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चुनाव की गरमी में कोरोना की बारिश का असर क्या होगा




चुनावी चकल्लस

  • दलों के नये प्रतिबंधों से होगी भारी परेशानी

  • जनादेश के फैसले के केंद्र में किसान ही होंगे

  • फिरोजपुर का मसला भी कारगर नहीं रहा

  • पूर्व के सारे मुद्दे अब कारगर नहीं रहे हैं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः चुनाव की गरमी के बीच ही देश के लगभग सभी इलाकों में कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ने लगा है। चुनावी कार्यक्रमों के एलान के साथ ही चुनाव आयोग ने इसके लिए कोरोना गाइड लाइनों का पालन करने पर सख्ती की है। ऐसे में राजनीतिक दलों को निश्चित तौर पर परेशानी है क्योंकि वे इसके लिए अभ्यस्त नहीं थे।




डोर टू डोर प्रचार और वह भी सिर्फ पांच लोगों के साथ अनेक नेताओं के समीकरण ही बिगाड़ सकते हैं। ऊपर से जनसभाओं के आयोजन पर प्रतिबंध से माहौल बनाने की ताकत रखने वाले नेताओं की शक्ति भी इस चुनाव की गरमी में क्षीण होती नजर आ रही है।

वैसे इस सवाल का उत्तर भी शायद यह चुनाव ही दे पायेगा कि जिस चुनावी कार्यक्रम के एलान की उम्मीद 12 जनवरी के बाद थी, वह पहले कैसे कर दिया गया। इसके पीछे कौन से असली कारण थे, वह शायद बाद में स्पष्ट भी हो जाएंगे। इसके बीच ही बिहार में राजद के खेला होबे बयान से जो बेचैनी उभरी है, उसका भी असर उत्तरप्रदेश के चुनाव पर पड़ सकता है।

चुनाव की गरमी के बीच कोरोना प्रतिबंध भी

फिलहाल राजनीतिक दलों को इस कोरोना संक्रमण की वजह से अपनी पूर्व प्रचलित चुनावी रणनीति को बदलना पड़ रहा है। इसमें अचानक से बहुत कुछ बदला बदला सा नजर आने लगा है। बड़े नेताओं के चुनाव प्रचार से जो माहौल बनता था, उसकी उम्मीद कम हो गयी है।

दूसरे शब्दों में कहें तो छोटे बड़े सभी प्रत्याशियों के बीच का अंतर इस कोरोना गाइड लाइन ने कम कर दिया है। इसमें उत्तरप्रदेश का नाम सबसे ऊपर इसलिए भी है क्योंकि वहां का जनादेश का असर चुनावी गरमी को और बढ़ा सकता है और यह वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल मैच समझा जा रहा है।

अन्य राज्यों को लेकर खुद प्रधानमंत्री भी ज्यादा चिंतित नहीं होंगे क्योंकि उससे ज्यादा कुछ अंतर नहीं पड़ता है। दूसरी तरफ यूपी के मैदान में दूसरों से आगे चल रहे योगी आदित्यनाथ को बदली हुई परिस्थितियों में कितना फायदा मिल पायेगा, यह देखने वाली बात है।




चुनावी गरमी के बीच इस बात को लेकर भी सभी राजनीतिक दल चिंतित हैं कि वैक्सिन की शर्त को मतदान के साथ जोड़ने की वजह से भी उनके सारे पूर्व समीकरण बदल गये हैं। खास तौर पर यूपी में भी वैक्सिन का आंकड़ा बहुत अधिक संतोषजनक नहीं है।

ऐसे में अगर संक्रमण फिर से बढ़ता ही चला गया तो मतदान का प्रतिशत कम होने की आशंका से सभी परेशान है। दूसरी तरफ पंजाब का परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं है, यह लगभग साफ हो चुका है।

पंजाब का मामला तो लगभग साफ हो चुका है

कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने व्यक्तिगत प्रभाव से कुछेक सीटों पर जीत तो हासिल कर पायेंगे लेकिन शहरी इलाकों में भाजपा का प्रभाव कैसा होगा, यह तो चंडीगढ़ की जनता ने जता दिया है। चुनावी सर्वेक्षणों में इसके संकेत मिल चुके हैं। ऐसे में वहां के चुनाव की गरमी में आम आदमी पार्टी के अलावा अब किसानो का नया संगठन क्या गुल खिलायेगा, यह देखने वाली बात होगी।

वैसे यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा और चैनलों के एक वर्ग का फिरोजपुर के मामले में जो तर्क पेश कर रहा था, उसका प्रभाव नहीं पड़ा है। दूसरी तरफ केंद्रीय एजेंसियों की छापामारी का भी कोई राजनीतिक लाभ मिलता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

दरअसल भाजपा के पूर्व के चुनावी समीकरण इस बार कोरोना और सोशल मीडिया ने ध्वस्त कर दिया है। चुनाव की गरमी में यह सारे समीकरण कितने टिक पायेंगे और कितने पिघल जाएंगे, यह समय के परख का विषय है। चुनावी सर्वेक्षणों की रिपोर्ट आने के बाद अब चुनाव के कार्यक्रमों का एलान भी सोच समझकर किया जा चुका है।

पश्चिमी उत्तरप्रदेश में होने वाले पहले चरण के मतदान से भी बहुत कुछ साफ हो जाएगा। यानी कुल मिलाकर इस चुनाव की गरमी में पहली बार यह बात बार बार सामने आ रही है कि यह देश का पहला चुनाव होगा, जिसमें किसानों के तेवर सबसे अधिक प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे हैं।



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