और जीतन ने फहरा ही लिया अपना तिरंगा

राजलक्ष्मी सहाय

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अचानक घबरा गया था जीतन। उठकर बैठ गया। ढिबरी की हल्की रोशनी। भादो की तड़-तड़ वर्षा। कनकनी सी थी झोपड़ी में – मगर जीतन पसीने से तर। रात आधी बीत चुकी थी। फिर से वही सपना। वही बेचैनी। कांप रहा था वह बड़ी मुश्किल से खटिया से उतरा। घड़े से पानी निकाला पानी पीकर गमछे से माथे का पसीना पोंछा वही समय-वही सपना। स्वप्न नहीं था केवल यह। एक हकीकत था, जो सपने का रूप लेता था। बार-बार सालों से।
आजादी से कुछ वर्षों पहले। ऐसी ही बरसती रात थी। किवाड़ के सांकल को कोई जोर जोर से पीट रहा था। बापू को तेज बुखार था। जीतन ने किवाड़ खोलाा। चेहरे पर नकाब डाले सात-आठ लोग धड़ाधड़ झोपड़ी के भीतर आए- अंदर से बंद कर दिया। डर गया था जीतन। हाथ पैर कांप रहें थे। कोठरी में कोने से सटकर खड़ा।
‘‘डरो मत- हम कुछ नहीं करेंगे- एक ने कहा नकाब हटा लिया था सबने।’’
‘‘जमीन पर बैठ गए थे सब। आपस में जोर जोर से बाते कर रहें थे।’’
‘‘ हम क्रांतिकारी हैं-आजादी के लिए लड़ रहे है।’’

‘‘ आ..जा..दी जीतन की जुबान लड़खड़ा रही थी।’’
‘‘हां मुलक आजाद होगा- घर-घर में तिरंगा लगेगा- अपना झंडा-भारत का झंडा’’
एक ने पूछा— ‘‘कुछ खाने के लिए है? हम भूखे हैं’’
पिछले शाम ही माई ने ढेकी में धान कूटा था। मोटा मोटा लाल चावल। भूख की तड़प जीतन खूब जानता था।
‘‘ हम भात पका देते हैं’’ जीतन ने कहा।
लकड़ी लगाकर चूल्हा जलाया-मिट्टी की हांडी में भात पकाया। अंधेरे में ही ने भात और कुदरूम की चटनी पीसा। क्रांतिकारियों ने भात और कुदरूम की चटनी खाया खाते-खाते अंग्रेजों का जिक्र होता तो दांत पीसने लगते। बापू ज्वर से बड़बड़ा रहा था। सबने नकाब पहना और निकल गए। जाते-जाते एक ने उसका पीठ ठोंका, कहा- ‘‘तुम भी अपनी झोपड़ी में झंडा फहराना-भारत आजाद होगा’’
‘‘हमारे बारे किसी से मत कहना’’—-दूसरे ने कहा सुबह होने तक खटिया पर बैठा रहा जीतन। सो न सका। जाते-जाते कागज का एक टुकडा उनके झोले से गिर पड़ा था। उन्हें देने के लिए तेजी से निकला, मगर न जाने कहां गायाब हो गए थे वे। देखा जीतर ने- सुभाष नेताही की तस्वीर थी। लकड़ी का बक्सा खोला। ससुराल से एक नयी धोती मिली थी। सहेजकर उसी धोती में लपेटकर रख दिया।
अगले दिन जंगल में कुछ लाशे पडीं थी। भीड़ लगी थी। जीतन ने देखा- ये वही थे जिनको उसने नमक-भात-चटनी खिलाया था। नमक का कर्ज अदा हुआ था।
वह सपने में देखता- उसकी झोपड़ी पर तिरेगा लहरा रहा है। कभी देखता उसकी झोपड़ी पक्के घर में बदल गई है। सपना टूटता तो खपरैल से रोशनी झांकती नजर आती।
पच्चीस तीस झोपड़ियां थीं गांव में। एक पक्का घर था मुखिया जी का। जंगलो के बीच-बीच मे बसी आबादी। छोटे-छोटे खेतों के पैबंद लगे होते थे। उसी की पैदावार से जीवन चलता। मगर जीतन के हिस्से पबंद भी न था। बापू किसी की छप्पर बनाता, तो किसी का हला चलाता। गांव में कालाबाजर फैला। बापू, माई और जीतन क घरवाली सबको लील गया। एक बेटा था वह भी गांव छोड़कर निकल गया। ठेकेदार आया था ट्रक लेकर। र्इंटा भठ्ठा में काम करने आसाम चला गया। न कोई खबर मिली- न खुद आया। जीतन अकेला अपनी झोपड़ी में वही और वहीं सपना। वही घबराहट- हलक सूख जाना-पसीने से तर।
अरे जितनवा—- जितना रे जागल नहीं है का मुखिया का चरवाहा था। झोपड़ी के बाहर खड़ा चिल्ला रहा था।
‘‘ का है बबुआस भोरे भोरे चिचियात काहे हो ‘‘ लाठी टेकता जीतन बाहर आया।
‘‘ देखत नाहीं का …. केतना रोज पर धूप दिखत है। मालिक बोलाबत है—- घास दिखत है। मालिक बोलाबत है… घास फूस निकलाय के हो झंडा के तैयारी करैबै‘‘
चला तू हम अभी आवत है..
झंडा की तैयारी की बात सुनती ही जीतन का रोम-रोम जागृत हो जाता। उसका स्वप्न आंखों से निकलकर सामने खड़ा हो जाता। क्रांतिकारी कह गए थे।
घर घर में झंडा लगेगा जीतन की झोपड़ी में भी।
एक ख्वाहिश दे गए थे क्रांतिकारी
हमहूं झंडा फराइब एक रोज
आजाद हुआ था देश। वह पंद्रह अगस्त आज तक नहीं भूला जीतन। मुखियाजी के हाते को उसी ने साफ किया था। बरसाती घास नोचकर एकदम साफ- सुथरा गोबर से लीपकर मानो आंगन में सतनारायण कथा हो। कितनी खुशी छाई थी उसके गांव में। अब किसी झोपड़ी से किसी के बच्चे को गोरे सिपाही घसीटकर नहीं ले जाएंगे। कालापानी की सजा खतम। लकदक कुरता पहने मुखियाजी अखबार जोर जोर से पढ़ रहे थे
अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, नेहरूजी ने लाल किले पर झंडा फहराया
कडुआ तेल में छना बुंदिया- गुड़ की चाशनी से लिपटा— बड़ी सी डेगची में था। सखुआ के पत्ते पर एक एक कलछुल सबको बंटा। पंद्रह अगस्त की वह सौंधी खुशबू आज भी जीतन के नथुने में है। एक कोने में जमीन पर सिकुड़कर बैठा जीतन उड़ते तिरंगे को घंटों देखता रहा था। वही बात कौंघी
हमहंू झंडा फराइब मानों जीवन की शेष इच्छाएं इसी एक बात में समाहित थीं।
कई अगस्त बीते—कई छब्बीस जनवरी बीती- कई मुखिया आए गए। जीतन मुखिया का हाता साफ करता रहा। झंडा फहरता रहा। तिरंगे से पटे अखबारों के पन्ने उलट पुलट कर देखता जीतन। उन लड़कों की याद आती। मरने पर भी उनकी आंखे खुली थी। यही तिरंगा उन खुली आंखों में छया सा था।
जीतन भगवान से कहता-
हमर ई झोपड़ी धन्न है- जइसन सबरी के कुटिया एही दुख रहें कि तरकारी नाहीं रहे घर में छुच्छे चटनी भात खाय के उ बहादुर चैल गेलक
का परान देवे के उमिर रहे
हम त झंडा फराइ के रहब
बूढा हो गया जीतन। मुश्किल से गुजारा होता। कमर झुक गई- आधी झोपडी ढह चुकी है। अकेला पड़ा रहता है मगर सपना और झंडा फहराने की ख्वाहिश ज्यों का त्यों इस बार कुछ सोचता विचारता जीतन मुखियाजी के घर चला। दालान में ही वे बैठे थे।
‘‘ परनाम मालिक- कवनो चिंता नाहीं- सब साफ होई जाई ‘‘
‘‘ आठे दिन बचले है पंद्रह अगस्त में-अब तुमरा देह भी नहीं चलता जितना- आजे से लग जाओं‘‘
मुखिया का हुकुम था। चुपचाप खड़ा रहा जीतन।
‘‘ अरे ,खड़ा काहे हो-काम शुरू काहे नहीं करते‘‘
‘‘ एक ठो बात रहल मालिक‘‘ – हाथ जोड़े जीतन ने कहा।
‘‘ क्या बात है बोलो‘‘
‘‘ अबकी हमहू झंडा फराइब‘‘
मुखियाजी हंस पडेÞ।
‘‘ तुम झंडा फहराएगा,सनक गया का जितना ‘‘
‘‘ एगो बिनती रहल- एगो झंडा हमके लान द मालिक,, जिनगी भर मजूरी करबैं-मुफत।
सच्चे पगलाय गए हो,, जितनवा जन मन गन आता है?
‘‘ हां हजूर- हर साल एहीं पर सुनत-सुनत रटाय गेल है- सुनाय का?‘‘
अब काम करो चुपचाप-खिसिया गया मुखिया।
जीतन सोचता, पगलाए का बात है- आजाद माने आजाद-का ई ओकर देश नाहीं? झंडा का लजाइ जाई ओकर झोपड़ियां में। अपन माटी से का कम परेम हमरा हई। हर रोज जाता जीतन मुखियाजी का हाता साफ करने। हर दिन एक ही जिद – एगों झंडा हमरा लाई द मालिक।
इस बार मानने वाला नहीं जीतन
सौ रुपया से कम में नहीं मिलता झंडा। कहां से दोगे इतना पैसा? तंग हो गया मुखिया
हमर जिनगी लिख लेहूं मालिक- गुलाम बना लेहंंू- एको-पइसा नाहीं लेब-बस एगो झंडा— घिघियाकर जीतन कहता गौर से देखा मुखिया ने जीतन को। पागलपन या सनक नहीं थी। शायद लम्बे समया की साधना की पूर्णहुति थी।
अगले दिन मुखियाजी शहर गए।
सरकारी पाठशाला के लिए झंडा लाना था। कागज के झंडे बिक रहे थे-दो चार खरीदा और जीतन के हाथ में धरा दिया।
ई तो कागज का है मालिक-फहरी कैसे?
यहीं मिला जितना- अब जिरह मत करना।
जीतन ने एक सवाल दागा-
ई बताऊं मालिक-ई सरकार मुफत में साइकिल बांटत है- बस्ता- किताब खाना सब बांटत है। कभी मुफत में तिरंगा काहे न बांटै ई सरकार?
बस चार दिन बचे आखित नहीं मिला तिरंगा जीतन को। मगर झंडा तो वह फहराएगा जरूर फहराएगा। अंधेरा होते होते लौट गया जीतन। भारी फिकर-कैसे जुगाड़ हो तिरंगे का जजतन की झोपड़ी पर माटी का कलेबर चढ़ रहा था। बरसाती घास उखड चुकी थी। झुकी कमर-मुश्किल से हाथ उठता मगर पवित्र अनुष्ठान था यह। तिरंगा लगाना है। खुरपी से खुरच खुरच कर जमी काई हटाता माटी से लीपता। घरवाली की बडी याद आई इन दिनों। दीवाली में वही अपनी उंगलियो से रेखाएं बनाती हुई दीवार पर रखती बनाती हुई दीवार लीपती। करंज तेल के दो दिये जलाकर दरवाजे पर रखती। लक्ष्मीजी का मार्ग दिखाने। तेल थोड़ा होता था- दिये बुझ जाते। दिखाने। तेल थोडा होता था दिये बुझ जाते। लक्ष्मीजी को जीतन की झोपड़ी का मार्ग नहीं दिख पाता-फिर अंधेरा।
लकड़ी का बक्सा खोला जीतन ने। नयी धोती थीं- सुभाष का चित्र लपेट रखा था। झोले में धोती डाल चल पड़ा। सुलेमिान दर्जी था गांव में। धोती की पट्टियां जंगल जैसा उगा था। तोड़कर लाया सिल पर पीसा। पुदीने पर माथे का पसीना टपकना रहा। अपने गमछे में रख निचोड़ा। ऊपर से आधी टूटी बल्टी थी। उसी में रस निकाला। हरा रंग निकल आया था।कुछ पट्टियों को डुबोकर छोड़ दिया।
अब लाल रंग चाहिए। जंगल में टेसू के गाछ भरे थे। न जाने कब के झरे फूल-गले से मिट्टी मे लिपटे पडें थे। टोकरी भर ले आया। चूल्हे पर खौलने को चढ़ा दिया। खुश हो गया। लाल रंग छोड़ रहे थे टेसू7 उसी में कुछ पट्टियां रंगी गई। धूप में वैसे ही बैठकर सुखाया जैसे छठ पर्व में व्रतियां गेहंू सुखाती हैं। कौआ न बैठ जाए। अगले दिन सूखी पट्टियां लेकर पहुंचा मुखियाजी के पास।
मालिक ई रंग तिरंगे के हवै न
ई कहां से लायाा जितनावा-हरा तो टीके है- पर लाल तो नहीं है झंडा में। केसरिया होता है- देख नहीं है का कभी।
मुश्किल में जीतन। केसरिया रंग कैसे बने। सर पकड़कर वही बैठ गया। हरवाहा हंस रहा था।
‘‘ काहे परान दे रहा जितना, कौने नसा खाए हो का? ‘‘
उसकी परेशानी मुखिया के लिए कोई मायने नहीं रखती। पंद्रह अगस्त के को झंडा पहराना मुखिया के लिए ड्यूटी थी, जीतन के लिए जुनून। जीवन की आखिरी इच्छा। चिर प्रतीक्षित अभिलाषा।
अचानक जीतन को याद आया। राशन में मारकीन का कपड़ा मिलता था। उसकी घरवाली ने टेसू के फूल के साथ हल्दी उबालकर केसरिया रंग बनाया था। मारकीन रंगा था। उसी का कुरता बनावाकर जीतन बेटे की बारात गया था। लपककर घर लौटा। फिर से टेसू के फूल खौलाये गये, हल्दी डालकर। केसरिया पट्टी तैयार थी। सफेद पट्टियां बची थी।
एक थाली थी। जीतन की घरवाली उसी में भगवान को प्रसाद चढ़ाती थी।
काठ के बक्से से थाली निकाला। सफेद पट्टी के बीच में रख गोला बनाया। बनिये की दुकान से छोटी सी नील की डिबिया खरीद लाया। चाकू से सूखी टहनी को नुकीला बनाया। नील के गाढ़े घोल मे टहनी की कलम डूबोकर चक्र तैयार। गिनकर चौबीस रेखाएं।
तैयार था जीतन का तिरंगा। मन इतना आह्लादित कभी न था। एक बड़ा और दो तीन छोटे तिरंगे बन गये। सुलेमान दर्जी ने रहम किया था। पैसे भी नहीं लिये तिरंगे सिलने के। जीतन सोचता- मुखिया से तो अपना सुलेमान भा। अब बांस चाहिए।
संकीर्ण सी नदी बहती थी गांव में। उस पार बंसवारी थी। कुल्हाड़ी लेकर चल पड़ा, नंगे पांव। कई बार ठेस लगी- नजरों में तिरंगा था, कुछ और सूझे कैसे? अंगूठे का नाखून उखड़ गया। रक्त बहता रहा। नदी के पानी में घुलता रहा। उस पार पहुंचा। एख बांस काटा, लेकर जैसे ही चला किसी ने जोर से पीठ पर मारा।
‘‘ चोरी करते हो, यह हमारा बांस है। ‘‘
‘‘ नाही बाबू हम चोर नाही। झंडा फरावै का है। हमरा कुल्हाड़ी लई लो बदला में। ‘‘
उस आदमी ने तपाक से कुल्हाड़ी रख लिया। बांस घसीटता हुआ जीतन नदी पार कर रहा था।
तिरंगा फहराने के लिए जीतन की झोपड़ी तैयार थी। आम के पत्ते सुतली में बांधकर बंदनवार लटक रहे थे। ईंटे जोड़कर चबूतरा बना। पुटूस के फूल बिखेर दिए गए। गांव के कुछ बच्चों को न्योता दे आया था जीतन। कहा था उन्हें मिठाई देगा। झंडा भी देगा। कागज का तिरंगा तो था उसके पास। कुछ रोज पहले ही हलवाई की छप्पर पर खपड़ा सजाया था। मजदूरी नहीं ली। बदले में थोड़ी सी बुंदिया बनाकर मांगा था।
पंद्रह अगस्त की सुबह। पिछली रात आंखों से नीद गायब। सुबह चार बजे से बैठा था। धरती माता को साष्टांग दंडवत किया। नहा धोकर तैयार। धुली हुई आधी धोती थी। लपेट लिया। कुरता था नहीं। सोचा – गांधी बाबा भी तो अइसने कपड़ा पहिनत रहै।
बांस में खुद का बनाया तिरंगा लगाया। कुछ और तिरंहे थे। कुछ रस्सी पर लटकाया। लाल रंग वाले तिरंगे को खम्भे में लपेट दिया। झोपड़ी तिरंगामय थी। सुभाष की तस्वीर थी। आटे की लई बनाकर गत्ते पर साटा। चबूतरे पर रख दिया। गेंदे की होगी छोटी सी माला- खुद का बनाया हुआ। नेताजी को पहनाया। एक दोनों में बुंदिया रखा- भारत माता का प्रसाद। अद्भूत अनुष्ठान था, अलौकिक वातावरण।
आकाश में लाली फूट रही थी। ज्योंहि सूरज की पहली किरणों ने उजाले का संदेश दिया। लहरा उठा जीतन का तिरंगा। गंभीर स्वर में जन मन गन का उदघोष हुआ। गांव में सबसे पहले तिरंगा जीतन की झोपड़ी में लहराया। जीतन ने पूरी ताकत लगाकर कहा- जयहिंद।
कमर झूकी थी पर जीतन अकड़ रहा था। सूरज का उजाला कुछ और अधिक चमकीला था। जीतन की देशभक्ति की चमक जो घुल थी। आखिर जीतन ने खुद झंडा फहरा ही दिया। हवा का एक झोंका उसे छूता हुआ निकल गया। जीतन को लगा – वे क्रांतिकारी लड़के उसी के आस पास उसी के साथ खड़े हैं।
वातावरण में एक फुसफुसाहट सी थी। क्रांतिकारियों की। मानों वे कह रहे हों- आजादी के बाद पहली बार फहरा असली तिरंगा।

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