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चुनाव की डुगडुगी बजने लगी है बिहार में बिगुल अभी बाकी है

  • आलाकमान के हुक्म का इंतजार कर रहे प्रत्याशी

  • चुनाव जीतने से पहले टिकट जीतने की मची होड़

रंजीत तिवारी
स्थानीय संपादक (राष्ट्रीय खबर बिहार)

पटनाः चुनाव की डुगडुगी बज रही है, बिगुल अभी बाकी है। हम बात कर रहे हैं बिहार

विधानसभा के आसन्न चुनाव की। अब आज-कल हो रहा है, जब बज जाएगा। बिगुल भी

बजने के लिए तैयार है, शायद उसे आलाकमान के हुक्म का इंतजार है। पिछले कुछ

महीनों में कोरोनो काल में हीं डुगडुगी बज उठी, साथ हीं राज्य भर के पूर्व चुनावों में जीते,

हारे और लड़ने की प्रबल इक्षा रखने वाले धुरंधरों ने राजधानी में बायोडाटा लिए एवं अपने

गुर्गों के साथ डेरा डाल दिया। पता नहीं कब पार्टियों के आलाकमान की कृपा बरस पड़े।

हालांकि चुनाव जीतने के लिए पहले टिकट को जीत लेना प्रथम जीत मानी जाती रही है।

हो भी क्यों नहीं, टिकट जीतते हीं 90 फीसदी जीत लोग मान लेते हैं, बाकी सिर्फ

सार्टिफिकेट मिलना रह जाता है। क्योंकि पार्टियां ब्रेनवाश करने के बाद युवाओं को

कार्यकर्ता नहीं गुलाम बना कर जयकारा लगाने के लिए गले में एक सुनहरा पट्टा पहले से

डाले हुए रहती है। इशारा मिलते हीं कार्यकर्ता के लिबास में छुपे हुए गुलाम हरकत में आते

हैं, और कर्णभेदी आवाज के साथ जयकारे लगाते हुए जनसैलाब में तब्दील हो जाते हैं। यह

देख ज्यादातर निष्पक्ष वोटरों को भी भीड़ के तरफ ढुलक जाना उचित लगता है।

मुंगेरीलाल के हसीन सपने सजाए जयकारे लगाने वाले यह कार्यकर्ता भी शायद अगली

चुनाव में अपनी नम्बर आने का इंतजार में लगते हैं। इसमें तो कई नेताजी का कृपापात्र

बनने के चक्कर में ऐसा करते हैं। इन्हें अच्छे-बुरे की पहचान नहीं होती पार्टी ने जिसे ठप्पा

लगा कर भेज दिया वहीं इनका सिरमौर हो जाता है। यहां एक सवाल है कि आप तो पार्टी

के हैं साहब लेकिन पार्टी आपकी कितनी है? शायद इसका सही जवाब जयकारे लगाने

वाली भीड़ नहीं दे पाती। इस सवाल से वे निरुत्तर हो जाते हैं।

चुनाव की डुगडुगी के बीच टिकट झपटना बड़ी बात

काफी मशक्कत व पार्टी आलाकमान को खुश करने के बाद टिकट जीत कर नेताजी क्षेत्र में

आते हैं, जहां पहले से तैयार जनसमूह उनकी सारी अयोग्यता को दरकिनार कर देती है।

फिर चहुंओर जाती, धर्म और पार्टी का बोलबाला हो जाता है। प्रत्येक एक दश को जोड़ता है

और एक बड़ी जनसैलाब उमड़ पड़ती है। उसमें से कुछ लोगों को बरगलाते हुए ये कहते हैं

कि पिछली बार पार्टी अमुक कारण से बहुत परेशान रही है, इसलिए कुछ काम नहीं हो

पाया। इस बार नेताजी सब कर देंगे। लेकिन इस बार भी वहीं होता है, जो आजादी के बाद

से लगातार होते आया है। कुल मिलाकर अनगिनत साल, बुरा हाल वाली बात चरितार्थ हुए

बगैर नहीं रह पाती।

चुनावों में जीत हासिल करने के लिए जनसरोकार से जुड़ी विकास कार्य की नहीं, बल्कि

टिकट जितने की कूवत पर निर्भर है। चुनाव जीताने के लिए तो लोग यहां बैठे हीं हैं। जिन्हें

अपने गांव, क्षेत्र, राज्य व देश से कोई लेना-देना नहीं, उन्हें पार्टी, जाती व धर्म में विश्वास

है। फिर यहीं जाती धर्म और पार्टी देखकर अयोग्य व्यक्ति को विधानसभा भेजने वाले

लोग बेहतर और विकास कार्यों का नहीं होने का रोना रोते हैं। इनकी भी हालात शिकारी के

जाल में फंस कर तड़पते उन कबूतरों जैसा है जो, जाल में फंसने के बाद बोलते हैं बहेलिया

आएगा, जाल बिछाएगा दाना डालेगा, जाल में फंसना मत।


 

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