बारूद के दो चेहरे पहला आतिशबाजी तो दूसरा युद्ध के हथियार

बारूद के दो चेहरे पहला आतिशबाजी तो दूसरा युद्ध के हथियार
  • चीन में हुआ था दोनों का आविष्कार

  • रॉकेट से होता था शत्रु पक्ष पर हमला

  • बंदूक में भी इस्तेमाल होता था बारूद

  • अफ्रेड नोबल ने इसका नया स्वरुप बनाया

प्रतिनिधि



नईदिल्लीः बारूद का आविष्कार चीन में हुआ था इस विषय पर कोई विवाद नहीं है।

लेकिन इसके आविष्कार की परिस्थितियों पर दो अलग अलग राय है।

पहली राय है कि एक रसोइये द्वारा गलती से एक रसायन आग के ऊपर डालने से आग का रंग बदल गया।

लोगों की रूचि बढ़ी तो कुछ और रसायन डालने से आग से रंग बिरंगी लपटें निकली।

यहां से आतिशबाजी की शुरूआत हुई।

दूसरा सिद्धांत वहां के साधुओं द्वारा जीवन को बेहतर बनाने के लिए किये जाने वाले वैज्ञानिक प्रयोग थे।

आयु बढ़ाने के लिए दवा ईजाद करने के प्रयोगों के दौरान इस बारूद का आविष्कार हुआ।

लेकिन यह अक्सर ही नहीं कहा जाता है कि आतिशबाजी से ही अंततः युद्ध के बारूद की नींव पड़ी।

इसका सबसे प्रथम इस्तेमाल भी चीन में ही हुआ था। हम आज के दौर में दीपावली के दौरान जो रॉकेट छोड़ते हैं,

उसका बड़ा स्वरूप ही चीनी बारूदी हमले का प्रारंभिक चेहरा था।

13वीं सदी के बीच में चीन और मंगोल युद्ध में इसका जोरदार इस्तेमाल होने लगा था।

काफी दूरी से छोड़े गये ऐसे रॉकेट दुश्मन के ठिकानों पर आकर गिरते थे और आग लगा देते थे।

बाद में इन्हीं रॉकेटों के साथ अलग से विस्फोटक बांधकर भेजा जाने लगा, जो रॉकेट के गंतव्य तक पहुंचने के बाद धक्के की वजह से फट जाते थे और नुकसान पहुंचाते थे।

बारूद के आविष्कार के तौर पर रॉजर बेकोन की भी चर्चा

यूरोप के लोगों का दावा है कि अंग्रेज साधु रॉजर बेकोन ने अपनी विधि से बारूद का आविष्कार किया था।

हालांकि उनके आविष्कार का काल भी यही बताया जाता है।

इस श्रेणी के बारूद में आम तौर पर गंधक, पोटाश और चारकोल का मिश्रण होता है। अलग अलग अनुपात के मिश्रण का असर भी अलग अलग होता है।

इसी बारूद के आधार पर उस काल में बंदूकों का भी इस्तेमाल किया गया।

हम आज भी ग्रामीण इलाकों में भरठुआ बंदूक देखते हैं, जिनमें सामने से बारूद भरने के बाद

उसके सामने निशाना साधने वाली गोलियां डालते हैं।

इसी क्रम विमान से बम गिराने में भी इसी किस्म के बारूदों का मिश्रण इस्तेमाल में लाया जाता था

जो विमान से जमीन पर गिरते ही फट जाया करते थे।

बारूद का दूसरा स्वरुप अलफ्रेड नोबल ने तैयार किया

1847 में इसका चेहरा बदलने में इटली के वैज्ञानिक एस्कानियो सोब्रेरो की भूमिका रही।

उन्होंने अलग मिश्रण से बेहतर बारूद बनाने में प्रारंभिक सफलता पायी।

उनके स्वीडिश मित्र वैज्ञानिक अलफ्रेड नोबल ने उनसे यह वैज्ञानिक फार्मूला प्राप्त किया।

नोबल जर्मनी लौट गये। उन्होंने अपने नाइट्रोग्लिसरिन से इस फार्मूले का मिश्रण किया।

कई बार प्रयोग के दौरान नोबल को जबर्दस्त नुकसान हुआ।

प्रारंभिक प्रयोग के दौरान एक के बाद एक हादसे हुए।

उनके भाई की मौत हो गयी। उनकी पूरी प्रयोगशाला ही उड़ गयी।

लेकिन अल्फ्रेड नोबल इन परेशानियों से विचलित नहीं हुए।

निरंतर शोध के बाद उन्होंने अपने नाइट्रोग्लिसरिन को वहां स्थापित किया, जहां से अत्यधिक शक्तिशाली बारूद बनाया जा सकता था।

यहीं से सबसे पहले डाइनामाइट बना। 1867 में नोबल के इसका पेटेंट कराया और इसका नाम दिया ब्लास्टिंग पाउडर।

उसके बाद बारूद के क्रमिक विकास क्रम में टीएनटी से होते हुए आरडीएक्स तक का सफर फिर कभी।



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