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चुनावी आंकड़ों के गणित में महागठबंधन का पलड़ा भारी

  • भाजपा ने लगातार किया अपने प्रदर्शन में सुधार
  • निर्दलीय और अन्य का पलड़ा होता रहा कमजोर
  • सीमित इलाकों में आजसू की पकड़ मजबूत
  • रेस का काला घोड़ा झारखंड विकास मोर्चा
संवाददाता

रांचीः चुनावी आंकड़ों के गणित में इस बार महागठबंधन का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।

लेकिन यह शुद्ध तौर पर अंकगणित की बातें हैं। महागठबंधन में शामिल दलों के वोट का

अगर ट्रांसफर नहीं होता है तो इस गणित का वास्तव से कोई रिश्ता नहीं होगा। लेकिन

प्रदर्शन के आंकड़े यही दर्शाते हैं कि आजसू के अलग होने के भाजपा निश्चित तौर पर

परेशानी की स्थिति में है।

यह पहला मौका है जब आजसू के बिना भाजपा चुनाव मैदान में है। दूसरी तरफ झारखंड

विकास मोर्चा के पिछले आंकड़े इसे इस बार के रेस का काला घोड़ा भी साबित कर सकते

हैं। जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं पुराने आंकड़ों पर भावी संभावनाओं के पुल बांधने का काम

तेज होता जा रहा है।

चुनाव आंकड़ों का अंकगणित यही कहता है कि इस बार अगर वाकई कांग्रेस, झामुमो और

राजद एक साथ अपने सारे वोट एक तरफ रखने में सफल हुए तो उनका वोट प्रतिशत

भाजपा के अपने वोट प्रतिशत से निश्चित तौर पर ज्यादा हो जाएगा। लेकिन इन सभी

दलों के समर्थक और मतदाता अपने इलाके के महागठबंधन के प्रत्याशी को ही वोट देंगे,

इसकी कोई गारंटी भी नहीं है।

चुनावी आंकड़ों का असली चुनाव से कोई वास्ता नहीं

दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट है कि भाजपा ने अपने प्रदर्शन में लगातार सुधार किया है।

इसलिए लोकसभा चुनाव के प्रचंड जनादेश के बाद उसे इस बार भी जनता का बेहतर

समर्थन हासिल हो सकता है। अकेले चुनाव में उसे हर बार अधिक वोट मिले हैं

और इस प्रदर्शन में सुधार भी होता गया है। सिर्फ बाबूलाल मरांडी के अलग हो जाने

की वजह से वर्ष 2009 में उसका वोट प्रतिशत कुछ कम हुआ था। लेकिन वर्ष 2014 के

चुनाव में वह अकेले ही 31 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करने में कामयाब रही है।

पिछले तीन चुनाव के वोट प्रतिशत इस प्रकार रहे

वर्ष भाजपा कांग्रेस झामुमो जेवीएम राजद आजसू अन्य
2005 23.57 12.05 14.29 0 8.48 2.91 38.8
2009 20.18 16.16 15.2 8.99 5.03 5.12 29.32
2014 31.26 10.46 20.43 9.99 3.13 3.68 21.05
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