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पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों से सही दिशा तय करते हैं शार्क

  • दुनिया के कई अन्य जीव जंतु भी इसका लाभ लेते हैं

  • लंबी दूरी तय करने में उनका यही श्रेष्ठ सहारा होता है

  • ह्वाईट शार्क 12 हजार मील से अधिक दूरी तय करता है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों के आधार पर ही शार्क जैसे प्राणी अपने लिए सही दिशा तय

कर पाते हैं। कई स्तरों पर अनुसंधान होने के बाद उनकी दिनचर्या में इसके प्रभाव को दर्ज

किया गया है। पृथ्वी के इसी चुंबकीय क्षेत्रों के प्रभाव की वजह से ही वे हजारों मील की दूरी

भी सही तरीके से तय करते हैं। दुनिया के कई अन्य प्राणियों के लिए भी यह बड़ा सहारा

है। इसी की मदद से वे सही रास्ते पर न सिर्फ आगे बढ़ते हैं बल्कि सही तरीके से वापस भी

लौटते हैं। अनुसंधान में यह पाया गया है कि शार्क के अलावा समुद्री कछुआ और कुत्ते भी

इसका प्रयोग करते हैं। इसके आधार पर वे अपना दिशा निर्णय करते हैं। शार्क सही तरीके

से हजारों मील की दूरी तय कैसे करते हैं, यह सवाल बहुत समय से वैज्ञानिकों के मन में

था। हजारों मील दूर जाकर अपने भोजन के सही स्थान को खोज लेना और फिर किसी

दूसरे रास्ते पर हजारों मील चलते हुए फिर सही जगह पर लौट आना, अपने आप में एक

बड़ा सवाल था। अब इस बारे में जो शोध रिपोर्ट जारी की गयी है, उसके मुताबिक वे सभी

पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से अपना गंतव्य सही तरीके से तय कर पाते हैं। इस

रिपोर्ट में बताया गया है कि इसी तरह से पक्षी और ह्वेल के साथ साथ कई अन्य

प्रजातियां लंबी दूरी तय करने के लिए इसका सहारा लेती हैं।

फ्लोरिडा स्टेट विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी ब्रायन केलर ने इस संबंध में कहा है कि

दरअसल इन सारे प्राणियों के अंदर एक जीपीएस पद्धति जैसी काम करती है। इसी के

आधार पर वे हजारों मील का सफर बिल्कुल सही तरीके से पूरा करते हैं क्योंकि पृथ्वी के

चुंबकीय क्षेत्रों से उन्हें लगातार पता लगता है कि वे किधर जा रहे हैं।

पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों के बारे में भी एक सोच सामने आयी है

वैज्ञानिक आकलन है कि पृथ्वी के करीब दो हजार मील की गहराई में मौजूद लोहा बाहरी

बिजली के संपर्क में आकर यह चुंबकीय क्षेत्र तैयार करते हैं। यह पृथ्वी के हर छोर तक

अपना प्रभाव दिखाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पृथ्वी के बाहर भी इसका प्रभाव होता हैं।

पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के पृथ्वी के बाहर भी सक्रिय होने की वजह से धरती को सूर्य किरणों

के विकिरणों से बचने की ताकत मिलती है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का प्रभाव पृथ्वी के

अलग अलग छोर पर अलग अलग होता है। इसके आधार पर अपनी दिशा निर्धारित करने

वाले प्राणियों ने खुद को इतना पारंगत बना लिया है कि वे पृथ्वी के किसी भी हिस्से में

होने के बाद भी इसी आधार पर तय कर लेते हैं कि उन्हें किस तरफ जाना है। शायद कुछ

प्राणी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के पूरे ढांचे को बेहतर तरीके से समझ और महसूस भी कर

पाते होंगे। इसलिए दिशा निर्णय में वे कोई गलत नहीं करते हैं। शायद इसी आधार पर

उन्हें यह पता होता है कि वे दरअसल अभी कहां हैं और उन्हें कहां पहुंचना है। शार्कों के बारे

में पहले से ही वैज्ञानिकों का आकलन था कि उनके पास कोई अतिरिक्त गुण है, जिसकी

वजह से वे सही तरीके से इतनी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। इस शोध के निष्कर्ष तक पहुंचने

के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने एक बोनहेड शार्क पर प्रयोग किया था। इस प्रजाति का शार्क

अपने मूल जगह पर सही तरीके से लौटना जानता है। शोध दल ने इस प्रजाति के बीस

शार्कों को फ्लोरिया के तट से पकड़ा और उन्हें दस फीट आकार के एक टैंक में रखा। इस

टैंक के तीन वर्ग फीट के इलाके में एक कृत्रिम सुक्ष्म चुंबकीय क्षेत्र बनाया गया।

प्रयोग में कृत्रिम चुंबकीय क्षेत्र को भी आजमाया गया था

इस वजह से इस प्रजाति के शार्क सिर्फ चार फीट तक ही बढ़ पाते थे। इस टैंक में अनेकों

बार अलग अलग किस्म के चुंबकीय क्षेत्रों की नकल की गयी। जब जब ऐसा किया जाता

था, संबंधित चुंबकीय क्षेत्र को महसूस कर सारे शार्क अपने तैरने की दिशा बदल दिया

करते थे। कई अन्य स्थानों के चुंबकीय क्षेत्रों के संकेत पर इन प्राणियों ने कोई रुचि नहीं

दिखायी। दक्षिण अफ्रीका के तय से ऑस्ट्रेलिया तक की 12,400 मील की दूरी तय करने

वाले ग्रेट ह्वाईट शार्क भी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों से अपनी दिशा निर्धारित करते हुए सही

स्थान पर पहुंच जाते हैं। उसी रास्ते पर वे नौ महीने के बाद फिर से वापस भी लौट आते हैं।

वैसे किस विधि का उपयोग कर शार्क या दूसरे जानवर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों का पता

लगाते हैं, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। वैसे यह पाया गया है कि कुत्ते इस तकनीक

के साथ साथ अपनी सूंघने की शक्ति की भी मदद से सही दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।

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