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कोरोना संकट में शिक्षा भी सबसे अधिक उपेक्षित

कोरोना संकट का दूसरा दौर हम अब झेल रहे है। इस बात को स्वीकारने में अब कोई

हिचक भी नहीं होनी चाहिए कि इस दूसरे कोरोना संकट को खुद हमलोगों ने आमंत्रित

किया है। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए जो गाइड लाइन जारी किये गये थे, उनका

पालन करने से कुछ लोगों के परहेज का खामियजा पूरा देश भुगत रहा है। इस बात को भी

समझ लीजिए कि कोरोना संकट से जो आर्थिक संकट पैदा हुआ है, वह पूरे देश पर एक

जैसा असर डाल रहा है। लॉकडाउन की समाप्ति के बाद किसी तरह कारोबार की गाड़ी को

तो चालू किया गया है लेकिन इस दौर में अगर सबसे अधिक कोई मुद्दा उपेक्षित रहा है तो

वह है शिक्षा। लॉकडाउन के पहले झटके से उबरने के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए

ऑनलाइन क्लास का सुझाव दिया गया। इससे निश्चित तौर पर जो काम पूरी तरह ठहर

गया था, उसमें गति आयी। लेकिन इसके बाद भी शिक्षा की जो गति कोरोना संकट के पूर्व

में थी, वह अब तक हासिल नहीं की जा सकी है। जब कभी इस काम को गति देने का

प्रयास हो रहा है, कहीं न कहीं कोरोना फिर से सर उठाने लगता है। मणिपाल जैसे

ख्यातिप्राप्त संस्था में अगर कोरोना का आक्रमण हो तो यह समझा जा सकता है कि देश

के अन्य शैक्षणिक संस्थान किस खतरे से गुजर रहे हैं। ऐसे में बच्चों को शिक्षा से जोड़े

रखना भी एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। यह स्पष्ट है कि जो समय बीत चुका है, वह अब

लौटकर वापस नहीं आयेगा। इसलिए बीते हुए कल में जो कुछ हम गवां चुके हैं, उसकी

भरपाई करने का वक्त है।

कोरोना संकट में यह दूसरी लहर अधिक चिंताजनक

देश में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर का अनुभव किया जा रहा है ऐसे में माता-पिता

अपने बच्चों को स्कूल भेजने को लेकर भी काफी चिंतित हो रहे हैं। प्रमुख कम्युनिटी

सोशल मीडिया मंचों में से एक के ताजा सर्वेक्षण में यह पाया गया है कि केवल 25 फीसदी

अभिभावक ही अप्रैल 2021 में अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए इच्छुक हैं। यह पूछे

जाने पर कि अगर केंद्र, राज्य सरकार या जिला प्रशासन अप्रैल में स्कूलों को खुला रखने

या फिर से खोलने का फैसला करता है तो क्या वे अपने बच्चों को भेजेंगे इस पर करीब 58

फीसदी लोगों ने नकारात्मक जवाब दिया। दरअसल, 73 फीसदी अभिभावक चाहते हैं कि

अगले सत्र से स्कूल तब ही खुले जब उनके जिले में 100 से कम सक्रिय मामले हों। अब

जब स्थिति सामान्य होती नजर आ रही थी तो कोरोना संकट का दूसरा दौर फिर से प्रारंभ

हो गया है। जहां कहीं भी कोरोना संक्रमण के आंकड़े नीचे हैं, उन्हें भी हम अब खतरे की

सीमा से बाहर नहीं मान सकते हैं। भारत के 272 जिलों में 18,000 से अधिक प्रतिक्रिया

मिली और यह सर्वेक्षण लोकल सर्कल मंच के माध्यम से आयोजित किया गया था और

सभी प्रतिभागियों को इस सर्वेक्षण में भाग लेने के लिए लोकल सर्कल्स पर अपना

पंजीकरण कराना था। इनमें जवाब देने वाले 44 प्रतिशत अभिभावक महानगरों या

राजधानी के जिलों में, 28 फीसदी लोग मझोले स्तर के जिलों में थे जबकि 28 प्रतिशत

माता-पिता छोटे शहरों या ग्रामीण जिलों में मौजूद थे। जाहिर है अब भी देश के कुछ भागों

में स्कूलों का पिछला ही सत्र चल रहा है और अगला सत्र अप्रैल में शुरू होने वाला है।

अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतरा रहे हैं

ऐसे में कई अभिभावक लोकल सर्कल्स मंच पर अपनी चिंताओं को दर्शा रहे हैं। यह मंच

अप्रैल 2020 के बाद से ही स्कूल को फिर से खोलने और ऑनलाइन कक्षाओं पर सामूहिक

राय जानने के लिए माता-पिता से प्रतिक्रिया ले रहा है और सरकार के पास इन्हीं

प्रतिक्रियाओं को भेज भी रहा है। ज्यादातर अभिभावकों ने बच्चों को स्कूल भेजने से सीधे

मना कर दिया लेकिन जनवरी 2021 में पहली बार के लिए लोकल सर्कल्स ने अभिभावकों

की राय में एक बड़ा बदलाव देखा। फरवरी की शुरुआत में 67 फीसदी माता-पिता स्कूलों

को फिर से खोलने के पक्ष में थे क्योंकि भारत में कोविड के रोजाना आने वाले मामले अब

तक के सबसे नीचे करीब 10,000 मामले रोजाना के स्तर पर आ गए। हालांकि, पंजाब में

हुई जांच में 81 फीसदी कोविड-19 नमूने ब्रिटेन के सार्स-सीओवी2 से मिलते हैं जबकि

बेंगलूरु में मार्च में 10 साल से कम उम्र के बच्चों में कोविड के 500 के करीब मामले देखे

गए ऐसे में मंच ने स्कूल को फिर से खोलने के लिए ‘अधिक रूढि़वादी दृष्टिकोण’ अपनाने

का भी सुझाव दिया है। इस बीच, लोकलसर्कल्स सर्वेक्षण के निष्कर्षों को शिक्षा मंत्रालय

और सभी मुख्य सचिवों को भेजे जाएंगे ताकि अप्रैल-जून 2021 में स्कूल को फिर से

खोलने का निर्णय लेते समय माता-पिता की सामूहिक प्रतिक्रिया पर भी गौर किया जा

सके। अब बदली हुई परिस्थितियों में बच्चों को इसी कोरोना संकट के बीच शिक्षा कैसे

प्रदान की जाए, यह एक गंभीर विषय बन चुका है।

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