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बिजली के मामले में दिल्ली और अन्य राज्यों का अंतर क्यों







बिजली के मामले में यह सार्वजनिक बहस और सरकारी सफाई का विषय है

कि जब दिल्ली में लोगों के बिजली बिल कम हो सकते हैं तो अन्य राज्यों में

ऐसा क्यों नहीं हो सकता है।

आम आदमी पार्टी की सरकार ने आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसे

दिल्ली में भी एक मुद्दा बनाया है।

लेकिन जो सवाल बिजली के मामले में दिल्ली से पूरे देश के सामने खड़े हो रहे

हैं, वे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इसपर गहन चिंतन की आवश्यकता है।

आखिर दिल्ली में लोगों के बिजली बिल कम क्यों आ रहे हैं।

इस बार तो बताया गया है कि वहां के 14 लाख घरों में बिजली का बिजली

शून्य आया है।

बिजली के मामले पर ही अस्तित्व में आयी थी यह पार्टी

हम यह नहीं भूल सकते कि अन्ना हजारे के आंदोलन से अलग होकर जब

अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी बना रहे थे तो इसी बिजली बिल के मुद्दे

पर उनका पहला आंदोलन प्रारंभ हुआ था।

अदालत के निर्देश पर बिजली कंपनियों के गहन ऑडिट का काम भले ही बंद

कर दिया गया लेकिन जनता के लिए यह मुद्दा आज भी उतना ही प्रासंगिक है,

जितना पहले थे। जिन बिजली कंपनियों के उस वक्त अरविंद केजरीवाल की

मांग से कंपनियों के बंद होने की आशंका जतायी थी, वे अब बिजली बिल के

शून्य आने के बाद भी चुप्पी साधे हुए हैं।

इससे और कुछ नहीं तो यह नतीजा तो अवश्य ही निकाला जा सकता है कि

बिजली कंपनियों ने दरअसल आंकड़ों के हेराफेरी कर जनता को अरबों का

चूना लगाया है।

इसलिए यह गोरखधंधा पूरे देश में नहीं चल रहा है, इस बारे में केंद्र और राज्य

सरकारों को सफाई देनी चाहिए।

सभी को इस बात का एहसास है कि शीघ्र ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने

जा रहे हैं।

इस चुनाव में दिल्ली के मुद्दों पर अगर प्रचार आगे बढ़ा तो निश्चित तौर पर

पूरे देश में यह संदेश फिर से फैलेगा कि आखिर दिल्ली में जो फायदा वहां की

गरीब जनता को वहां की सरकार दे सकती है, वही फायदा देश के अन्य राज्यों

की सरकारें क्यों नहीं दे पा रही हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनाव की घोषणा आगामी जनवरी माह में हो सकती है

और मतदान फरवरी में होने की खबरें आ रही है।

आम आदमी पार्टी की सरकार ने एक डाटा जारी किया है।

जिसके मुताबिक 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली योजना के पहले महीने में ही

14 लाख लोगों का बिजली बिल शून्य आया है।

दिल्ली में जो चीज सस्ती वह अन्य राज्यों मे मंहगी क्यों

दिल्ली सरकार का दावा है कि यह संख्या बिजली उपभोक्ताओं की कुल

संख्या का 28 प्रतिशत है।

सरकार के मुताबिक, अगले महीने से इसकी संख्या में और कमी आएगी

क्योंकि अब दिल्ली में मुख्यमंत्री किरायेदार बिजली मीटर योजना भी शुरू हो

चुकी है।

इससे किरायेदारों के अलग बिजली मीटर लगेंगे जो प्री-पेड होंगे।

दिल्ली के 14 लाख परिवारों को इस महीने जीरो बिल मिलने के बाद अब हर

परिवार अपनी खपत 200 यूनिट से कम करने की कोशिश कर रहा हैं।

जनता को मुफ्त बिजली का लाभ भी मिल रहा हैं और लोग अब बिजली भी

बचाने लगेंगे।

दिल्ली में कुल 5227857 बिजली उपभोक्ता हैं, जिनमें से सितंबर महीने में

1464270 उपभोक्ताओं का बिजली बिल शून्य आया है।

दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वाली तीनों कंपनियों ने अलग-अलग आंकड़े

जारी किए हैं।

गौरतलब है कि 1 अगस्त को सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्लीवालों के

लिए 200 यूनिट तक बिजली बिल मुफ्त करने का एलान किया था।

किरायेदारों के लिए भी अलग से प्री पेट मीटर की व्यवस्था

केजरीवाल के ऐलान के बाद दिल्ली में यह योजना तत्काल लागू हो गई थी।

अब मुफ्त बिजली और एक निर्धारित सीमा से ऊपर जाने पर अधिक मंहगी

बिजली के अंतर को कोई भी समझ सकता है।

लिहाजा वहां के लोग भी बिजली की फिजूलखर्ची से बच रहे हैं ताकि उनपर

अतिरिक्त बिजली खर्च का आर्थिक बोझ नहीं पड़े।

इससे बिजली की मितव्ययिता की आदत को भी बढ़ावा मिल रहा है,

जो अच्छी बात है।

लेकिन मूल सवाल यह है कि जब दिल्ली में ऐसा हो सकता है तो देश के अन्य

राज्यों में जनता को अधिक दर पर बिजली क्यों दी जा रही है।

बिजली के उत्पादन के तौर तरीके तो एक जैसे हैं फिर राज्यों के बिजली दरों में

इतना अंतर क्यों है।

इन तमाम तथ्यों से यह संदेह बढ़ता है कि दरअसल अपनी पार्टी को नींव

रखने के वक्त अरविंद केजरीवाल ने बिजली के मामले पर जो आरोप लगाये थे,

उनमें दम है और जनता को बिजली के नाम पर ठगने का धंधा पूरे देश में चल

रहा है।

निजी आपूर्तिकर्ता उत्पादन लागत और वितरण के खर्च को बढ़ाकर दिखा

रहे हैं। इसलिए अब नये सिरे से इस पर जांच और अंकेक्षण होना ही चाहिए।



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