विकास योजना पर जनमत के लिए अब धरातल पर काम भी दिखना चाहिए

कागजी आकड़ों पर भरोसा करना गलत होगा

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विकास के असली मकसद को पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गंभीर है।

उन्होंने अपने तमाम मंत्रियों को अपनी योजनाओं की जानकारी अधिक से अधिक देने का निर्देश दिया है।

श्री मोदी का यह निर्देश काबिले तारीफ है। आम तौर पर योजनाओं तथा उनकी

उपलब्धियों के बारे में निरंतर जानकारी नहीं होने के अभाव में जनता भी इससे ताल्लुक रखना छोड़ देती है।

इस उपेक्षा का नतीजा होता है कि सरकारी फाइलों में योजनाएं संचालित होती हैं और

इनका पैसा चंद लोगों की जेबों में जाता रहता है।

जब लगातार योजनाओं और उनकी उपलब्धियों के बारे में जनता के बीच नई नई

सूचनाएं पहुंचेंगी तो वे अपने स्तर पर भी इन सूचनाओं को जांचते रहेंगे।

ऐसा होने पर कमसे कम कागजों में विकास कार्य का गोरखधंधा काफी हद तक काम होगा।

कागज पर विकास से अब नहीं चलेगा काम

सिर्फ झारखंड की बात करें तो सामाजिक अंकेक्षण के अभाव में यहां अरबों रुपये की

लागत से ग्रामीण, शहरी और राष्ट्रीय राजमार्ग बने, नहर और चेक डैमों का निर्माण हुआ।

इसी तरह डोभा निर्माण का काम चला। अब यहां शौचालय बनाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है।

लेकिन ये तमाम काम कितने सफल हैं, इनका सामाजिक अंकेक्षण हो तो तस्वीर कुछ और ही नजर आयेगी।

किसी भी सरकारी योजना के बारे में दूर दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक जानकारी पहुंचाने के माध्यमों के इस्तेमाल में भी ईमानदारी का अभाव योजनाओं को अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने से रोक देता है।

कमीशनखोरी हावी होती है विकास योजनाओं में प्रखंड कार्यालय स्तर पर आते आते इन तमाम योजनाओं पर कमीशनखोरी और बिचौलिये हावी हो जाते हैं।

यह देखा जा सकता है कि पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद भी जिला स्तर के अधिकारियों का सारा जोर इस बात पर है कि ग्रामीण पंचायत की योजनाओं की नियमित जानकारी उन्हें मिली।

यह दरअसल जानकारी लेने की बात नहीं है बल्कि काम करने वाले ठेकेदार से अपना कमीशन वसूलने की पुरानी आदत है।

पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद भी जिला ग्रामीण विकास अभिकरण की सारी बीमारी धीरे धीरे पंचायतों तक पहुंच रही है।

ईमानदारी है लोकप्रिय बनाने की अहम शर्त

प्रधानमंत्री कार्यालय ने जिस तरीके से इन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाने की बात कही है, उसमें ईमानदारी सबसे जरूरी शर्त है।

सरकारी योजनाओं के पक्ष में निष्पक्ष लेखकों को खड़ा करने में भी अपने लोगों के बीच रेवड़ी बांटने का काम अगर प्रारंभ हो गया

तो आने वाले दिनों में यह प्रयास भी अंतत: विफल हो जाएगा।

इस काम में हाल के दिनों में कई किस्म की खामियां सार्वजनिक हुई हैं

और फिलहाल उन्हें सुधारने के लिए कोई सरकारी महकमा मानसिक तौर पर तैयार भी नजर नहीं आता।

ऐसे में जो जिम्मेदारियां मंत्रालयों को दी गयी हैं, उनका पालन सुनिश्चित कौन करेगा, इसकी जिम्मेदारी तय नहीं हुई है।

खासकर मीडिया यानी समाचार पत्र और चैनलों में सरकारी योजनाओं की सफलता के आंकड़ों के प्रचार प्रसार के लिए भी अलग से जिम्मेदारी सौंपी गयी है।

सोशल मीडिया में सरकार के पक्ष में माहौल बनाने वालों को भी भुगतान करने की बात कही गयी है।

ताकि अधिकाधिक लोगों को इन प्रयासों से जोड़ा जा सके और सरकार की बात अधिसंख्य लोगों तक पहुंच सके।

परिचित चेहरों से नहीं बनेगा काम

इसमें जो पार्टी के अघोषित चेहरे हैं, सिर्फ उनकी मदद से बात बन पायेगी, इसकी बहुत कम उम्मीद है।

खासकर पहचान छिपाकर सोशल मीडिया में बात रखने वालों की पहचान शीघ्र ही हो जाती है।

ऐसे में उनके पोस्ट के आधार पर उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ता या दूसरे शब्दों में चमचा

समझकर लोग उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते।

सिर्फ अपने लोगों को फायदा पहुंचाने की सोच से दूसरे लोग उबर पायेंगे, तभी यह निर्देश वाकई जनता के लिए फायदेमंद साबित होगा।

नये तरीके आजमाने होंगे

जिस तरीके से जनता तक सरकार की बात पहुंचाने की बात कही गयी है

उनमें टेलीविजन और सभी समाचार पत्रों में प्रचार, राष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया के लोगों से बेहतर तालमेल,

अंग्रेजी, हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में समर्थन में अच्छे लेखों का प्रकाशन, आकाशवाणी

सहित रेडियो में नियमित प्रचार प्रसार, इलेक्ट्रानिक मीडिया की परिचर्चाओं में

सफलता का प्रचार, मास मीडिया और सोशल मीडिया का पूरा इस्तेमाल शामिल है।

परिचित चेहरों का कोई औचित्य नहीं

इनमें से अधिकांश में भाजपा के परिचित चेहरों के इस्तेमाल का अब कोई औचित्य नहीं बचा है।

ऐेसे में गंभीर विषयों पर गंभीर चिंतन करने वालों को जोड़ना भी

सभी मंत्रालयों के लिए कोई आसान काम नहीं होगा।

राज्य सरकारों खासकर झारखंड जैसे राज्यों को यह काम काफी पहले करना चाहिए था।

कागजी आंकड़ों के खेल में उलझकर तमाम योजनाएं अपनी दिशा से भटक रही है और

सामाजिक अंकेक्षण के अभाव में सरकार को यह पता भी नहीं चल पा रहा है कि किस कदर की लूट इन विकास योजनाओं में मची हुई है।
ऐसे में जनता का भरोसा टूट रहा है। प्रधानमंत्री ने जिस उद्देश्य को पाने के लिए यह पत्र भेजा है,

उसके मर्म को समझते हुए ही सभी को इसमें काम करना होगा।

इसके लिए ईमानदारी और निष्पक्षता सबसे अहम शर्त है।

इन दोनों के बिना फिर से की गयी कोशिश अंतत: असफल साबित होगी और कागजी आंकड़ों से सरकार ही नुकसान होगा।

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