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यूरोपीय स्पेस एजेंसी के यान ने 77 मिलियन किलोमीटर से भेजी तस्वीर

सूरज को सबसे करीब से देखिए पहली बार

  • तस्वीर का एक बिंदू चार सौ किलोमीटर का इलाका

  • छोटी लपटों से विकिरण और ताप को आंका जा रहा

  • आगे बढ़कर बुध की कक्षा से भी गुजरेगा यह यान

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः यूरोपीय स्पेस एजेंसी के अंतरिक्ष यान ने अपने अभियान के तहत सूर्य के

सबसे करीब पहुंचने में सफलता पायी है। वहां से यान के कैमरों से सूरज की जो तस्वीरें

भेजी हैं, वह अपने आप में अद्भूत हैं। पहली बार इतने करीब से सूरज को देखने का अवसर

लोगों को प्राप्त हो रहा है। यूरोपीय स्पेस एजेंसी के यान सोलो को इसी साल के प्रारंभ में

भेजा गया था।

अब वहां से सूर्य को करीब से देखते हुए वैज्ञानिक उसके कई घटनाक्रमों का विश्लेषण भी

कर रहे हैं। इन घटनाक्रमों को इससे पहले कभी शोधकर्ताओं ने अपनी आंखों से नहीं देखा

था। वैसे भी सूर्य के इतने करीब किसी इंसान अथवा जीवित प्राणी का जाना संभव भी नहीं

है। इतने करीब में जो सूर्य की तपिश हैं, वह किसी भी ऐसे प्राणी को क्षण भर में राख में

बदल सकती है। खास तौर पर तैयार किये गये इस यान में सूर्य के इस ताप को झेलने की

क्षमता है। इसी वजह से उसमें लगाये गये खास किस्म के कैमरे भी सही तरीके से काम

कर रहे हैं।

फिलहाल तो सूर्य में लॉक डाउन की स्थिति चल रही है। इस दौरान सूर्य की गर्मी बहुत कम

हो जाती है और उसकी तपिश कम होने की वजह से सीधे पृथ्वी पर इसका असर पड़ता है ।

सूर्य के तापमान और उसके आस पास के माहौल को समझने में जुटे वैज्ञानिक पहले से ही

इस बात को जान रहे हैं। लेकिन इस बार कैमरे वहां की सतह से छोटी छोटी लपटें उठती

हुई दिखाई दे रही हैं। दरअसल यह क्या हैं, उसे वैज्ञानिक समझना चाहते हैं। दरअसल यह

क्षुद्राकार लपटें क्यों उठ रही हैं इसे खगोल वैज्ञानिक समझना चाहते हैं।

यूरोपीय स्पेस एजेंसी के आंकड़ों से सूरज पर शोध आगे बढ़ा

यह पता चला है कि दरअसल सूर्य की सतह का तापमान अपेक्षाकृत कम यानी करीब साढ़े

पांच हजार डिग्री तक होता है लेकिन उसका वातावरण कई लाख डिग्री तापमान का होता

है। सूर्य के बाहर भी वहां होने वाले प्लाज्मा विस्फोट की वजह से यह तापमान काफी

अधिक बना रहता है। सूरज के केंद्र यानी कोरोना की गतिविधियों को समझने के बाद सूर्य

में लगातार गर्मी पैदा होने के बारे में कई अन्य कारणों का खुलासा हो सकता है। इस बीच

यान द्वारा उपलब्ध कराये गये चित्रों के आधार पर पृथ्वी पर स्थापित खगोल दूरबीन से

भी इन तमाम गतिविधियों का जांचा जा रहा है।

जिन क्षुद्र लपटों ने वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट किया है, वे चित्र में काफी छोटे नजर आने

के बाद भी काफी अधिक दायरा वाले हैं। दरअसल सूर्य की इन तस्वीरों का एक बिंदू ही चार

सौ किलोमीटर का है। इससे समझा जा सकता है कि जिन क्षुद्र इलाकों से लपटें उठती

दिख रही हैं, उनका वास्तविक आकार भी यूरोप के कई देशों से बड़ा ही होगा। दरअसल

यूरोपीय स्पेस एजेंसी के इस अभियान का महत्व कोरोना काल में और भी अधिक समझा

जा रहा है क्योंकि यह माना गया है कि इस किस्म के संकट के दौर में संपर्क कायम रख

पाना भी एक बड़ी आवश्यकता है। सूर्य की किरणों की वजह से अंतरिक्ष में स्थापित

सैटेलाइटों का संपर्क भी बाधित होता है।

सौर आंधियों को भी बेहतर समझना चाहते हैं वैज्ञानिक

यूरोपीय स्पेस एजेंसी का यान अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत सूर्य के कई चक्कर

लगाते हुए और करीब जाएगा। जो तय कार्यक्रम हैं, उसके मुताबिक यह यान सूर्य के 43

मिलियन किलोमीटर की दूरी तक जाएगा। इस दूरी तक पहुंचने के लिए यह यान जिस

रास्ते पर आगे बढ़ रहा है उसमें यह बुध ग्रह की कक्षा से भी गुजरेगा। लिहाजा इस दौरान

बुध ग्रह के बारे में भी वैज्ञानिकों को नई जानकारी मिलने की पूरी उम्मीद है। वैसे इस शोध

के बारे में यूरोपीय स्पेस एजेंसी के अभियान प्रमुख मार्क मैक्गरोन ने कहा कि इस यान

को सिर्फ बेहतरीन तस्वीर खींचने के लिए नहीं भेजा गया है। इसके जिम्मे दूसरे महत्वपूर्ण

काम में है। खास तौर इस यान के माध्यम से वैज्ञानिक वहां की सौर आंधियों का आंकड़ा

एकत्रित करना चाहते हैं, जिनके आधार पर सैटेलाइट संपर्क को और बेहतर और सुरक्षित

बनाया जा सके।


 

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