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अपने गांव में भी रोजगार की तंगी झेल रहे मजदूर

अपने गांव में आने के बाद कोई काम नहीं था। भविष्य कैसा होगा, इस बारे में भी वे कुछ

सोचने और समझने की स्थिति में नहीं थे। किसी तरह भूख और बीमारी से जान बचाकर

भागे थे तो हाथ भी खाली थे। इस बार ऐसे प्रवासी मजदूरों को अपने ही गांव में बराबरी का

जीवन महसूस करने का नया अवसर प्राप्त हुआ। वरना इससे पहले जब वे अपने काम से

गांव लौटते थे तो उनकी जेब में पैसे की गर्मी होती थी। ऐसे में उनका आचरण भी काफी

अलग हुआ करता था। इस बार की स्थिति पूरे झारखंड में एक जैसी है। लेकिन इसका

सबसे बेहतर फायदा यह हुआ है कि काम करने वालों के अभाव में जो जमीनें बंजर रह

जाती थी, उनमें से अधिकांश में कुछ न कुछ फसल रोपी गयी है। तय है कि इस बार

झारखंड की कुल कृषि उपज पहले से काफी अधिक होगी। कुल कृषि उपज इसलिए कि

धान की खेती के अलावा भी प्रवासी मजदूरों ने अपने गांव में दूसरी फसल भी बोयी है।

लेकिन अब फिर से उनके सामने एक दूसरी समस्या मुह बाये खड़ी है। गांव- देहात में दूसरे

कारणों से बालू के उठाव और परिवहन पर पुलिस की रोक है। खास कर अगर रांची के

ग्रामीण इलाकों की बात करें तो यही स्थिति है। अब बालू अथवा कोयला का खनन अगर

पुलिस को ही रोकना है तो खनन विभाग के अधिकारी क्या करेंगे, यह स्पष्ट नहीं है।

अपने गांव में बालू पर अंकुश भी बेरोजगार का कारण बना

जाहिर है कि बालू के कारोबार पर अंकुश के दूसरे कारण भी हो सकते हैं, जिसकी बाजार

हाट में चर्चा होने लगी है। लेकिन परेशानी इस बात की है कि अपने ही गांव में काम कर रहे

मनरेगा और अन्य कार्यों के मजदूर इससे बेरोजगार हो गये हैं। दूर दराज के इलाको में जो

भी विकास कार्य चल रहे थे, उनमें से अधिकांश बरसात की वजह से बंद थे और जो चल रहे

उनपर भी बालू का संकट है। ऐसे में अपने और अपने परिवार का पेट पालने की मजबूरी में

ऐसे मजदूरों को फिर से महानगरों अथवा दूसरे राज्यों की तरफ लौट जाना पड़ेगा। देश के

कई महानगरों में यह प्रक्रिया चालू भी हो गयी है। वेतन या दिहाड़ी कोई भी नाम दें अब

पहले की तुलना में आधा हो चुकी है। खर्च बढ़ गया है, इस संतुलन को साधने के उपाय

क्या हो ? यह प्रवासी मजदूरों से ज्यादा शहर में स्थायी रूप से बसे और प्रवासी मजदूरों को

निरंतर काम उपलब्ध कराने वाले समाज के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है ।

सरकार की योजनायें बड़े लोगों तक सीमित है, सबसे ज्यादा बुरा हाल शहरों में बसे

मध्यम वर्ग का है। शहरों में आनेवाले ग्रामीण प्रवासी अक्सर खराब रिहायशी इलाकों में,

अमूमन मलिन बस्तियों में रहते हैं, जहां जीवनयापन की तमाम दुश्वारियां होती हैं।

शहरों में भी ऐसे लोग पेट की मजबूरी में ही रहते हैं

ऐसी जगहों पर मूलभूत सुविधाओं से जुड़े सार्वजनिक ढांचे का बड़ा अभाव होता है। इन

दिनों खराब आवास के लिए भी प्रवासियों को अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा व्यय करना

होता है। उन्हें होने वाली आमदनी आवासीय खर्च को पूरा करने के लिए अपर्याप्त होती है,

इससे अन्य खर्चों और बचत के लिए गुंजाइश कम होती जा रही है। गांवों से पलायन कर

शहरों में पहुंचे अकुशल लोग इतनी कमाई नहीं कर पाते कि उनका जीवन स्तर सामान्य

शहरी तक पहुँच सके। ऐसे लोग खराब आवासीय इलाकों या मलिन बस्तियों में इसलिए

रहना स्वीकार करते हैं, ताकि वे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ बचत कर सकें। इसी

बचत की वजह से अपने गांव में उनकी आर्थिक हैसियत पहले अच्छी हुआ करती थी।

लेकिन जीवन से जुड़ी मूलभूत सुविधाओं में निवेश करने की सरकार की अक्षमता, इन

परिवारों की मुश्किलों का कारण बनती है। ऐसे परिवारों के बच्चे स्कूलों में रहने की बजाय

अक्सर गलियों और सड़कों पर सामान बेचते, भीख मांगते हुए दिखते हैं ।कई बच्चे तो

आपराधिक कार्यों में भी संलिप्त हो जाते हैं। दूसरी तरफ शहरी क्षेत्रों में प्रवासी लोगों का

भविष्य कुशल अकुशल लोगों की आय में निरंतर वृद्धि पर टिका है। अर्ध कुशल लोगो के

सौपे कार्यों से ऑटोमेशन नहीं हो सकता। ऐसी दशा में इन क्षेत्र में रोजगार की मांग बनी

रहेगी, लेकिन जीवनयापन के लिए इन क्षेत्रों में काम करनेवालों को पर्याप्त तनख्वाह नहीं

मिल सकेगी।

गांवों से शहर के पलायन की स्थिति को बदलना ही होगा

और हमेशा पलायन कर शहरी क्षेत्रों में पहुंचनेवाले ज्यादातर प्रवासी इसी कार्यक्षेत्र के

दायरे में होंगे। अपने गांव में कम पैसे का भी रोजगार अगर अपने और अपने परिवार का

पेट पालने के लिए पर्याप्त होता तो यहां की स्वच्छंद हवा और वातावरण को छोड़कर यह

लोग शहर के बदबूदार और घुटनभरी जिंदगी में नहीं लौटते। इस बार की खेती का

परिणाम जब सामने आयेगा तो यह बहुतों को फिर से खेती की तरफ लौट जाने को प्रेरित

करेगा। लेकिन इस बीच जो हालत है, उससे अपने गांव में खुद को बेसहारा महसूस करते

मजदूरों को लिए राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए।


 

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