रोजगार परक शिक्षा की वर्तमान समय की जरूरत

रोजगार देने वाली शिक्षा चाहिए
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रोजगार को शिक्षा से जोड़ना देश की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है।



इस लिहाज से झारखंड के मुख्यमंत्री ने अगर शिक्षा के स्तर में सुधार की बात कही है तो यह जायज है।

उन्होंने कहा है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो रोजगार उपलब्ध करा सके।

वर्तमान में रोजगार के लिए ही बच्चे स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ते हैं।

लेकिन उस पढ़ाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा बाद में उनके जीवन में शायद ही कभी काम आता है।

इसलिए वर्तमान दौर में प्रायोगिक और रोजगारमूलक शिक्षा पर विकसित देश भी ध्यान दे रहे हैं।

इसलिए मुख्यमंत्री रघुवर दास अगर अपने राज्य में इसी पद्धति को आगे बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं तो यह अच्छी पहल है।

हमें इस बात को अत्यधिक गंभीरता के साथ समझना चाहिए कि

देश की आबादी जिस अनुपात में बढ़ रही है, उस अनुपात में रोजगार सृजन नहीं हो पा रहे हैं।

आज से पचास वर्ष पूर्व ऐसी स्थिति नहीं थी।

उस दौर में सामान्य स्रातक की शिक्षा पाने वाला किसी भी सरकार अथवा अर्धसरकारी कार्यालय में नौकरी पा लेता था।

इसके अलावा स्थानीय स्तर पर रेलवे, एचइसी, एजी आॅफिस जैसे कार्यालयों में भी निरंतर रोजगार के अवसर पैदा हो रहे थे।

वर्तमान में यह सब कुछ खत्म हो चुका है।

इसलिए सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए पढ़ाई करने की प्रवृत्ति को भी पढ़ाई के माध्यम से ही समाप्त किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने यह सही कहा है कि अब दुनिया और रोजगार के तौर तरीके भी बदल चुके हैं।

अब सिर्फ पढ़ाई अथवा किताबी ज्ञान से ज्यादा अवसर नहीं मिल सकते।

लिहाजा जिन तकनीकों का इस्तेमाल आम आदमी तक पहुंच बनाने में किया जा रहा है, वहां रोजगार के नये अवसर पैदा हो रहे हैं।

यह जरूरत आगे भी बनी रहेगी क्योंकि लोगों में आधुनिक तकनीक अत्यधिक लोकप्रिय हुआ है

और यह धीरे धीरे आम दैनंदिन जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है।

श्री दास ने सही कहा है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विजन जरूरी है।

शिक्षा ऐसी हो जो रोजगार दे सके। केवल डिग्री से काम नहीं चलेगा।

रोजगार के अवसर पैदा करने लायक शिक्षा चाहिए

शिक्षा स्तर में गिरावट के कारण समाज में व्यभिचार, अनैतिकता बढ़ती है।

हम ऐसी नैतिक शिक्षा पर जोर दे रहे हैं, जो संस्कार के साथ रोजगारपरक भी हो।

उन्होंने कहा कि झारखंड को हमें शिक्षित प्रदेशों की सूची में लाना है।

शिक्षित होने से हम राज्य को तेजी से आगे ले जा सकेंगे।

वर्तमान में अगर हम राष्ट्रीय बेरोजगारी के आंकड़ों पर नजर डालते हैं

तो पता चलता है कि पूरे देश में करीब एकतीस करोड़ बेरोजगार हैं और यह संख्या नये रोजगार सृजन के बाद भी निरंतर बढ़ रही है।

झारखंड में पिछले फरवरी तक के आंकड़ों के मुताबिक बेरोजगार का प्रतिशत 7.2 था।

वैसे यह आंकड़ा सबसे अधिक त्रिपुरा में हैं, जहां 30.3 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं।

दिल्ली और उत्तराखंड में यह प्रतिशत क्रमश: 1.5 और 1.2 ही है।

इसलिए हम समझ सकते हैं कि सामान्य शिक्षा की बदौलत हम इस चुनौती का मुकाबला कतई नहीं कर सकते।

रोजगार के लिए वह ज्ञान चाहिए जो सिर्फ किताबी ना हो

हमें रोजगार उपलब्ध कराने लायक वह ज्ञान चाहिए जो सिर्फ किताबी नहीं हो

और हमारे जीवन में बाद में भी काम आये क्योंकि अब समय की मांग ही कुछ और है।

राष्ट्रीय औसत की बात करें तो यह आंकड़ा पिछले वर्ष जुलाई में सबसे कम 4.21 प्रतिशत का था।

लेकिन अब उसमें फिर से बढ़ोत्तरी होने लगी है और फरवरी 2018 में यह बढ़कर 6.06 तक पहुंच गया था।

यह सही है कि हाल के दिनों में राज्य की शिक्षा व्यवस्था में आधारभूत संरचनाओं का अच्छा विकास हुआ है।

इससे स्कूलों में उपस्थिति भी बेहतर होने लगी है।

इस स्थिति का लाभ उठाते हुए भावी नागरिकों को रोजगारपरक शिक्षा देने के लिए सक्रिय पहल होनी ही चाहिए।

पहले जहां राज्य के 38 हजार स्कूलों में से मात्र 7000 स्कूलों में ही बेंच-डेस्क उपलब्ध था, ज्यादातर स्कूलों में बिजली आदि की सुविधा नहीं थी।

इस स्थिति में काफी कुछ सुधार हुआ है तो उसके परिणाम भी मिलने लगे हैं।

ऐसे में सामान्य किताबी ज्ञान के अलावा भी पढ़ने वालों को अतिरिक्त कुशलता देने की आवश्यकता है

ताकि वे सिर्फ अपने किताबी ज्ञान की बदौलत रोजगार पाने के भरोसे नहीं रहें बल्कि अतिरिक्त कुशलता की बदौलत अपना काम भी कर सकें।

इससे राष्ट्रीय उत्पादकता में हम वह बढ़ोत्तरी हासिल कर पायेंगे, जिसकी भावी पीढ़ी को जरूरत भी है।

इसी रास्ते से हम सबसे युवा देश बनने के दौर में सबसे अधिक आर्थिक प्रगति भी हासिल कर सकेंगे।

इसलिए अब शिक्षा में वैसे तमाम गुणों का समावेश होना चाहिए जो किसी भी बच्चे को अपने आत्मविश्वास के साथ रोजगार पाने में मदद कर सके।

इसके लिए उन्हें स्कूल से बाहर कहीं और झांकने की जरूरत भी नहीं हो।

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