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नौंवे ग्रह के अस्तित्व को अब विज्ञान भी मानता है

  • भारतीय ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांतों को नकारता रहा

  • गणित के सिद्धांत पर इसके होने का आकलन

  • अनुमान है कि पृथ्वी से दूसरी तरफ की धूरी

  • ग्रह है अथवा ब्लैक होल अभी यह पता नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नौंवे ग्रह के बारे में आधुनिक विज्ञान कई परस्पर विरोधी सिद्धांतों और तर्कों से

गुजरता हुआ अब मान रहा है कि सौर मंडल में एक ऐसा ग्रह भी हो सकता है। पिछले पांच

वर्षों से इस मुद्दे पर न सिर्फ बहस चल रही है बल्कि इस पर लगातार खगोल वैज्ञानिक

प्रयोग भी कर रहे हैं। अब जाकर वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि एक ऐसा ग्रह यानी नौंवा ग्रह

यूरेनस और नेप्चुन से भी अधिक दूरी पर हो सकता है, जो हमारी नजरों से ओझल है।

अनुमान यह भी है कि इस ग्रह की धूरी और दूरी दोनों कुछ इस तरीके से हैं कि पृथ्वी से

वहां तक नजर नहीं पहुंच पाती है। शायद यह सूर्य के दूसरी तरफ है। लेकिन यह सारी

गणना वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित है और अब तक इसके साक्षात प्रमाण नहीं मिल

पाये हैं। सिर्फ गणितीय आकलनों के आधार पर इस नौंवे ग्रह के होने का आकलन किया

गया है। वैसे भारतीय ज्योतिष शास्त्र भी अपनी गणितीय गणना में नौ ग्रहों के आधार पर

ही सारा कुछ निर्धारित करता है। यह मान्यता है कि इंसान के शरीर और पूरी पृथ्वी पर इन

नौ ग्रहों का समय समय पर प्रभाव पड़ता है जो हर कुछ को सुधारता अथवा बिगाड़ता है।

ज्योतिष शास्त्र का यह सिद्धांत वैज्ञानिक कसौटी पर स्वीकार्य नहीं हैं। पिछले पांच वर्षों से

इस बारे में जो कुछ काम चल रहा था, उसी के आधार पर इस नौंवे ग्रह के कहीं छिपे होने

का अनुमान लगाया जा रहा है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि नेप्चुन के आकार

का यह ग्रह सूर्य के चारों तरफ पृथ्वी की उल्टी दिशा में चक्कर काटता हुआ हो सकता है।

यह शायद प्लूटो से भी अधिक दूरी पर है। इस वजह से वह पृथ्वी पर स्थापित

अत्याधुनिक उपकरणों से भी नजर नहीं आता है।

नौंवे ग्रह की गणना का आकलन यह काफी दूर स्थित है

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक यह ग्रह भी आकार में पृथ्वी से दस

गुणा अधिक बड़ा हो सकता है और इसकी दूरी सूर्य और नेप्चुन के बीच की दूरी से बीस

गुणा अधिक है। बताते चलें कि नेप्चुन को ही इस सौर मंडल का सबसे दूर स्थित ग्रह

माना गया है। यह हमारे सौरमंडल का आठवां ग्रह है। अगर कोई ग्रह उससे भी बीस गुणा

अधिक दूरी पर है तो जाहिर तौर पर वह पृथ्वी की नजरों से ओझल ही रहेगा। लेकिन अब

भी इस ग्रह के होने को वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित किया जाना शेष है। इसी साल जुलाई

में हावर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसके अस्तित्व को साबित करने की एक

तकनीक प्रस्तुत की थी। इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया था सौरमंडल में मौजूद

ब्लैक होलों का भी पता चलता चला गया। इसलिए अब यह माना जा रहा है कि इसी

तकनीक को और अधिक विकसित कर न सिर्फ नौंवे ग्रह के होने की पुष्टि की जा सकती है

बल्कि यह भी पता लगाया जा सकता है कि वास्तव में वहां हमारी इस सौरजगत में कहां

पर अवस्थित है तथा उसकी असली धूरी क्या है। शोधकर्ता मानते हैं कि इस विधि से यह

भी प्रमाणित हो जाएगा कि दरअसल यह ग्रह भी है अथवा एक ब्लैक होल है, जो इस

स्थान पर मौजूद होने का गणितिय संकेत दे रहा है। सुदूर अंतरिक्ष में ब्लैक होल की

मौजूदगी का पता उसके पास से गुजरने वाले धूमकेतुओँ की चमक से होता है।

ग्रह है या कोई ब्लैक होल यह तो जांच से ही पता चलेगा

ब्लैक होल के पास से गुजरते हुए यह धूमकेतु अजीब किस्म की रोशनी बिखेरने लगते हैं।

ऐसा इसलिए होता है कि वे भी ब्लैक होल के प्रचंड गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आ जाते हैं।

चूंकि उनकी गति बहुत तेज होती है इसलिए ब्लैक होल में सोख लिये जाने के पहले ही तेज

रोशनी छोड़ते हुए वे आगे बढ़ जाते हैं। अब शोध दल रुबिन वेधशाला के खगोल दूरबीन का

इस्तेमाल कर वर्ष 2022 में इस पर निरंतर काम करने की योजना बना रहा है। इस नौंवे

ग्रह के होने की पुष्टि का काम पूरा करने के साथ साथ इसी तकनीक के आधार पर वे इस

सौरजगत में कहां कहां ब्लैक होल स्थित है और उनका आकार क्या है, उसका भी पता

लगाना चाहते हैं। भारतीय ज्योतिष विज्ञान में नौंवे ग्रह का उल्लेख होने के बाद भी

वैज्ञानिक तौर पर इसे प्रमाणित किया जाना अभी शेष है क्योंकि पहले जिसे ग्रह करार

दिया गया था, उसके ग्रह होने का वैज्ञानिक दर्जा खत्म कर दिया गया है।

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