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आम आदमी की पहुंच से दूर होता भारतवर्ष का हर चुनाव




आम आदमी अगर भारत के किसी चुनाव में भाग लेकर जीतना चाहे, तो वह धीरे धीरे असंभव सा होता जा रहा है। दरअसल धीरे धीरे यह चुनाव इतना महंगा होता जा रहा है कि आम आदमी अपनी सामान्य कमाई से इस चुनाव में नामांकन तो कर सकता है लेकिन जीतने की उम्मीद बहुत कम है।




जनता का किसी एक के प्रति ऐसा जोश बहुत कम ही देखने को मिलता है। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों ने भी अपने फायदे के लिए चुनाव प्रबंधन में पैसे खर्च करने का काम को बढ़ावा दिया था। अब धीरे धीरे यह दलों पर ही इतना भारी हो चुका है कि अगर आज की तारीख में नरेंद्र मोदी भी बनारस से बिना खर्च किये चुनाव जीतना चाहें तो वह लगभग असंभव सा काम होगा।

ठीक इसी मोड़ से नेताओँ का औद्योगिक घरानों के चंगुल में फंसने का दौर प्रारंभ होता है। आज के दौर में अगर वर्तमान केंद्र सरकार को चंद पूंजीपतियो की सरकार कहा जा रहा है तो इसके पीछे भी यही चुनावी खर्च की कहानी है। इसके बीच ही चुनाव आयोग ने फिर से चुनाव खर्च की आर्थिक सीमा को बढाने का एलान किया है।

देश में जारी कोरोना संकट के बीच पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी जारी है। इसी बीच पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले प्रत्याशियों के खर्च की सीमा 28 लाख से बढ़ाकर 40 लाख कर दी गई है। लोकसभा क्षेत्र के प्रत्याशी 70 लाख के बजाय अब 95 लाख रुपये खर्च कर सकेंगे। सरकार का यह फैसला चुनाव पैनल की सिफारिशों पर आधारित है। लोकसभा चुनाव के लिए बड़े राज्यों में प्रत्याशी 95 लाख और छोटे राज्यों में 75 लाख रुपये खर्च कर सकेंगे।

आम आदमी के लिए चुनाव बहुत महंगा हो गया

इससे पूर्व यह सीमा क्रमश: 70 लाख और 54 लाख रुपये थी। विधानसभा चुनाव के मामले में बड़े राज्यों में 28 लाख के बजाय 40 लाख खर्च की सीमा होगी, जबकि छोटे राज्यों में अधिकतम खर्च सीमा 20 लाख से बढ़ाकर 28 लाख रुपये की गई है।

उधर, चुनावी संभावनाओं को लेकर केंद्रीय चुनाव आयोग ने गुरुवार को कई बैठकें की और विभिन्न अधिकारियों से मिलकर इसका जायजा लिया। ऐसी ही एक बैठक में चुनाव आयोग ने आईसीएमआर और एम्स के निदेशक से चर्चा की।




इस बैठक में आईसीएमआर के निदेशक बलराम भार्गव और एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कोरोना के बढ़ते मामलों से लेकर ओमिक्रोन वैरिएंट के खतरे और वैक्सीन के प्रभावी होने से जुड़े तमाम मुद्दों पर केंद्रीय चुनाव आयोग को जानकारी दी।

साथ ही कोरोना के बढ़ते मामलों से जुड़े हुए अन्य पहलुओं और कोरोना काल में चुनावों के सुरक्षित आयोजन के लिए सुझाव दिये। इस बैठक के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने गृह सचिव अजय भल्ला के साथ भी एक बैठक की, जिसमें चुनावों को कैसे शांतिपूर्वक माहौल में संपन्न करवाया जाए उसके तमाम पहलुओं पर चर्चा की गई।

इस बैठक के दौरान इस पर भी चर्चा हुई कि कोरोना के माहौल में मतदान संपन्न करवाने के लिए सुरक्षाकर्मियों को भेजने और मतदान के दौरान कैसे उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके अलावा चुनाव आयोग ने चुनावों को कैसे शांतिपूर्वक संपन्न करवाना है, उस पर भी बातचीत की। साथ ही केंद्रीय चुनाव आयोग ने स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण से जानकारी हासिल की कि फिलहाल देश में कोरोना की क्या स्थिति है। साथ ही जिन 5 राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां कितना फीसदी वैक्सीनेशन हो चुका है।

इस चुनौती से निपटने की जिम्मेदारी आम आदमी की है

चुनाव आयोग चुनाव की तारीखें घोषित करने से पहले कोरोना से जुड़ी जानकारी जुटा रहा है, ताकि चुनावों की वजह से लोगों की जान खतरे में ना पड़ जाए। लेकिन सवाल यह है कि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित धनराशि तक ही क्या खर्च सीमित रहता है।

जाहिर सी बात है कि ऐसा कतई नहीं होता है और हम सभी जानते हुए भी इस झूठ को स्वीकार करते हैं। देश की चुनावी राजनीति आजादी के बाद से बदलती जा रही थी। सत्तर के दशक के बाद इसमें पैसे का खेल अधिक होने लगा। अब की स्थिति है कि चुनाव अब इतना महंगा हो गया है कि कई राजनीतिक दल चाहते हुए भी सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी तक खड़े नहीं कर पाते हैं।

लेकिन इसका यह नतीजा सामने आ रहा है कि देश की लोकतंत्र पर धीरे धीरे पूंजीपतियों का कब्जा होता जा रहा है। अब तो उद्योगपति सीधे भी इसमें दखल देने लगे हैं। आम आदमी के लिए यह संकट सबसे अधिक है लेकिन इस संकट का हल भी सिर्फ आम आदमी के पास ही है। अगर दो चार चुनावों में आम आदमी चुनावी मौसम के आर्थिक कमाई को अलग रखकर जनादेश सुनाने लगे तो भारतीय राजनीति पर पूंजी का यह कब्जा अपने आप ही कम होता चला जाएगा।



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