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पहले स्वयंसेवक को दिया गया ब्रिटेन का परीक्षण वैक्सिन

  • शोधकर्ताओं को 80 फीसद सफलता की उम्मीद

  • जेनेटिक संशोधन से वायरस को वैक्सिन बनाया

  • एलिसा ग्रांटो हैं परीक्षण की प्रथम स्वयंसेवक

  • पहले दौर में आठ सौ लोगों पर अनुसंधान

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पहले स्वयंसेवक कोरोना वैक्सिन परीक्षण के तौर पर एलिसा ग्रांटो को जाना

जाएगा। वह ब्रिटेन की पहली महिला है, जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित

वैक्सिन दिया गया है। इसके साथ ही ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का वैक्सिन परीक्षण के

मानव परीक्षण का दौर भी प्रारंभ हो चुका है। इसके बारे में पहले से ही काफी कुछ बताया

गया था। खुद ब्रिटिश सरकार भी इसकी तैयारियों के साथ प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ी हुई है। अब

इंसानों पर उसका परीक्षण होते ही इस वैक्सिन परीक्षण में ब्रिटेन दूसरों से आगे निकल

गया है। इस प्रथम दौर के परीक्षण के लिए आठ सौ स्वयंसेवकों को तैयार किया गया है।

परीक्षण के क्लीनिकल ट्रायल का अंतिम दौर पूरा होने तक कुल पचास हजार लोगों पर

इसका परीक्षण किया जाएगा। सब कुछ सही होते तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस

वैक्सिन को मान्यता दिये जाते ही इसका व्यापारिक उत्पादन भी प्रारंभ कर दिया जाएगा।

शोध वैज्ञानिकों ने पहले ही इस परीक्षण के बारे में सब कुछ साफ साफ बता रखा है। यह

दरअसल एक वायरल वैक्टर वैक्सिन है, जिसे वायरस से ही तैयार किया गया है। लेकिन

वायरस को खास विधि के तहत परिष्कृत किया गया है तथा उसे खास जिम्मेदार निभाने

के लिए संशोधित किया गया है। वैज्ञानिकों को अब तक की रिपोर्ट के मुताबिक इसके 80

फीसद सफल होने की उम्मीद है। वैसे शोध दल ने पहले ही यह भी बता दिया है कि

स्वयंसेवकों में से कुछ को ही इस वैक्सिन का डोज दिया जाएगा। लेकिन स्वयंसेवकों को

इसकी जानकारी नहीं दी जाएगी। डाक्टरों को यह पता होगा कि किस स्वयंसेवक को कौन

सा वैक्सिन दिया गया है। उसके बाद मरीजों की स्थिति का निरंतर परीक्षण किया जाता

रहेगा।

पहले स्वयंसेवक के पीछे लगी है लोगों की कतार

इस वैक्सिन परीक्षण में शामिल होने वाली प्रथम

महिला स्वयंसेवक एलिसा ग्रांटों खुद एक वैज्ञानिक हैं।

इसलिए उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया के लिए जरूरी

इस काम में वह अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आयी

हैं। तीन महीने के अथक परिश्रम के बाद इस वैक्सिन को तैयार किया गया है। इसे बनाने

में वहां के जेनिफर इंस्टिटियूट की भूमिका रही है। खुद एलिसा मानती है कि उन्हें इस

परीक्षण वैक्सिन से काफी उम्मीदें हैं   क्योंकि वह इसके बारे में बहुत कुछ जानती हैं।

लेकिन खुद उन्होंने कहा कि अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के पहले तमाम आंकड़ों का

विश्लेषण और मरीजों पर  इसके प्रभावों का गहन अध्ययन करना जरूरी होगा। इसके

जरिए ही हम यह साबित कर पायेंगे कि यह वैक्सिन वाकई इंसानों पर काम करता है। यह

काम पूरा होने के बाद पूरी दुनिया तक यह वैक्सिन पहुंचाना दूसरो की जिम्मेदारी होगी।

जेनिफर इंस्टिटियूट की प्रोफसर साराह गिलबर्ट भी इस परीक्षण के प्रति उम्मीद लगाये

बैठी हैं। वह प्रारंभ से ही इसके साथ जुड़ी हुई हैं।

उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के खिलाफ इसकी कार्यकुशलता वैज्ञानिक तौर पर

प्रमाणित होने के बाद पूरी दुनिया को कोरोना से मुक्ति का नया मार्ग मिल जाएगा।

सामान्य वायरस मे जेनेटिक संशोधन किये गये हैं

परीक्षण प्रारंभ होने के बाद यह बताया गया है कि यह ठंड लगने वाले एक सामान्य

वायरस एडिनोवायरस से तैयार किया गया है। यह आम तौर पर चिपांजियों में पाया जाता

है। लेकिन इस वायरस में जेनेटिक संशोधन किये गये हैं ताकि यह इंसानों के लायक बन

सके। उल्लेखनीय है कि ऑक्सफोर्ड की टीम ने इसके पहले ही मार्स के लिए वैक्सिन

बनाया है। वैसे वैज्ञानिकों को इस बात की चिंत सता रही है कि अगर ब्रिटेन में कोरोना के

मरीजों की संख्या तेजी से कम होती है तो उनके लिए परीक्षण का आंकड़ा जुटाना कठिन

होगा। इस शोध समूह के निदेशक प्रोफ एंड्र्यू पोलर्ड ने कहा कि इसी वजह से पूरी टीम

अभी समय के साथ भी जंग लड़ रही है ताकि जल्द से जल्द पर्याप्त आंकड़े और विश्लेषण

डेटा हासिल किया जा सके। वैसे उन्हें उम्मीद है कि ब्रिटेन में अभी कोरोना के और मरीज

पाये जाएंगे। पहले चरण के बाद ही इंसानी परीक्षण का दूसरा चरण भी शीघ्र ही प्रारंभ

करने की तैयारियां भी होने लगी है।

इस बीच भारत में प्लाज्मा पद्धति से कोरोना के ईलाज की अनुमित जारी कर दी गयी है।

इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) ने पांच राज्यों को इसके परीक्षण

की अनुमति प्रदान कर दी है। जिन राज्यों में इसका प्रारंभिक परीक्षण होगा उनमें दिल्ली,

पंजाब, कर्नाटक, गुजरात और केरल है। इनमें से केरल ने सबसे पहले इस पद्धति से ईलाज

की अनुमति की मांग की थी। वैसे झारखंड में भी इस विधि से ईलाज के लिए तैयारियां हो

रही हैं लेकिन उसमें निजी अस्पतालों के हस्तक्षेप की वजह से अड़चनें आयी हैं।


 

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