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बिजली के आमद खर्च को भी समझकर फैसला करे सरकार

बिजली के मामले में लगातार इस राज्य से विभिन्न इलाकों से असंतोष के स्वर सुनाई पड़

रहे हैं। दरअसल दामोदर वैली कॉरपोरेशन द्वारा बकाया वसूली की मांग को लेकर इसकी

कटौती किये जाते ही पावर की कमी पूरे राज्य में महसूस की जा रही है। इस मुद्दे पर हेमंत

सोरेन भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने इस दिशा में त्वरित कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री की

पहले से सुलह का रास्ता निकला है और व्यवस्था पटरी पर लौट रही है। लेकिन इस एक

घटना से यह साबित हो गया है कि बिजली के मुद्दे पर राज्य में अब तक मूल समस्या के

निदान की दिशा में कोई सार्थक काम नहीं हो पाया है। अपुष्ट आंकड़ों के मुताबिक ऊर्जा

की खपत पर होने वाला खर्च ज्यादा है और उसके अनुपात में आमदनी कम है। मामले की

जानकारी होते ही मुख्यमंत्री ने सभी संबंधित पक्षों से अपनी पहल पर बात कर सुलह का

बीच का रास्ता निकाला है। ऊर्जा विभाग के अधिकारियों ने डीवीसी चेयरमैन ने बैठक की।

जिसका मुख्य मुद्दा डीवीसी की ओर से की जा रही बिजली कटौती रहा। ऊर्जा विभाग,

डीवीसी और जेबीवीएनएल के अधिकारी इस बैठक में शामिल हुए। इस दौरान कई बिंदुओं

पर सहमति बनी। वर्तमान में 4995 करेाड़ रुपये बकाया के कारण डीवीसी ने बिजली

कटौती आरंभ की है।

डीवीसी ने इसके लिए दो साल का समय दिया है। इन दो सालों में जेबीवीएनएल को यह

बकाया भुगतान करना है। हालांकि शुक्रवार को विभाग की ओर से 400 करोड़ रुपये

डीवीसी को दिये गये हैं।

बिजली के मामले में हेमंत की पहल सराहनीय

इस बैठक के बाद डीवीसी के अधिकारियों ने जेबीवीएनएल को जानकारी दी कि डीवीसी

प्रबंधन के साथ विचार कर बिजली व्यवस्था सामान्य की जायेगी। जेबीवीएनएल के

अधिकारियों से जानकारी मिली की डीवीसी की ओर से जल्द निर्णय लेने का आश्वासन

दिया गया है। संभवत आने वाले दिनों में बिजली व्यवस्था बहाल की जा सकती है। अब

इस समस्या की गहराई में जाने पर पता चलता है कि पूर्व सरकार की ओर से झारखंड

बिजली वितरण निगम लिमिटेड को उदय योजना के तहत 5534 करोड़ का अनुदान दिया

गया। साथ ही जेबीवीएनएल से उम्मीद की गयी कि अगले तीन साल के लिए अपने

राजस्व संग्रहण से ही क्रय की गयी बिजली का भुगतान जेबीवीएनएल करेगी। इस राशि से

4780 करोड़ रुपये डीवीसी को भुगतान किया गया। लेकिन इसके बाद जेबीवीएनएल न

राजस्व संग्रह को दुरुस्त कर सकी है और न ही बिजली देने वाली संस्थाओं को हर महीने

भुगतान कर पा रही है। जेबीवीएनएल को राजस्व, बिजली बिल वसूली से मिलता है।

पिछले पांच सालों से सरकार यह उम्मीद करती रही कि जेबीवीएनएल शत प्रतिशत

बिलिंग वसूल करे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। ऊर्जा मित्र और एजेंसियों के जरिये भी

जेबीवीएनएल ने बिजली बिल वूसली की शुरुआत की लेकिन अब भी इसमें सफल नहीं हो

पायी है। अधिकारियों की मानें तो हर महीने 60 प्रतिशत ही बिजली बिल वसूली की जाती

रही। लेकिन फरवरी में हुए जेबीवीएनएल महाप्रबंधक और अभियंताओं की समीक्षा बैठक

से कुछ और ही जानकारी मिलती है। इस बैठक में सभी सब डिवीजन से बिजली बिल

वसूले जाने की जानकारी मांगी गयी जिसमें किसी भी सब डिवीजन से 40 प्रतिशत से

अधिक बिल वसूली की बात सामने नहीं आयी। जेबीवीएनएल वर्तमान में प्रति महीने 500

करोड़ की बिजली अलग अलग संस्थानों से लेती है।

कितना आता है और कितना जाता है इसे समझ लेना जरूरी

जबकि बिजली बिल से इसे हर महीने 300 करोड़ तक ही राजस्व वसूली हो पाती है। ऐसे में

हर महीने लगभग 200 करोड़ का बकाया जेबीवीएनएल को अलग अलग बिजली देने वाली

संस्थाओं का रहता है। एक मोटी रकम जेबीवीएनएल के पास अन्य संस्थाओं का बकाया

है। वर्तमान सरकार ने श्वेत पत्र जारी करते हुए कहा कि जेबीवीएनएल की योजनाओं से

भविष्य में 7600 करोड़ या उससे अधिक नुकसान हो सकता है। इस स्थिति से स्पष्ट है कि

संकट भले ही अस्थायी तौर पर टल गया है लेकिन इसके स्थायी समाधान पर काम होना

शेष है। राज्य सरकार को चाहिए कि बिजली नियंत्रण के बदले वह बिजली उत्पादन पर

अपना ध्यान केंद्रित करें। वर्तमान तकनीक के आधार ऐसे उच्च क्षमता वाले ताप विद्युत

संयंत्रों की स्थापना यह सरकार चाहे तो कर सकती है। जो तकनीक उपलब्ध है उससे

कमसे कम राज्य में गर्मी के मौसम में होने वाली कमी को दूर करने के लिए औसतन ढाई

सौ मेगावाट क्षमता की दो इकाइयों को तो चालू किया ही जा सकता है। जब तक राज्य के

पास अपनी बिजली उत्पादन संयंत्र नहीं होगा हम इसी तरह राज्य का पैसा दूसरो को देते

रहेंगे और हमारे ही राज्य से उत्पादित कोयला दूसरे के घरों को रोशन करता रहेगा।


 

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