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पृथ्वी की जमीन की संरचना लाखों वर्षों से बदलती ही रही है

  • बाहरी और आंतरिक कारणों से बदलते हैं टेक्टोनिक प्लेट

  • सूर्य से टूटकर अलग हुआ था आग का गोला

  • पृथ्वी से टूटकर ही चंद्रमा की रचना हुई है

  • टेक्टोनिक प्लेटों से होता रहा है बदलाव

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पृथ्वी की जमीन की संरचना शायद पृथ्वी की रचना होने के दौर से ही बदलता रहा

है। वैसे भी जिस तरीके से यह पृथ्वी बनी थी, उसकी वैज्ञानिक कल्पना यही है कि लगातार

कई हजार वर्षों की बारिश के बाद जमीन का कोई छोटा सा टुकड़ा उभरा था।

वीडियो में समझिये क्या कह रहे हैं वैज्ञानिक

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि पृथ्वी का यह जो छोटा सा टुकड़ा पानी के सैलाब के बीच

उभरा था, वह गोंडवाना प्लेट हैं, जिसपर झारखंड से लेकर मध्यप्रदेश तक के इलाके हैं।

इन इलाकों में भूकंप आने की संभावना कम जतायी जाती है लेकिन यह भी बताया जाता

है कि ऐसे इलाकों में जब भी बड़ा भूकंप आया तो वह दूसरे इलाको के मुकाबले बहुत

अधिक नुकसान करने वाला साबित होगा। लेकिन हम यहां चर्चा कर रहे हैं कि पृथ्वी की

जमीनी संरचना करने वाले उन टेक्नोनिक प्लेटों की, जिनके ऊपर अलग अलग इलाकों में

हमारे वर्तमान महाद्वीप बने हुए हैं। इन टेक्नोनिक प्लेटों के स्थान बदलने का क्रम काफी

पुराना है। इसी वजह से पृथ्वी का इतिहास और भूगोल के साथ साथ पर्यावरण भी लगातार

बदलता रहा है। जमीन पर जीवन के विकास के बाद भी ऐसे कई दौर आये हैं, जबकि इन

प्लेटों ने अपना स्थान बदला है और उसी वजह से पुराने इलाके समुद्र और दो टेक्टोनिक

प्लेटों के नीचे दब गये हैं। कई नये इलाकों का उभरना भी इसी की परिणति है। कुल

मिलाकर अगर कई लाख वर्षों में इनके बदले की स्थिति का आकलन किया जाए तो यह

किसी वैसी पहली की तरह नजर आता है, जिसमें अलग अलग खंडों में बंटे भिन्न भिन्न

आकार के खंडों को एक साथ मिलाकर कोई सार्थक आकार देना पड़ता है। लेकिन पृथ्वी की

गहराई में इन सभी खंडों के नीचे का इलाका गोलाकार और एक जैसा ही है।

पृथ्वी की जमीन की गहराई में है खौलता लावा

पृथ्वी बनने की जिस वैज्ञानिक परिकल्पना को हम मानते हैं, उसके मुताबिक सूर्य से

किन्ही कारणों से टूटकर अलग होने वाला एक गोला काफी दूर तक निकल आया था।

अंतरिक्ष में लाखों वर्षों तक इसी तरह घूमते रहने के बाद यह धीरे धीरे ठंडा हुआ और पृथ्वी

बनी। पृथ्वी से ही एक टुकड़ा अलग होकर चांद बना। सूर्य से निकला वह आग का गोला

अब भी विद्यमान है, जिसके ऊपर विभिन्न कारणों से मजबूत पर्त पड़ी हुई है। जब कभी

पृथ्वी के पर्त कहीं से टूटते हैं तो हम ज्वालामुखी विस्फोट के तौर पर पृथ्वी के गर्भ से

निकलने वाली इस लावा को देखते हैं। पृथ्वी के टेक्टोनिक प्लेटों के लगातार स्थान

बदलने के बारे में शोध वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कुछ वैसी ही स्थिति है, जिस तरीके

से इंसान का नाखुन बढ़ता रहता है। चूंकि हम इन्हें नियमित तौर पर काट देते हैं वरना वे

लगातार बढ़ते हुए एक दूसरे से टकराने लगेंगे। टेक्टोनिक प्लेटों का लगभग यही है। वे

लगातार आपस में टकराते रहते हैं। जिससे अत्यधिक ऊर्जा पैदा होती है। वैसे यह भी

समझ लें कि पृथ्वी इन टेक्टोनिक प्लेटों पर टिकी हुई है, इस सिद्धांत को करीब पचास वर्ष

पूर्व स्वीकारा गया है। अब पहले के टेक्टोनिक प्लेटों की संरचना और स्थिति के बारे में

उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कब और कैसे यह प्लेट अपना स्थान बदलते चले गये,

उसका एक कंप्यूटर मॉडल भी तैयार किया जा सका है। इसके बारे में अर्थ साइंस रिव्यूज

पत्रिका में एक लेख भी प्रकाशित हुआ है, जिसमें इस कंप्यूटर एनिमेशन की मदद से यह

दिखाया गया है कि पृथ्वी के टेक्टोनिक प्लेट कैसे बदलते चले गये हैं। हमने इस

एनिमेशन की गति को अत्यंत कम कर दिया है ताकि देखने वालों को इस स्थान और

आकार परिवर्तन की बात समझ में आ सके।

प्लेट खिसकते हैं तो महासागरों की स्थिति भी बदलती है

इन प्लेटों के खिसकने की वजह से पृथ्वी के महासागरों की स्थिति भी बदलती रही है।

अभी हाल ही में यह भी पता चला है कि अटलांटिक महासागर का आकार बढ़ता जा रहा है।

इस बार वैज्ञानिकों ने उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर चुंबकीय आंकड़ों को एकत्रित करने के

बाद भौगोलिक तथ्यों को मिलाते हुए इस संरचना से संबंधित कंप्यूटर मॉडल को तैयार

किया है। इस मॉडल में दस खरब वर्ष के बदलाव को संक्षेप में दर्शाया गया है ताकि

आधुनिक जगत यह समझ सके कि पृथ्वी कैसे कैसे बदलती रही है। इस दौरान पृथ्वी के

मौसम और अन्य बदलाव भी हुए हैं। कई बार बड़े उल्कापिंडों के गिरने की वजह से भी

पृथ्वी में बहुत कुछ बदला है। मसलन पृथ्वी पर राज करने वाले डायनासोर भी किसी

उल्कापिंड के गिरने से पूरी पृथ्वी में लगी भीषण आग की चपेट में आकर विलुप्त हो गये

थे। इस शोध पर क्लाउड बर्नाड विश्वविद्यालय के एंड्रूय मेरीडिथ, ऑक्सफोर्ड

विश्वविद्यालय के लूसिया पेरेज डियाज ने अपनी राय जाहिर की है। जिसमें यह बताया

गया है कि करीब सात सौ मिलियन वर्ष पहले यह पृथ्वी बर्फ का एक गोला भर था।

जिसके बाद कई चरणों में जीवन का क्रमिक विकास हुआ है।

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