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चुनावी गठबंधन में कस रही है ठगबंधन की फांस







चुनावी गठबंधन अब भारतीय राजनीति का एक अनिवार्य हिस्सा बनता चला

जा रहा है। दरअसल इसके पीछे के कारणों को समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता जैसे जैसे कम हो रही है, दलों के पास

निष्ठावान कार्यकर्ताओं और समझदार नेताओं की घोर कमी हो चुकी है।

यही कारण है कि अब राजनीतिक दल क्षेत्र विशेष तक सीमित होते चले जा

रहे हैं। यह पार्टी नहीं व्यक्तिगत नेता का अपना सामाजिक संपर्क है,

जिसकी मदद से राजनीतिक दल का झंडा इलाके में नजर आता है।

अब ऐसी परिस्थिति में पूरे राज्य को एकसूत्र में पिरोने का कोई दूसरा

विकल्प नहीं होने की वजह से ही राजनीतिक दलों को चुनावी गठबंधन का

सहारा लेना पड़ रहा है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यह कोई बुरी बात भी नहीं है।

वर्तमान परिस्थिति में अगर ऐसा न हो तो शायद सरकार गठन का काम

और ज्यादा पेचिदा और भ्रष्टाचारयुक्त होकर रह जायेगा।

विधानसभा चुनाव में हर तरफ इसी तालमेल की चर्चा

झारखंड में भी विधानसभा के चुनावी गठबंधन की बात हर कोई करता आ

रहा है। लेकिन यह चुनावी गठबंधन नीतिगत अथवा आदर्शगत किसी मुद्दे

से जुड़ा हुआ नहीं है। अपनी सुविधा और सरकार बनाने लायक बहुमत

जुटाने का यह साधन भर है। इसी वजह से भाजपा का यह बयान फिर से

चर्चा में आया है। इससे पहले भी अखिल भारतीय स्तर पर भाजपा विरोधी

दलों के गठबंधन के बारे में भाजपा के कई नेताओं ने बयान दिये थे।

इसके तहत विरोधियों की इस एकजुटता को ठगबंधन कहा गया था।

बाद के घटनाक्रमों में यह साबित भी हो गया कि यह आरोप गलत नहीं था।

सिर्फ भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए स्वार्थी एकजुटता से काम

नहीं बना तो लोग अपने अपने अलग अलग रास्ते पर आगे बढ़ गये।

लेकिन अब तो महाराष्ट्र के घटनाक्रमों की वजह से यही आरोप भाजपा के

नेतृत्व वाली राजग पर भी लगता नजर आ रहा है। वहां शिवसेना की जिद

के आगे भाजपा कुछ कर नहीं पा रही है। दूसरी तरफ सरकार बनाने में आये

गतिरोध को भांपने के बाद कांग्रेस और एनसीपी भी नये सिरे से शिवसेना

के साथ मिलकर सरकार बनाने अथवा शिवसेना की सरकार को बाहर से

समर्थन देने के मुद्दे पर दोबारा से विचार कर रहे हैं।

चुनावी गठबंधन का खतरा महाराष्ट्र में झेल रही भाजपा

वहां के चुनाव में इन दलों के बीच कोई वैचारिक समानता नहीं थी।

वे एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे। अब सरकार गठन में मौका

हासिल होता दिखने लगा तो सारी नैतिकता को ताक पर रखकर मलाई खाने

की तैयारी हो रही है। दूसरे और साफ शब्दों में कहा जाए तो यह मेल मिलाप

किसी नीतिगत भलाई के लिए नहीं बल्कि शुद्ध तौर पर निजी हित साधने का

एक हथकंडा भर है।

झारखंड में भी दोनों खेमों में लगभग यही स्थिति है। एक तरफ भाजपा और

आजसू हैं, जो पिछले लोकसभा चुनाव तक एक साथ थे। दूसरी तरफ झामुमो

के नेतृत्व में अन्य भाजपा विरोधी दलों में कांग्रेस, राजद और झारखंड विकास

मोर्चा जैसे दल हैं। नीतिश कुमार के साफ कर दिया है कि राजग में उनका

तालमेल सिर्फ बिहार तक ही सीमित है। लिहाजा झारखंड के कुछ इलाकों में

जातिगत समीकरणों के आधार पर अब जदयू के प्रभाव को भी सहसा नकारा

नहीं जा सकता है। लेकिन इस मोर्चाबंदी के बीच भी कौन सा सहयोगी अंतिम

समय तक किसी एक दल के साथ रहेगा, इसकी गारंटी देने की स्थिति में कोई

भी नहीं है। भाजपा और आजसू के मुख्य कार्यालय एक-दूसरे से करीब आधे

किलोमीटर की दूरी पर होने के बाद भी दोनों कार्यालयों का माहौल एक दूसरे

के खिलाफ नजर आ रहा है। दोनों कार्यालयों मे सहयोगी दलों और उनके

नेताओं के बारे में हो रही चर्चा से ऐसा प्रतीत होता है कि वे शत्रुपक्ष की बात

कर रहे हैं।

भाजपा और आजसू के तेवर दोस्त नहीं दुश्मन जैसे

इसी तरह झामुमो अब भी गठबंधन की बात करने के बाद भी एकला चलो रे

की तर्ज पर आगे बढ़ रहा है। झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी स्पष्ट कर

चुके हैं कि वह बड़े दलों के साथ जाना ही नहीं चाहते क्योंकि सीमित सीटों

में असीमित दावेदारों की वजह से उनकी पार्टी को दिक्कत होती है। कांग्रेस

के नेता मंच पर एक साथ नजर आने के बाद से फिर से अपने अपने खेमे में

लौट चुके हैं। राजद का सारा दारोमदार अब भी रिम्स में ईलाजरत लालू प्रसाद

के ईर्द गिर्द घूमता नजर आ रहा है। ऐसे में चुनावी गठबंधन अगर है भी तो

वह कितना कारगर है, इस पर संदेह की पूरी गुंजाइश है। जाहिर है कि अगले

कुछ दिनों में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। इस स्थिति के स्पष्ट होन

के बाद भी दरअसल सहयोगी दलों के बीच आपसी सहयोग कितना होगा,

इस पर भी चुनावी परिणाम काफी हद तक निर्भर है और फिलहाल उसमें

कोई सार्थक उपलब्धि घटित होती नजर नहीं आ रही है।



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