानी से उनका

अध्ययन भी किया जा रहा है।

जिन्हें विलुप्त माना था उन्हें देखकर वैज्ञानिक प्रसन्न

इससे फिर से यह साबित हो गया है कि समुद्री जीवन के सारे रहस्यों का हम अब तक पता

नहीं लगा पाये हैं। हाल के दिनों में समुद्री में 12 नई प्रजातियों का भी पता चला था। इसके

अलावा समुद्र के सबसे लंबे प्राणी को भी हाल ही में देखा गया था। अब इन दो जीवनों के

अध्ययन से यह पता चला है कि जिन्हें विलुप्त  समझा गया था वे कोरल ही इस क्रिनोयड

के साथ खुद को जोड़ लेता है। इसकी वजह से कोरल को लगातार पुष्टि भी मिलती रहती

है। दोनों ही एक दूसरे की मदद की वजह से बड़े होते हैं। बड़ा होने के साथ साथ दोनों के

पास अधिक गहराई में जाने की शक्ति भी मिलती जाती है। प्राचीन काल में वे समुद्री तल

पर बहुतायत में पाये जाते थे। लेकिन हाल के वर्षों में उनका कोई अता पता नहीं चल पाया

था। पहले हुए अनुसंधानों में सिर्फ उनके फॉसिल ही वैज्ञानिकों को मिले थे। इसके पहले

मिले फॉसिल के आधार पर ही इनके बारे में वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था। अब उन्हें

जिंदा देखकर उनके बारे में और जानकारी हासिल की जा रही है। जीवित अवस्था में पाये

गये एक जोड़ा के बगल में एक मृत जोड़ा भी नजर आता है, जो शायद उम्र अथवा किसी

दूसरी वजह से मर गये हैं। समुद्री तल पर 330 फीट नीचे इस शोध दल को षटकोणीय एक

दुर्लभ किस्म का कोरल भी दिखा है। वहीं मेट्रिडॉयोडिया भी दिख रहा है, जिसने अपनी

तरफ से एक समुद्री लिलि को पकड़ रहा है। इससे दोनों के उस रिश्तों की पुष्टि होती है जो

लाखों वर्ष पुराना है। लेकिन यह खोज साबित कर गया है कि समुद्री तल पर जिन

प्रजातियों को विलुप्त समझा गया है, उसके बारे में नये सिरे से जानकारी हासिल करने की

आवश्यकता है।

दोनों एक दूसरे के करीब क्यों, इस पर शोध जारी है

वैसे अब तक के शोध में यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जिन्हें विलुप्त  माना गया था वह दो

प्रजातियां आखिर इतने समय से एक दूसरे के साथ क्यों रहती हैं। दोनों को एक दूसरे के

करीब होने का लाभ मिलता है, इसे समझा जा सकता है। फिर भी यह लाभ क्या है, उसे

समझने के लिए अब वैज्ञानिक अनुसंधान चल रहा है। प्रारंभिक अनुमान है कि क्रिनॉयड

का शारीरिक ढांचा ही कोरल को जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। इस जुड़ाव से दोनों को

कोई नुकसान नहीं होता बल्कि दोनों को ही अपने अपने विकास में इससे मदद मिलती है।

शायद इसी वजह से दोनों प्राचीन काल से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। अब वैज्ञानिक यह

जानना चाहते हैं कि दोनो को अगर फायदा होता है तो वह किस स्तर पर होता है जो दोनों

के विकास में सहायक साबित हो रहा है।

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